Zee Entertainment: नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने मीडिया कारोबारी डॉ. सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया में उनकी रीपेमेंट योजना को मंजूरी दे दी है। इसके तहत कर्जदाताओं को 22,006.57 करोड़ रुपये के दावों के बदले महज करीब 6.5 करोड़ रुपये मिलेंगे — यानी 99.97 प्रतिशत का हेयरकट। यह मामला भारत की व्यक्तिगत गारंटर इनसॉल्वेंसी व्यवस्था की सीमाओं को फिर से सामने ले आया है।
एस्सेल ग्रुप के संस्थापक और जी एंटरटेनमेंट के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा को उनकी व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया में एनसीएलटी से बड़ी राहत मिली है। ट्रिब्यूनल ने उनकी ओर से प्रस्तावित रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत कर्जदाताओं को 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के एवज़ में केवल लगभग 6.5 करोड़ रुपये वापस मिलेंगे। यह लगभग 99.97 प्रतिशत का हेयरकट है, जो हाल के वर्षों में सामने आए सबसे बड़े रिकवरी झटकों में से एक माना जा रहा है। यह आदेश एनसीएलटी सदस्य (न्यायिक) नीलेश शर्मा ने तीसरे सदस्य के तौर पर सुनाया। दरअसल मूल दो-सदस्यीय पीठ ने 3 सितंबर 2025 को इस मामले में बंटा हुआ फैसला (स्प्लिट वर्डिक्ट) दिया था, जिसके बाद मामला तीसरे सदस्य के पास भेजा गया। अब यह मामला दोबारा मूल दो-सदस्यीय पीठ के पास जाएगा, जो कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 419(5) के तहत बहुमत की राय के आधार पर औपचारिक आदेश पारित करेगी।
मामला कहां से शुरू हुआ
यह मामला 2022 में शुरू हुआ था, जब इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने विवेक इंफ्राकॉन को दिए गए कर्ज में डिफॉल्ट के बाद इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की धारा 95 के तहत सुभाष चंद्रा के खिलाफ व्यक्तिगत गारंटर के रूप में दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने का आवेदन दाखिल किया था। गौरतलब है कि यह कार्रवाई चंद्रा के खिलाफ व्यक्तिगत गारंटर के तौर पर है, न कि मूल कॉर्पोरेट कर्जदार कंपनियों के खिलाफ।
NCLT ने क्या कहा
एनसीएलटी ने अपने आदेश में कहा कि चंद्रा की मौजूदा घोषित नेटवर्थ करीब 31.79 करोड़ रुपये है। ट्रिब्यूनल के मुताबिक, दावों और वास्तविक चुकौती क्षमता के बीच का यह बड़ा फासला अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संपत्तियां छुपाई गई हैं या डायवर्ट की गई हैं। ट्रिब्यूनल ने यह दलील भी खारिज कर दी कि रीपेमेंट प्लान को मंजूरी देने से पहले फॉरेंसिक ऑडिट कराना अनिवार्य था। मंजूरी के साथ एक अहम बदलाव भी किया गया है। अनिल कुमार और सुनील जैन के ज़रिए 1,260 व्यक्तियों की ओर से दाखिल किए गए दावों को कर्जदाताओं की अंतिम सूची से बाहर कर दिया गया है। रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल को निर्देश दिया गया है कि वह बची हुई राशि को शेष पात्र कर्जदाताओं के बीच फिर से बांटे।
सरकार की सफाई: यह पूरी तस्वीर नहीं
