नोएडा। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में किसानों की समस्याओं को लेकर लगातार धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं। मुआवजा, आबादी, विकसित भूखंड, जमीन अधिग्रहण और डूब क्षेत्र में बिजली जैसी समस्याएं लंबे समय से किसानों के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। लेकिन इन वास्तविक समस्याओं के बीच अब किसान संगठनों के आंदोलन के तौर-तरीकों और उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
हालांकि, किसी किसान संगठन पर ब्लैकमेलिंग या लेनदेन के आरोप को बिना पुलिस जांच या न्यायिक निष्कर्ष के तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन धरना-प्रदर्शन के दौरान रास्ते रोकने, सरकारी कामकाज प्रभावित होने और पुलिस से विवाद जैसी घटनाओं ने प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था की चुनौती जरूर बढ़ाई है।
तीनों प्राधिकरणों पर किसानों के धरने
सितंबर 2026 में नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण कार्यालयों पर किसानों की महापंचायत और धरना-प्रदर्शन हुए। रिपोर्टों के मुताबिक किसानों ने मुआवजा, आबादी के मुद्दे, विकसित भूखंड और अन्य मांगों को लेकर आंदोलन किया। कुछ स्थानों पर किसानों के प्रदर्शन के कारण यातायात भी प्रभावित हुआ।
इससे पहले भी नोएडा के किसानों की जमीन अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़ी मांगों को लेकर बड़े आंदोलन होते रहे हैं। दिसंबर 2024 में किसानों के दिल्ली कूच के दौरान नोएडा में 160 से अधिक प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी की रिपोर्ट सामने आई थी।
अब आंदोलन के तरीकों पर भी सवाल
किसानों की मांगें अपनी जगह हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर मांग को पूरा कराने के लिए सड़क जाम, प्राधिकरण कार्यालयों में तालाबंदी या लगातार दबाव बनाने का रास्ता अपनाना जरूरी है?
हाल में सेक्टर-113 क्षेत्र में डूब क्षेत्र में बिजली की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया। पुलिस के मुताबिक 40 नामजद और करीब 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ यातायात बाधित करने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की के आरोप में FIR दर्ज की गई है। यह पुलिस का आरोप है और मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है।
क्या किसान मुद्दों के नाम पर निजी मामलों का दबाव बनाया जा रहा है?
नोएडा-ग्रेटर नोएडा में अलग-अलग किसान संगठनों की सक्रियता के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या हर आंदोलन का उद्देश्य व्यापक किसान हित है या कुछ मामलों में स्थानीय विवादों और व्यक्तिगत हितों को भी किसान मुद्दे के रूप में उठाया जा रहा है।
लेनदेन या ब्लैकमेलिंग जैसे गंभीर आरोपों की पुष्टि के लिए ठोस सबूत, शिकायत, FIR या जांच रिपोर्ट जरूरी है। इसलिए ऐसे आरोपों को किसी संगठन या व्यक्ति के खिलाफ तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। यदि किसी मामले में पुलिस या जांच एजेंसी को ऐसी शिकायत मिलती है तो उसकी जांच के बाद ही जिम्मेदारी तय हो सकती है।
चुनावी माहौल में प्रशासन के सामने चुनौती
आगामी विधानसभा चुनावों से पहले किसान मुद्दे राजनीतिक रूप से संवेदनशील बने हुए हैं। ऐसे माहौल में पुलिस और प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ किसानों की वैध मांगों पर बातचीत और समाधान की प्रक्रिया जारी रखना और दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था बनाए रखना।
यह कहना कि पुलिस केवल चुनाव के कारण किसानों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है, बिना आधिकारिक रिकॉर्ड के पुष्ट तथ्य नहीं माना जा सकता। हालांकि, प्रशासन को यह जरूर सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी संगठन या व्यक्ति के साथ कार्रवाई केवल उसके राजनीतिक प्रभाव या दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हो।
असली किसान समस्या और आंदोलन की राजनीति में फर्क जरूरी
नोएडा क्षेत्र के किसानों की कई मांगें लंबे समय से लंबित बताई जाती हैं। 2025 में 81 गांवों के किसानों ने नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ प्रदर्शन किया था और मुआवजा, आबादी की जमीन तथा अन्य अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाए थे। उस समय प्राधिकरण ने किसानों की समस्याओं को नियमों के तहत देखने का आश्वासन दिया था।
इसलिए किसान संगठनों के हर आंदोलन को एक ही नजर से देखना भी उचित नहीं होगा। जहां वास्तविक समस्याओं के लिए शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक आंदोलन जरूरी हैं, वहीं कानून तोड़ने, आम लोगों का रास्ता रोकने या किसी व्यक्ति पर बिना प्रमाण गंभीर आरोप लगाने की स्थिति में पुलिस और प्रशासन को कानून के मुताबिक कार्रवाई करनी होगी।
अब जरूरत इस बात की है कि प्राधिकरण किसानों की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए स्पष्ट समयसीमा तय करे और प्रशासन यह सुनिश्चित करे कि किसान आंदोलन के नाम पर किसी व्यक्ति या संस्था पर अनुचित दबाव बनाने की शिकायत सामने आती है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो।

