नेपाल की नई सरकार की दोहरी चुनौती, घरेलू अमला सफाई और भारत के साथ कैलाश, मानसरोवर रूट विवाद

नेपाल की नई सरकार ने एक ही हफ्ते में दो ऐसे फैसले लिए हैं, जो न केवल देश के भीतरी राजनीतिक भूचाल को तेज कर रहे हैं, बल्कि भारत के साथ संवेदनशील सीमा और तीर्थ–यात्रा मामलों पर भी तनाव बढ़ा रहे हैं। प्रधानमंत्री बसन्त शाह (बालेन) के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की सरकार ने लगभग 1,500–1,600 ऐसी सार्वजनिक नियुक्तियों को रद्द कर दिया है, जिन्हें वह “राजनीति से प्रेरित” और पूर्ववर्ती सरकारों का भरोसामंद नेटवर्क बनाने का ज़रिया मानती है।  इसी बीच, काठमांडू ने भारत के साथ चल रहे कैलाश–मानसरोवर यात्रा के लिपुलेख रूट पर भी आधिकारिक आपत्ति दर्ज की है, जिसे नई दिल्ली ने “ऐतिहासिक–तथ्यों पर आधारित न होने के कारण अनुचित और अस्वीकार्य” बताया है।

“राजनीतिक नियुक्तियों” की बड़ी सफाई

नेपाल की राष्ट्रपति श्रीमती रामचन्द्र पौडेल ने एक अध्यादेश (ओर्डिनेंस) जारी कर 1,500 से अधिक अधिकारियों, अध्यक्षों और बोर्ड सदस्यों की नियुक्तियों को स्वत: रद्द घोषित कर दिया है।  सरकार का दावा है कि ये सभी नियुक्तियाँ मार्च 2026 के नेतृत्व–परिवर्तन (प्रधानमंत्री बसन्त शाह की वर्तमान सरकार के शपथग्रहण) से पहले विभिन्न राजनीतिक दबाव में की गईं थीं और राज्य–क्षेत्रों जैसे सार्वजनिक उपक्रम, विश्वविद्यालय, स्वास्थ्य बोर्ड और सेवा–क्षेत्रों को “पार्टी–समर्थकों के खेत” में बदल देने की कोशिश रही। इस बड़े पैमाने पर अमला–सफाई के पीछे नई सरकार ने “नेपाल–संविधान के तहत अनुत्तरदायी नियुक्तियों पर रोक” और “स्व–सुधारवादी राजनीति की छवि बनाने” की युक्ति दी है।  विपक्षी दलों, खासतौर पर पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की एनसीपी और नेपाली कांग्रेस, ने इसे “राजनीतिक सफाई–अभियान” और “प्रतिशोध–पूर्ण एक्शन” क़रार दिया है। कई विश्लेषकों का तर्क है कि इस तरह की झटपट रद्दी–कार्यवाही से स्वास्थ्य, शिक्षा और योजना कार्यान्वयन जैसे क्षेत्रों में अस्थायी व्यवधान और नौकरशाही की नर्वस–नेटवर्क का टूटना तो तय है।

जनता की प्रतिक्रिया: उम्मीद और चिंता

नेपाली जनता में इस निर्णय को लेकर दो–धारी प्रतिक्रिया सामने आई है। युवा और शहरी नागरिक, जिन्होंने बसन्त शाह के “नेपाल फिर से बनाओ” अभियान को जीत दिलाई, इसे रोज़–रोज़ की रिश्वत, नौकरी–पट्टी और राजनीतिक अनुग्रह के खिलाफ ऐतिहासिक कदम बता रहे हैं।  वे उम्मीद जता रहे हैं कि नई नियुक्तियाँ योग्यता–आधारित होंगी और राज्य संसाधनों का इस्तेमाल “सेवा–वितरण” में होगा, न कि दलों के अनुग्रह में। साथ ही, मध्यम–वर्ग और छोटे नौकरशाहों के बीच यह भी चिंता है कि बिना विस्तृत न्यायिक–समीक्षा या ट्रिब्यूनल के इस तरह की अध्यादेश–आधारित रद्दी, रोज़गार सुरक्षा और संवैधानिक न्याय के सिद्धांतों से टकराएगी। कई विश्लेषकों का डर है कि यह नया राजनीतिक चक्र भी “पक्षपाती नियुक्तियों” के लिए नया दरवाज़ा खोल सकता है, यदि नियुक्ति–प्रक्रिया पारदर्शी ढंग से स्थापित नहीं की गई।

कैलाश–मानसरोवर यात्रा और लिपुलेख विवाद

ऊपर से राजनीतिक भूचाल चल रहा है, नीचे नेपाल–भारत सीमा विवाद भी फिर से सामने आ गया है। काठमांडू ने कैलाश–मानसरोवर यात्रा के लिपुलेख रूट (कलापानी–लिपुलेख–लिम्पियाधुरा) के इस्तेमाल का विरोध इस आधार पर दोहराया है कि वह क्षेत्र 1816 के सुगौली संधि के अनुसार नेपाल का अभिन्न हिस्सा है।  नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भारत और चीन दोनों को आधिकारिक प्रतिवाद पत्र भेजकर यह ज़ोर दिया कि लक्ष्य यात्रा–सुविधा नहीं, बल्कि “अपने क्षेत्रीय दावे को बनाए रखना” है। भारत की तरफ़ से विदेश मंत्रालय ने इस आपत्ति को “ऐतिहासिक तथ्यों और भूमिका–दस्तावेजों पर आधारित न होने” के कारण खारिज कर दिया है।  नई दिल्ली ने याद दिलाया कि लिपुलेख दर्रे का उपयोग कैलाश–मानसरोवर यात्रा के लिए 1954 से हो रहा है और इसे न तो नया विकास, न ही “क्षेत्रीय दावा बढ़ाने का साधन” माना जा सकता है।  भारत ने “एकतरफा और कृत्रिम दावा–विस्तार” को भी गैर–जायज़ बताया है और संवाद पर ज़ोर दिया है, लेकिन नीतिगत रेखा स्पष्ट रखी है कि यात्रा–मार्ग की व्यवस्था चलती रहेगी।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि

नेपाल में यह मुद्दा तुरंत आंतरिक राजनीति का अहम हथियार बन गया है। वामपंथी–राष्ट्रवादी गुट लिपुलेख–विवाद को “भारत की हिंदुस्तानी–हवाला–सीमा–नीति” के ख़िलाफ नेपाली–संप्रभुता की रक्षा” का प्रतीक बता रहा है, जबकि नए प्रशासनिक ढांचे वाले युवा–उत्साही तबके चाहते हैं कि नेपाल “तीर्थ–यात्रा–सहयोग” और “आर्थिक–पर्यटन–संबंध” को सीमा–विवाद से अलग रखे। भारतीय राजनीतिक दलों की तरफ़ से भी इस मामले पर दोहरी लकीर दिख रही है। बड़े पार्टी–नेता तो खुलकर “नेपाल के दावे को अवैध और इतिहास के ख़िलाफ” बता रहे हैं, पर साथ ही उन्हें नेपाली जनमत में बढ़ते राष्ट्रवादी झुकाव को भी नज़र–अंदाज़ नहीं करना पड़ेगा।

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