मानसून सत्र में फिर आ सकता है पीएम-सीएम हटाने वाला 130वां संविधान संशोधन बिल, 30 दिन जेल में तो कुर्सी खाली

केंद्र सरकार एक बार फिर उस विवादित विधेयक को संसद में लाने की तैयारी में है, जिसके तहत गंभीर आपराधिक मामलों में 30 दिन से ज्यादा न्यायिक हिरासत में रहने पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री का पद स्वतः खाली हो जाएगा। संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त 2026 तक चार हफ्ते चलने की संभावना है, और इसी सत्र में संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 पर बड़ा फैसला हो सकता है।

जेपीसी की रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

इस विधेयक की जांच कर रही 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की अगुवाई भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी कर रही हैं। समिति में लोकसभा से रविशंकर प्रसाद, भर्तृहरि महताब, सुप्रिया सुले और असदुद्दीन ओवैसी जैसे सदस्य शामिल हैं, जबकि राज्यसभा से बृजलाल, उज्ज्वल निकम, सुधा मूर्ति आदि हैं। हालांकि कांग्रेस, टीएमसी, सपा और डीएमके जैसे प्रमुख विपक्षी दलों ने समिति से दूरी बना रखी है। समिति में अब विपक्ष के केवल चार सांसद ही सक्रिय बचे हैं, और उनके असहमति नोट सौंपने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। लोकसभा में हाल ही में सारंगी द्वारा पेश प्रस्ताव के बाद जेपीसी को अपनी रिपोर्ट सौंपने की समय-सीमा बढ़ाकर अब मानसून सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक कर दी गई है। हालांकि कई रिपोर्टों में 17 जुलाई को समिति की बैठक में रिपोर्ट को कुछ संशोधनों के साथ मंजूरी मिलने का अनुमान भी जताया जा रहा है, जिसके बाद इसे कैबिनेट से होते हुए संसद में पेश किया जाएगा।

विधेयक का प्रावधान और सरकार का पक्ष

विधेयक के अनुसार, यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री पर पांच साल या उससे अधिक सजा वाले गंभीर आरोप लगते हैं और वे लगातार 30 दिन न्यायिक हिरासत में रहते हैं, तो पद से हटाए जाने की प्रक्रिया स्वतः सक्रिय हो जाएगी। दुरुपयोग रोकने के लिए राष्ट्रपति या राज्यपाल संबंधित सलाह पर हटाने का आदेश दे सकते हैं, अन्यथा 31वें दिन कार्रवाई स्वतः प्रभावी हो जाएगी। यह बिल संविधान के अनुच्छेद 75, 164 और 239एए में संशोधन करता है। गृह मंत्री अमित शाह ने इसे राजनीति के अपराधीकरण को रोकने वाला जरूरी सुधार बताते हुए तर्क दिया है कि संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति जेल से सरकार नहीं चला सकता।

विपक्ष का तीखा विरोध

विपक्ष, खासकर इंडिया गठबंधन, इसे राज्य सरकारों को अस्थिर करने का हथियार और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बता रहा है। ओवैसी जैसे सदस्यों ने यह भी तर्क दिया है कि नए आपराधिक कानूनों के प्रावधान पुलिस हिरासत की अवधि को प्रभावित कर सकते हैं। पार्टियों का कहना है कि यह “निर्दोष जब तक दोषी साबित न हो” के सिद्धांत के खिलाफ है अगर बाद में अदालत राहत भी दे दे, तब तक कुर्सी जा चुकी होगी।

संख्याबल की चुनौती

चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है, इसे दोनों सदनों में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पास कराना होगा। राज्यसभा में एनडीए की स्थिति हाल में मजबूत हुई है — AAP के 7 सांसदों के भाजपा में विलय और 12 सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन के बाद एनडीए के आंकड़े बढ़कर करीब 145 हो गए हैं, जबकि लोकसभा में एनडीए के पास करीब 330 सांसद बताए जा रहे हैं, फिर भी दो-तिहाई के आंकड़े तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त समर्थन जरूरी होगा। 

आगे क्या

इसी सत्र में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) और केंद्र शासित प्रदेशों के शासन से जुड़ा विधेयक भी साथ लाया जा सकता है, साथ ही महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन बिल भी चर्चा में आ सकता है। अगर 130वां संशोधन विधेयक पास होता है, तो यह भारत के संवैधानिक इतिहास में पहली बार होगा जब किसी संवैधानिक पद से हटने की शर्त सीधे गिरफ्तारी और हिरासत की अवधि से जोड़ी जाएगी — जिससे यह मानसून सत्र की सबसे बड़ी राजनीतिक जंग का मैदान बन सकता है।

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