नव्या और समायरा: मौत के मुहाने से उम्मीद की नई दुनिया तक
Baghpat news कुछ कहानियां सिर्फ खबर नहीं होतीं, बल्कि समाज की संवेदनाओं को आईना दिखाती हैं। बागपत की दो नवजात बेटियों की कहानी भी ऐसी ही है, जिन्होंने जन्म लेते ही जिंदगी की सबसे कठिन परीक्षा देखी, लेकिन मानवता और संवेदना ने उन्हें नई उम्मीद दे दी।
एक मासूम को जन्म के तुरंत बाद नाली में छोड़ दिया गया, जबकि दूसरी बच्ची रेलवे ट्रैक के किनारे झाड़ियों में मिली। दोनों की पहली पहचान बेबसी थी, लेकिन अब वे केवल बचाई गई बच्चियां नहीं हैं, बल्कि उम्मीद, ममता और नए भविष्य की प्रतीक बन चुकी हैं।
बुधवार को जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में एक भावुक दृश्य देखने को मिला, जब जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने दोनों मासूम बच्चियों से मुलाकात की। डीएम ने उन्हें गोद में उठाया, प्यार-दुलार किया और चिकित्सकों से उनके स्वास्थ्य, वजन, पोषण, संक्रमण से बचाव और उपचार व्यवस्था की जानकारी ली।
जिलाधिकारी ने अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिए कि दोनों बच्चियों की देखभाल में किसी भी प्रकार की लापरवाही न हो और उन्हें बेहतर से बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
जब किस्मत ने छोड़ा, इंसानियत ने थामा हाथ
दोनों बच्चियों की जिंदगी की शुरूआत बेहद दर्दनाक परिस्थितियों में हुई। पहली बच्ची को जन्म के बाद नाली में छोड़ दिया गया था। बताया गया कि प्रसव के बाद उसकी मां की अत्यधिक रक्तस्राव के कारण मौत हो गई और नवजात बच्ची जीवन के लिए संघर्ष करती रही।
वहीं दूसरी बच्ची रेलवे ट्रैक के किनारे झाड़ियों में मिली थी। उसकी रोने की आवाज सुनकर एक स्थानीय महिला ने उसे देखा और बिना देर किए अस्पताल पहुंचाया। समय पर मिली मदद ने उसकी जिंदगी बचा ली।
नव्या और समायरा बनीं नई उम्मीद की पहचान
निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने दोनों बच्चियों को नया नाम भी दिया। नाली में मिली बच्ची का नाम नव्या रखा गया, जिसका अर्थ है नई शुरूआत और नई उम्मीद। वहीं रेलवे ट्रैक के किनारे मिली बच्ची का नाम समायरा रखा गया, जिसका अर्थ है ईश्वर की सुरक्षा में रहने वाली। ये नाम सिर्फ पहचान नहीं हैं, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक हैं कि किसी भी बच्चे का भविष्य उसकी जन्म परिस्थितियों से तय नहीं होता। सही देखभाल, संवेदना और सहयोग से हर जीवन को नई दिशा मिल सकती है।

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