सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला संदर्भ, संविधान के अनुच्छेदों को मिलाने से देश में धर्म ही समाप्त हो जाएगा, जस्टिस नागरत्ना

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर महिलाओं के प्रवेश विवाद पर संदर्भ सुनवाई के दौरान जस्टिस बी वी नागरत्ना ने आज चिंतनकारी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों को इस तरह आपस में मिला दिया जाए, तो देश में धर्म का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। यह बयान धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन पर गहन बहस के बीच आया है।

सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय संवैधानिक पीठ, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ कर रहे हैं, आज सबरीमाला मामले पर पांच दिनों की सुनवाई के अंतिम चरण में पहुंची। 2018 में 4:1 के बहुमत से सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी, लेकिन इसके खिलाफ दायर समीक्षा याचिकाओं को 2019 में बड़ी पीठ को संदर्भित कर दिया गया। आज की सुनवाई में जस्टिस नागरत्ना ने धार्मिक प्रथाओं की रक्षा पर जोर देते हुए कहा, “संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) को अनुच्छेद 14 (समानता) या 15 (लैंगिक भेदभाव निषेध) के साथ इस तरह घोल दिया जाए तो धर्म का कोई स्थान नहीं बचेगा।”

जस्टिस नागरत्ना ने आगे स्पष्ट किया कि संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत ‘सुधार’ की गुंजाइश दी है, लेकिन यह ‘विनाश’ के लिए नहीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि हर धार्मिक प्रथा को समानता के नाम पर चुनौती दी जाए, तो हिंदू धर्म की ‘एसेंशियल प्रैक्टिस’ (आवश्यक प्रथाएं) की अवधारणा ही खत्म हो जाएगी। पीठ के अन्य सदस्यों, जिनमें जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस जोएल फेलिक्स, जस्टिस अभय ओका, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस बेला त्रिवेदी शामिल हैं, ने भी इस पर बहस की। जस्टिस कौल ने पूछा कि क्या सबरीमाला की 10-50 वर्ष की महिलाओं पर रोक ‘एसेंशियल’ है या सांस्कृतिक परंपरा।

ताजा अपडेट के रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई दोपहर करीब 3 बजे समाप्त हुई। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि पीठ अब फैसला सुरक्षित रख रही है, जो आने वाले हफ्तों में आ सकता है। वकीलों ने बताया कि केंद्र सरकार ने हलफनामा दाखिल कर कहा है कि धार्मिक मामलों में अदालतें ‘हैंड्स ऑफ’ अप्रोच अपनाएं। सबरीमाला ट्रस्ट ने भी दलील दी कि यह प्रथा ‘नित्य’ (दैनिक) नहीं, बल्कि ‘नैमित्तिक’ (विशेष अवसरों पर) है, इसलिए महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। यह मामला न केवल सबरीमाला तक सीमित है, बल्कि पूरे देश में धार्मिक स्थलों पर लिंग आधारित प्रतिबंधों पर बहस छेड़ चुका है। इससे पहले 2020 में कोर्ट ने शनि शिंगणापुर और हजूर साहिब जैसे मामलों में भी हस्तक्षेप किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 26 (धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन) की व्याख्या को नया रूप देगा। सुनवाई के दौरान भारी सुरक्षा व्यवस्था रही, क्योंकि मामले ने धार्मिक भावनाओं को छुआ है। अब सभी की नजरें फैसले पर हैं, जो धार्मिक आजादी बनाम समानता के बीच संतुलन तय करेगा।

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