नोएडा: (उत्तर प्रदेश) — उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों दो तस्वीरें साथ-साथ चल रही हैं, जो सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करती हैं। जहाँ एक ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर प्रदेश के सभी जिलों में जिलाधिकारी ‘नारी वंदन’ कार्यक्रमों के जरिए महिलाओं के सशक्तिकरण का गुणगान कर रहे हैं, वहीं ‘यूपी का शो-विंडो’ कहे जाने वाले नोएडा से आई तस्वीरों ने शासन-प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सेक्टर-8 में पुलिस का ‘रौद्र रूप’
नोएडा के सेक्टर-8 स्थित सनवॉइस (Sunvoice) कंपनी के बाहर अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही महिला कर्मचारियों के साथ पुलिस का व्यवहार चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रत्यक्षदर्शियों और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के अनुसार, जो महिला कर्मचारी हक की आवाज उठाने के लिए खड़ी थीं, पुलिस प्रशासन ने उन्हें जबरन खदेड़ा।
- धक्का-मुक्की और बल प्रयोग: आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने महिला श्रमिकों को धक्के मारकर वहां से भगाया।
- डंडे का डर: प्रदर्शनकारी महिलाओं का कहना है कि उन्हें डंडे के जोर पर डराया गया, जबकि वे केवल अपने वेतन या कार्यस्थल की समस्याओं पर बात करना चाहती थीं।
‘पाकिस्तानी कनेक्शन’ के बाद फिर भड़की चिंगारी
गौरतलब है कि बीते दिनों नोएडा में हुई हिंसा के पीछे ‘पाकिस्तान कनेक्शन’ की बात सामने आई थी, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियां सतर्क थीं। लेकिन इस गंभीर खुलासे के ठीक अगले दिन ही श्रमिकों का दोबारा आंदोलन पर उतर आना प्रशासन की विफलता माना जा रहा है।
“जब पुलिस को पता है कि स्थिति संवेदनशील है, तो श्रमिकों की समस्याओं का समाधान संवाद से करने के बजाय बल प्रयोग क्यों किया गया?” यह सवाल अब गलियारों में तैर रहा है।
विरोधाभासों का शहर: नोएडा
एक तरफ सरकार मिशन शक्ति और नारी सुरक्षा के बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाती है, वहीं दूसरी तरफ औद्योगिक नगरी में अपनी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रही महिलाओं के साथ ऐसा व्यवहार सरकार की ‘दोहरी नीति’ की ओर इशारा करता है।
मुख्य चिंताएं
- संवाद की कमी: प्रशासन और कंपनी प्रबंधन के बीच तालमेल की कमी का खामियाजा गरीब श्रमिकों को भुगतना पड़ रहा है।
- सुरक्षा बनाम दमन: सुरक्षा के नाम पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन को कुचलना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है।
- महिला सुरक्षा पर सवाल: नारी वंदन के दौर में महिला पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बिना (या उनकी उपस्थिति में भी) महिला श्रमिकों से बदसलूकी ‘मिशन शक्ति’ के दावों को खोखला साबित करती है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो नोएडा की इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि कागजों पर चलने वाले अभियान और सड़कों पर तैनात पुलिस के व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर है। यदि समय रहते श्रमिकों, विशेषकर महिलाओं की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो ‘शो-विंडो’ की यह चमक विवादों के धुएं में धुंधली पड़ सकती है।

