Delhi State Cancer Institute: मुफ्त इलाज का सपना टूटा, करोड़ों की मशीनें धूल खा रहीं, मरीज निजी सेंटरों में ठगे जा रहे

Delhi State Cancer Institute: नई दिल्ली। दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (डीएससीआई) को जरूरतमंद कैंसर मरीजों को मुफ्त और कम खर्चीला इलाज देने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था। लेकिन आज यह संस्थान बदहाली का प्रतीक बन चुका है। इंडियन एक्सप्रेस के विस्तृत रिपोर्ट ने यहां की पांच बड़ी कमियों को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, यहां करोड़ों रुपये की आधुनिक मशीनें धूल खा रही हैं, जरूरी दवाओं का स्टॉक नहीं है, डॉक्टरों-स्टाफ की भारी कमी है और इमारत की हालत भी जर्जर हो चुकी है। नतीजतन, रोजाना आने वाले मरीजों की संख्या घटकर आधी से भी कम रह गई है और गरीब मरीज महंगे निजी सेंटरों का रुख करने को मजबूर हैं।

करोड़ों की मशीनें बेकार, मरीज बाहर जांच कराने को मजबूर

रिपोर्ट के अनुसार, अस्पताल में एडवांस पीईटी स्कैनर और रेडिएशन मशीनें समेत करीब 21 करोड़ रुपये की मशीनरी सिर्फ इसलिए बंद पड़ी है क्योंकि इन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ की भर्ती नहीं हुई। हाईकोर्ट में पेश दस्तावेजों और हालिया ऑडिट रिपोर्ट्स के मुताबिक, न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में 2017 में करीब 15.42 करोड़ रुपये (लगभग 2.5 मिलियन डॉलर) में खरीदा गया मेडिकल साइक्लोट्रॉन (पीईटी स्कैन के लिए रेडियोधर्मी आइसोटोप बनाने वाली मशीन) सालों से बेकार पड़ा है। कुछ रिपोर्ट्स में इसे 2018 से और कुछ में अप्रैल 2022 से बंद बताया गया है। इसके अलावा ड्यूल-हेड गामा कैमरा, मल्टीस्लाइस सीटी और अन्य इमेजिंग मशीनें भी “अंडर इवैल्यूएशन” या स्टाफ की कमी के कारण इस्तेमाल नहीं हो पा रही हैं।

परिणाम यह है कि मरीजों को पीईटी-सीटी स्कैन जैसी जरूरी जांच के लिए निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों का रुख करना पड़ रहा है, जहां उनसे 8,000 से 12,000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। एक मरीज सबरा (48) का उदाहरण रिपोर्ट में दिया गया है, जिन्होंने पिछले दो साल में सिर्फ दवाइयों पर 1.2 लाख रुपये खर्च किए और एक पीईटी-सीटी के लिए 12,000 रुपये निजी सेंटर में दिए। दिल्ली हाईकोर्ट ने जुलाई 2026 में इस स्थिति को “सार्वजनिक संसाधनों का घोर दुरुपयोग” बताया था और सभी दिल्ली सरकारी अस्पतालों में महंगे मेडिकल उपकरणों का ऑडिट कराने का आदेश दिया था। अगस्त में पेश ऑडिट रिपोर्ट्स में भी डीएससीआई की मशीनें प्रमुखता से सामने आईं।

दवाओं का स्टॉक नहीं, मरीज जेब से खरीद रहे

दूसरी बड़ी कमी दवाओं की है। अस्पताल में कैंसर की जरूरी दवाओं का नियमित स्टॉक नहीं रहता। मरीजों को ये दवाएं बाहर से महंगे दामों पर खरीदनी पड़ रही हैं। हाल ही में (अगस्त 2025 के अंत में) रिपोर्ट्स में बताया गया कि आवश्यक दवा सूची की कई दवाएं स्टॉक से गायब हैं। मरीज महंगी दवाएं जैसे ट्रैस्टुजुमैब (महीने 4,000-5,000 रुपये) खुद खरीदने को मजबूर हैं।

40% से ज्यादा पद खाली, डॉक्टर 44 दिन के कॉन्ट्रैक्ट पर

तीसरी और सबसे गंभीर समस्या स्टाफ की भारी कमी है। अस्पताल के 814 स्वीकृत पदों में से 40% से ज्यादा (कुछ रिपोर्ट्स में करीब 491) खाली हैं। डॉक्टरों को महज 44 दिनों के कॉन्ट्रैक्ट पर रखा जा रहा है। इससे तंग आकर कई स्पेशलिस्ट डॉक्टर प्राइवेट अस्पतालों में चले जा रहे हैं। रेगुलर डायरेक्टर की नियुक्ति भी सालों से लंबित रही है।

मरीजों की संख्या घटी, इमारत की हालत खराब

2006 से 2015 के बीच रोजाना करीब 1,500 मरीजों का इलाज होता था। अब बदहाली के कारण यह संख्या घटकर मात्र 500 रह गई है। अस्पताल की इमारत का बुरा हाल है—कीमोथेरेपी वार्ड बंद पड़े हैं, छत से वेंट गिर रहे हैं, कचरा फैला रहता है और वेटिंग एरिया में टूटे पाइप से बदबू आ रही है।

मंत्री का जवाब: सुधार कर रहे हैं, पिछली सरकार पर आरोप

इस रिपोर्ट के जवाब में दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज सिंह ने कहा है कि भाजपा सरकार इन कमियों को दूर कर रही है। उन्होंने आम आदमी पार्टी की पिछली सरकार पर मशीनें बेकार छोड़ने का आरोप लगाया। मंत्री ने बताया कि हर मशीन की मरम्मत का टाइमलाइन मांगा गया है और डॉक्टरों की भर्ती जल्द से जल्द पूरी की जाएगी। उनका कहना है कि प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी कैंसर मरीज महंगे निजी इलाज के लिए मजबूर न हो।

ताजा स्थिति, सितंबर 2026 तक

पिछले कुछ महीनों में कुछ सकारात्मक कदम भी देखे गए हैं। आईएचसी जांच दोबारा शुरू हुई, ब्रैकीथेरेपी सेवा शुरू की गई और कुछ भर्ती प्रक्रियाएं आगे बढ़ीं। फिर भी, मुख्य समस्याएं साइक्लोट्रॉन जैसी महंगी मशीनों का बंद रहना, स्टाफ की भारी कमी और दवाओं की उपलब्धता अभी भी बरकरार हैं। हाईकोर्ट की निगरानी में ऑडिट और सुधार प्रक्रिया चल रही है। डीएससीआई दिल्ली का एकमात्र समर्पित सरकारी कैंसर अस्पताल है। यहां की बदहाली न सिर्फ मरीजों के इलाज में देरी और अतिरिक्त खर्च का कारण बन रही है, बल्कि सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का भी उदाहरण पेश कर रही है। अब देखना यह है कि सरकार के वादे कितनी जल्दी जमीन पर उतरते हैं और जरूरतमंद मरीजों को वाकई मुफ्त व गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल पाता है या नहीं।

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