ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा के एक पुराने वायरल बयान को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद तेज हो गया है। बयान में उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था, मंदिरों और पुजारियों का जिक्र करते हुए महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठाए थे। इसी बीच मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों को मिल रही ‘ब्लैंकेट इम्यूनिटी’ को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है।
विवाद क्या है?
2 नवंबर 2026 के आसपास सोशल मीडिया पर नेहा बोरा का एक पुराना वीडियो वायरल हुआ। इसमें वे कहती दिख रही हैं—‘बिल्कुल सुरक्षा की जरूरत है और ब्राह्मणवादी व्यवस्था से ही सुरक्षा की जरूरत है। वो व्यवस्था जो कहती है कि गरीब, शुद्र, पशु और नारी ताड़ना के अधिकारी हैं। यह वही व्यवस्था है, जिसके चलते ब्राह्मण महिलाएं असुरक्षित हैं। उनका रेप होता है। मंदिरों में पुजारी रेप करते हैं। ऐसी घटनाएं उन्नाव में, कठुआ में हम लोगों को देखने को मिलते हैं।’
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ध्रुव कुमार ने आरोप लगाया है कि बोरा ने ‘ढोल, गवार, शूद्र, पशु, नारी—ये सब ताड़न के अधिकारी’ वाली पंक्ति का “बिल्कुल गलत इंटरप्रिटेशन” किया है। उनका कहना है कि इसका संदर्भ ‘तारन’ यानी संरक्षण या देखभाल का है, ‘ताड़ना’ यानी प्रताड़ित करने का नहीं।ध्रुव कुमार ने आरोप लगाया कि बोरा धार्मिक ग्रंथों की “गलत विवेचना” कर जनता को गुमराह कर रही हैं और समाज में आपसी नफरत का माहौल बना रही हैं। हालांकि, यह उनका व्यक्तिगत आरोप है; अभी तक किसी अदालत या स्वतंत्र भाषाविदों की संस्थागत राय से यह निर्णय नहीं हुआ है कि उक्त पंक्ति का कौन-सा अर्थ निर्णायक है।
इस बयान पर भाजपा ने तीखा हमला बोला। राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने इसे हिंदू-विरोधी बताया और राहुल गांधी से जोड़ते हुए आरोप लगाया। INDIA गठबंधन के भीतर भी प्रतिक्रिया आई। शिवसेना (यूबीटी) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इसे ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया और कहा कि बलात्कार को मंदिरों या पुजारियों से जोड़ने वाली मानसिकता गलत है। समाजवादी पार्टी के नेताओं ने भी आम टिप्पणी करने से परहेज करने की सलाह दी।
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में भी स्थानीय लोगों ने कोतवाली में शिकायत दर्ज कराई। दिल्ली की अधिवक्ता अमिता सचदेवा ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196 के तहत शिकायत दी है। उन्होंने कहा कि ऐसे बयान समुदायों के बीच दुश्मनी पैदा करते हैं। कार्रवाई न होने पर कोर्ट जाने की चेतावनी दी गई है।
‘ताड़ना’ शब्द की व्याख्या को लेकर भी बहस हुई है। कुछ आलोचक इसे ग्रंथों की गलत व्याख्या बताते हैं, जबकि समर्थक इसे सामाजिक व्यवस्था की आलोचना मानते हैं। अभी तक किसी स्वतंत्र भाषाविद् या अदालत ने निर्णायक राय नहीं दी है।
CEC इम्यूनिटी पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
4 नवंबर 2026 को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन-जजों की बेंच (जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना) ने ‘चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स एक्ट, 2023’ की धारा 16 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। मामले को 18 दिसंबर के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
धारा 16 CEC और चुनाव आयुक्तों को आधिकारिक कर्तव्य निभाते समय किए गए कार्यों, कथनों या निर्णयों के लिए दीवानी व आपराधिक कार्रवाई से आजीवन संरक्षण देती है। याचिकाकर्ताओं (जिनमें आरजेडी सांसद मनोज झा और अधिवक्ता अरुण कुमार अग्रवाल शामिल) का तर्क है कि यह छूट अत्यधिक है, जवाबदेही कमजोर करती है और संविधान के मूल ढांचे (न्यायिक समीक्षा) का उल्लंघन करती है। वे कहते हैं कि राष्ट्रपति, राज्यपाल या न्यायाधीशों जैसी अन्य संस्थाओं को भी इतनी व्यापक इम्यूनिटी नहीं मिली है।
सुप्रीम कोर्ट ने अभी धारा की वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं की है। यह मामला SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) संबंधी याचिकाओं के बीच आया है।
आगे क्या?
नेहा बोरा के बयान पर पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं जारी रह सकती हैं। पिथौरागढ़ और दिल्ली दोनों जगह शिकायतें दर्ज हैं। CEC इम्यूनिटी का मामला दिसंबर में सुनवाई के लिए खुला है। दोनों मुद्दे वर्तमान राजनीतिक-चुनावी माहौल में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं।

