नई दिल्ली: मई महीने की पहली तारीख आम आदमी के लिए एक और झटका लेकर आई। पश्चिम बंगाल, असम समेत पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव खत्म होते ही सरकारी तेल कंपनियों ने कमर्शियल गैस सिलेंडर के दामों में भारी बढ़ोतरी कर दी। यह बढ़ोतरी सिर्फ एक आँकड़ा नहीं है — यह उन लाखों मजदूरों, ढाबा मालिकों, रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे होटल संचालकों की कमर तोड़ने वाला फैसला है, जिनकी पूरी रोजी-रोटी इसी गैस सिलेंडर पर टिकी है।
क्या हैं नए दाम? — रिकॉर्ड ऊँचाई पर पहुँचे कमर्शियल सिलेंडर
1 मई 2026 से कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर (19 किलो) की कीमतों में 993 रुपये और 5 किलो वाले सिलेंडर के दाम में 261 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। इस भारी वृद्धि के बाद दिल्ली में अब एक कमर्शियल सिलेंडर की कीमत 3,071.50 रुपये हो गई है, जो अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है। इससे पहले इसकी कीमत 2,078.50 रुपये थी। 5 किलो वाला सिलेंडर 549 रुपये से बढ़कर 810 रुपये हो गया है। यानी छोटे ढाबे और रेहड़ी वाले जो इसी छोटे सिलेंडर पर निर्भर थे, उनके लिए भी राहत नहीं है।
चार महीने में 1,430 रुपये की बढ़ोतरी — लगातार बढ़ता बोझ
यह कोई एकबारगी झटका नहीं है। साल की शुरुआत में 19 किलो का कमर्शियल सिलेंडर 1,669 रुपये में मिल रहा था, वहीं 1 मई तक इसकी कीमत बढ़कर 3,099 रुपये पहुँच गई है — यानी अब तक कुल 1,430 रुपये का इजाफा हो चुका है। जनवरी में 111 रुपये, फरवरी में 50 रुपये, मार्च में दो बार मिलाकर 146 रुपये, अप्रैल में 218 रुपये और अब मई में 993 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। यह आँकड़े बताते हैं कि महंगाई की रफ्तार हर महीने तेज होती जा रही है।
होटल, ढाबे और रेस्टोरेंट — बढ़ेगी थाली की कीमत
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच सरकारी तेल कंपनियों ने कमर्शियल गैस सिलेंडर के दामों में एकमुश्त भारी बढ़ोतरी कर दी है, जिससे होटल, रेस्टोरेंट और छोटे व्यवसायों की लागत बढ़ना तय है। कॉमर्शियल सिलेंडर के दाम बढ़ने से रेस्टोरेंट मालिकों का खर्च बढ़ेगा। ऐसे में वे चाय, नाश्ते और थाली महंगी कर सकते हैं। शादियों की कैटरिंग भी महंगी हो सकती है। इसका सीधा अर्थ है कि जो मजदूर, रिक्शा चालक या दिहाड़ी कामगार बाहर खाना खाकर अपना पेट भरता था, उसकी थाली भी अब महंगी हो जाएगी। यानी महंगाई की मार दोहरी पड़ रही है — न घर में चैन, न बाहर राहत।
मजदूर वर्ग पर दोहरी मार
देश में करोड़ों दिहाड़ी मजदूर, निर्माण कामगार, रिक्शा चालक और घरेलू कामगार ऐसे हैं जो न तो घर में खाना बनाने का वक्त रखते हैं और न इतना पैसा। इनकी निर्भरता सड़क किनारे के ढाबों, चाय की दुकानों और सस्ते होटलों पर होती है। जैसे ही कमर्शियल सिलेंडर महंगा होता है, उन ढाबों की थाली का दाम बढ़ता है और इस वर्ग की मुट्ठीभर कमाई में से और कटौती हो जाती है। एक तरफ मजदूरी नहीं बढ़ी, दूसरी तरफ खर्च बढ़ता जा रहा है — यही असमानता की सबसे क्रूर तस्वीर है।
घरेलू सिलेंडर — राहत या छलावा?
आम आदमी के लिए राहत की बात यह है कि 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। दिल्ली में घरेलू सिलेंडर अभी भी 913 रुपये पर स्थिर है। घरेलू गैस की कीमतों में अंतिम बार 7 मार्च 2026 को 60 रुपये की बढ़ोतरी की गई थी। लेकिन यह राहत केवल कागज पर है। जब बाजार में हर चीज का दाम बढ़ रहा हो — चाय, खाना, सब्जी, परिवहन — तो घरेलू सिलेंडर के दाम न बढ़ने से आम आदमी को कोई खास फर्क नहीं पड़ता।
अमीर और अमीर, गरीब और गरीब — बढ़ती खाई
महंगाई की यह लहर समाज की पहले से मौजूद आर्थिक असमानता को और गहरा कर रही है। बड़े होटल और रेस्टोरेंट चेन अपनी कीमतें बढ़ाकर घाटा आसानी से ग्राहकों पर डाल देते हैं और मुनाफा कमाते रहते हैं। लेकिन गली-मोहल्ले का छोटा ढाबेदार, जिसके पास पहले से ही पूँजी नहीं है, वह न दाम बढ़ा सकता है — क्योंकि उसका ग्राहक भी गरीब है — और न नुकसान सह सकता है। नतीजा? या तो वह दुकान बंद कर देता है या खाने की गुणवत्ता से समझौता करता है। मजदूर वर्ग की जेब पहले से खाली है। तनख्वाह वही रहती है, लेकिन हर महीने महंगाई उनकी क्रय शक्ति को निगल जाती है। यही वह चक्र है जो अमीर को और अमीर और गरीब को और गरीब बनाता जा रहा है।
राजनीतिक घमासान — विपक्ष का हमला, सरकार बेजवाब
गैस सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद राजनीतिक माहौल भी गरमा गया है। कांग्रेस ने आँकड़े साझा करते हुए दावा किया कि पिछले चार महीनों में कमर्शियल सिलेंडर की कीमतों में कुल 1,518 रुपये की बढ़ोतरी हो चुकी है। पार्टी का कहना है कि इससे व्यापारियों और आम जनता दोनों पर आर्थिक बोझ बढ़ा है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि चुनाव खत्म होते ही महंगाई का बम फोड़ा जाता है। उनका सवाल है — क्या आम आदमी की तकलीफ केवल चुनाव तक याद रहती है?
क्या होना चाहिए? — जरूरी है नीतिगत हस्तक्षेप
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को कमर्शियल सिलेंडर पर छोटे व्यवसायियों के लिए सब्सिडी या राहत योजना लानी चाहिए। ढाबा संचालकों, छोटे होटलों और स्ट्रीट फूड विक्रेताओं को महंगाई से राहत देने के लिए विशेष पैकेज की जरूरत है। अगर यही हाल रहा, तो शहरों में काम करने वाला मजदूर वर्ग भूखे पेट काम करने पर मजबूर होगा — और यह न सिर्फ उनकी समस्या होगी, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए संकट बनेगा।

