पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं, सरकार का स्पष्टिकरण, क्यों नहीं आना चाहिए था हैरानी

विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यह मात्र एक यात्रा दस्तावेज है जो विदेश में भारतीय राष्ट्रीयता स्थापित करने में मदद करता है। इस बयान ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है और सवाल उठाया है कि आखिर भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कौन से दस्तावेज पर्याप्त हैं। सरकार का यह बयान 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर आया है। MEA के अनुसार, पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को जारी किया जाता है, लेकिन इसका स्वामित्व सरकार का होता है और इसे सरकारी आदेश पर वापस करना पड़ सकता है। पासपोर्ट मैनुअल में भी इसे ‘ट्रैवल डॉक्यूमेंट’ ही बताया गया है।

कानूनी स्थिति दशकों पुरानी

यह कोई नई बात नहीं है। पासपोर्ट एक्ट, 1967 की धारा 6(2)(a) के तहत पासपोर्ट तभी जारी होता है जब आवेदक भारतीय नागरिक हो। लेकिन धारा 20 में ‘सार्वजनिक हित’ में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी करने का प्रावधान है। कोर्ट्स ने भी कई फैसलों में यह स्थापित किया है कि पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी या PAN कार्ड अकेले नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि 1 जुलाई 1987 के बाद जन्मे लोगों के लिए जन्म प्रमाण-पत्र, पासपोर्ट या आधार भी नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं हो सकते। हाल ही में बाबू अब्दुल सरदार बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में भी हाईकोर्ट ने दोहराया कि नागरिकता के सवाल नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत ही तय होते हैं, न कि केवल पहचान दस्तावेजों से।

नागरिकता साबित करने के क्या विकल्प?

भारत में कोई एकल ‘नेशनल सिटीजनशिप कार्ड’ नहीं है, जो कई अन्य देशों में उपलब्ध होता है। नागरिकता अधिनियम के अनुसार, 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 तक भारत में जन्म लेने वाले व्यक्ति जन्म से नागरिक माने जाते हैं। 1987 के बाद जन्मे व्यक्ति के मामले में माता या पिता में से एक भारतीय नागरिक होना चाहिए। 3 दिसंबर 2004 के बाद जन्मे व्यक्ति के लिए दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक होने चाहिए या एक नागरिक और दूसरा अवैध प्रवासी नहीं होना चाहिए। कोर्ट्स अक्सर जन्म प्रमाण-पत्र, माता-पिता के दस्तावेज, स्कूल सर्टिफिकेट (जैसे 10वीं की मार्कशीट), नागरिकता प्रमाण-पत्र (रजिस्ट्रेशन या नेचुरलाइजेशन) और वंशावली संबंधी दस्तावेजों के संयोजन पर भरोसा करते हैं। वोटर आईडी केवल मतदाता सूची में नाम दर्ज होने का प्रमाण है, आधार पहचान का, और राशन कार्ड कल्याण योजनाओं के लिए। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में SIR (स्पेशल इंटेंसिफाइड रिविजन) मामले में भी आधार को केवल पहचान दस्तावेज माना, नागरिकता का नहीं।

क्यों मायने रखता है यह मुद्दा?

यह स्पष्टिकरण ऐसे समय आया है जब देश में नागरिकता सत्यापन को लेकर चर्चाएं तेज हैं, खासकर असम और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में। सोशल मीडिया पर विपक्ष और यूजर्स ने सवाल उठाए हैं कि रोजमर्रा के दस्तावेजों पर भरोसा कैसे किया जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को एक व्यापक नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) की जरूरत है, जो नागरिकता का स्पष्ट रिकॉर्ड रखे।विदेश मंत्रालय ने पिछले वर्ष भी संसद में कहा था कि नागरिकता अधिनियम, 1955 ही इस विषय का नियंत्रक कानून है। पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया में पुलिस वेरिफिकेशन, आधार आदि सख्त जांच होती है, लेकिन यह प्रारंभिक सबूत ही है, निर्णायक नहीं।

विशेषज्ञों की राय

कई कानूनविदों का मानना है कि यह अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप है। अमेरिका जैसे देशों में पासपोर्ट नागरिकता का मजबूत प्रमाण माना जाता है, लेकिन भारत की विविधता और सीमा चुनौतियों को देखते हुए यहां प्रक्रिया अधिक जटिल है।सरकार को इस ‘ग्रे एरिया’ को दूर करने की दिशा में जल्द कदम उठाने चाहिए, ताकि आम नागरिकों को अनावश्यक परेशानी न हो। फिलहाल, नागरिकता के विवाद में कई दस्तावेजों का संयोजन ही सबसे मजबूत सबूत साबित होता है। यह मुद्दा एक बार फिर याद दिलाता है कि पहचान के दस्तावेज और नागरिकता के प्रमाण में अंतर है। सरकार की इस पुनरावृत्ति से हैरानी नहीं, बल्कि जागरूकता बढ़नी चाहिए।

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