आदेश सामने आने के बाद सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया कि यह मामला एक अपवाद है और इसे कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी के तहत होने वाली आम रिकवरी के प्रतिनिधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि यह कार्रवाई सिर्फ व्यक्तिगत गारंटर के खिलाफ है, मूल कर्जदार कंपनियों के खिलाफ नहीं। सूत्रों के अनुसार, मंज़ूर की गई योजना के तहत मूल कर्जदार कंपनियों की ओर से करीब 1,494 करोड़ रुपये का भुगतान भी प्रस्तावित है, जो चंद्रा की निजी तौर पर दी जाने वाली करीब 6.25 करोड़ रुपये की राशि से अलग है। इसके अलावा कर्जदाता कंपनियों की प्रतिभूतियों और अन्य उपलब्ध संपत्तियों के खिलाफ रिकवरी के रास्ते भी सुरक्षित रहेंगे। सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि IBC के तहत मार्च 2026 तक स्वीकृत रिज़ॉल्यूशन प्लान के ज़रिए कर्जदाताओं ने करीब 4.32 लाख करोड़ रुपये की वसूली की है, जो लिक्विडेशन वैल्यू का 116.85 प्रतिशत और फेयर वैल्यू का 94.56 प्रतिशत है। कोड लागू होने के बाद से 32,000 से ज़्यादा मामले इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया में दाखिल होने से पहले ही सुलझ चुके हैं, जिससे करीब 14 लाख करोड़ रुपये की संपत्तियां मुक्त हुई हैं।
व्यक्तिगत गारंटर इनसॉल्वेंसी: कागज़ पर मजबूत, अमल में कमजोर
सुभाष चंद्रा का मामला भले ही अपवाद हो, लेकिन यह भारत की व्यक्तिगत गारंटर इनसॉल्वेंसी व्यवस्था की गहरी संरचनात्मक कमजोरियों को भी उजागर करता है। नवंबर 2019 में लागू हुए इस प्रावधान का मकसद कंपनियों के प्रमोटरों और गारंटरों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह बनाना था, ताकि कर्जदाताओं को कॉर्पोरेट रिज़ॉल्यूशन में मिलने वाले भारी हेयरकट की भरपाई हो सके। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यह उद्देश्य बड़े पैमाने पर अधूरा रह गया है।
आईबीबीआई (IBBI) के आंकड़ों के अनुसार, आईबीसी के तहत अब तक व्यक्तिगत गारंटी के दावों में से महज करीब 2 प्रतिशत की ही वसूली हो पाई है। विशेषज्ञों का कहना है कि कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी में पहले से ही भारी हेयरकट झेल रहे कर्जदाताओं के लिए गारंटर से वसूली की प्रभावी व्यवस्था अहम है, लेकिन मौजूदा नतीजे उम्मीदों से कोसों दूर हैं। कई विश्लेषकों की राय है कि सख्त आकलन प्रक्रिया, कर्जदाताओं के हितों की बेहतर सुरक्षा और कर्जदारों की जवाबदेही तय किए बिना यह तंत्र प्रभावी नहीं हो सकेगा। समग्र कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी की तस्वीर भी उत्साहजनक नहीं है। सितंबर 2025 तक के आईबीबीआई आंकड़ों के मुताबिक, कर्जदाताओं ने कुल 12.31 लाख करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले करीब 3.99 लाख करोड़ रुपये ही वसूल किए हैं, यानी औसत हेयरकट करीब 67 प्रतिशत रहा है। इसमें भी करीब 40 प्रतिशत मामले पुराने बीआईएफआर (BIFR) या पहले से बंद पड़ी कंपनियों से जुड़े हैं, जहां वसूली दर और भी कम, महज करीब 18.74 प्रतिशत रही है।
आगे क्या
चंद्रा का मामला अब औपचारिक आदेश के लिए दोबारा मूल दो-सदस्यीय पीठ के पास जाएगा। इस बीच, यह प्रकरण एक बार फिर इस बहस को हवा दे गया है कि क्या भारत की व्यक्तिगत गारंटर इनसॉल्वेंसी व्यवस्था अपने मूल मकसद — बड़े कर्जदारों को जवाबदेह ठहराना और कर्जदाताओं को बेहतर वसूली दिलाना — में सफल हो पा रही है, या यह सिर्फ कागज़ी तौर पर मजबूत लेकिन व्यवहार में कमजोर एक और तंत्र बनकर रह गई है।

