भीमा कोरेगांव हिंसा विवाद: मुंबई प्रेस क्लब में भीमा कोरेगांव मामले में आरोपी दस्तों की बैठक पर उठे विवाद के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने क्लब परिसर में औपचारिक दौरा किया है और संबंधित दस्तावेज मांगे हैं। सूत्रों के अनुसार, यह कार्रवाई उस जनवरी के कार्यक्रम की तह में की गई है, जिसमें जमानत पर बाहर आए भीमा कोरेगांव मामले के कई आरोपी शामिल हुए थे और जिसके बाद प्रेस क्लब की प्रबंधन समिति ने तीन सदस्यों को निलंबित व बाद में निष्कासित कर दिया।
क्या हुआ था जनवरी में?
19 जनवरी 2026 को मुंबई प्रेस क्लब के छत / टेरेस पर एक गैर‑आधिकारिक बैठक का आयोजन किया गया था, जिसमें भीमा‑कोरेगांव‑एल्गार परिषद मामले में उलझे वरवरा राव, अरुण फरेरा, आनंद तेल्तुंबड़े, रोना विल्सन, सुधीर धवाले, हनी बाबू, वर्नन गोंसाल्वेस और गौतम नवलखा जैसे ज़्यादातर आरोपी शामिल हुए थे, जिन पर सुप्रीम कोर्ट और एनआईए विशेष अदालत से जारी सख्त ज़मानत शर्तें लागू थीं। क्लब प्रबंधन का आरोप है कि इस आयोजन के बारे में अधिकृत अनुमति नहीं ली गई थी और ऐसा करने से संस्था की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा तथा कानूनी जोखिम बढ़ा।
क्लब की कड़ी कार्रवाई और सदस्यों की हकालपट्टी
अपने तीन‑सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर मुंबई प्रेस क्लब की प्रबंधन समिति ने जरनलिस्ट गुरबीर सिंह, बर्नाड डी’मेलो और श्रीकांत मोडक को “आरोपी व्यक्तियों की बैठक का आयोजन करने” और संस्था की गरिमा को चोट पहुंचाने के आरोप में निष्कासित कर दिया। क्लब की ओर से जारी आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया है कि यह घटना भी घटना‑स्थल की विशेष ज़मानत शर्तों के उल्लंघन की आशंका पैदा करती है, जिसमें आरोपी मुलाकातों और आयोजनों से जुड़े प्रतिबंधों पर जोर दिया गया है।
एनआईए का क्लब पहुंचना और दस्तावेज़ मांग
एनआईए की टीम ने क्लब के अधिकारियों से विस्तृत बैठक की और जनवरी की उस घटना से जुड़े आयोजन, आमंत्रित अतिथि, उपस्थिति‑सूचियां, भुगतान लेन‑देन और संचार‑सामग्री से संबंधित सभी दस्तावेज और रिकॉर्ड मांगे हैं। एजेंसी की ओर से यह साफ नहीं किया गया है कि क्या यह दौरा किसी नए मामले की रजिस्ट्री का हिस्सा है या पहले से चल रही भीमा कोरेगांव जांच से जुड़ा अनुसंधान है, लेकिन गैर‑सरकारी सूत्रों के अनुसार एजेंसी कार्यक्रम के आयोजन, फंडिंग और आयोजकों की भूमिका को जांच के दायरे में लेना चाहती है।
राजनीतिक और पत्रकारिता क्षेत्र में प्रतिक्रियाएं
क्लब की कार्रवाई और एनआईए के हस्तक्षेप ने पत्रकारिता और नागरिक‑समाज क्षेत्र में व्यापक चर्चा छेड़ दी है। कई सीनियर पत्रकारों ने क्लब के फैसले को “संवेदनशीलता की कमी” और “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दबाव” बताते हुए आलोचना की है, जबकि राजनीतिक दलों की एक ओर इसे “संस्थागत अनुशासन” की ज़रूरत का उदाहरण कहा जा रहा है। इस बीच भाजपा और अन्य दलों की कुछ शाखाओं ने प्रेस क्लब की प्रबंधन समिति की कार्रवाई को सराहा और भीमा कोरेगांव मामले में और दबाव बनाने की मांग की है, जबकि हाल के दिनों में बॉम्बे हाई कोर्ट ने आरोपी सागर गोरखे और रमेश गायचोर को अंतरिम जमानत देकर कार्यवाही की धारा पर भी सवाल उठाए हैं।
आगे के संभावित विकास
सूत्रों के अनुसार, एनआईए के दस्तावेज‑जांच के बाद भीमा‑कोरेगांव मामले से जुड़ी अन्य जांच‑फाइलों में क्लब की भूमिका को लेकर नए प्रश्न सामने आ सकते हैं, जिससे न केवल आरोपियों बल्कि कुछ पत्रकारों की गतिविधियों पर भी कानूनी समीक्षा हो सकती है। इसी बीच मुंबई प्रेस क्लब के भीतर भी ऐसी घटनाओं को लेकर नियम‑संहिता और “आयोजन‑नीति” की समीक्षा की मांग तेज हो रही है, ताकि संस्थागत अधिकार और पत्रकारिता स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाया जा सके।

