बसरा की वो तस्वीर जो अब बड़ी कहानी बन गई, ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ने इराक में बनाए गुप्त मिलिशिया सेल, खाड़ी देशों पर ड्रोन हमलों का आरोप

ट्रंप की तस्वीर जलाते इराकी शिया प्रदर्शनकारियों की यह तस्वीर जनवरी की है, लेकिन रॉयटर्स की एक नई खोजी रिपोर्ट बताती है कि उसके बाद ईरान-इराक रिश्तों में किस तरह की गहरी हलचल हुई — अमेरिका-ईरान युद्धविराम के बावजूद तेहरान का “प्रतिरोध नेटवर्क” अब भी जिंदा है

जनवरी 2026 की वह तस्वीर एक बार फिर सुर्खियों में है, जिसमें इराक के दक्षिणी शहर बसरा में ईरानी वाणिज्य दूतावास के बाहर इराकी शिया सशस्त्र समूहों के समर्थक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तस्वीर जलाते दिख रहे हैं। यह तस्वीर 13 जनवरी 2026 को तेहरान की सरकार के समर्थन में हुई एक रैली के दौरान खींची गई थी। रॉयटर्स के फोटोग्राफर मोहम्मद अती द्वारा ली गई यह तस्वीर अब समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक बड़ी खोजी रिपोर्ट के साथ फिर से सामने आई है, जो बताती है कि इराक में ईरान-समर्थक मिलिशिया गतिविधियां किस तरह नए और ज्यादा खतरनाक रूप ले चुकी हैं।

जनवरी में क्या हुआ था

जनवरी 2026 की शुरुआत में ईरान में सरकार-विरोधी प्रदर्शनों और उसके बाद हुई सख्त कार्रवाई के दौरान, इराक के शिया-बहुल इलाकों में तेहरान की हुकूमत के समर्थन में लगातार रैलियां निकाली गई थीं। इन प्रदर्शनों में कताइब हिज़्बुल्लाह, हरकत हिज़्बुल्लाह अल-नुजबा, कताइब सय्यद अल-शुहदा और बद्र संगठन जैसे ईरान-समर्थित गुटों के झंडे और बैनर खुलेआम लहराए गए। यह उन गुटों के पहले के रुख से अलग था—जून 2025 में ईरान-इस्राइल टकराव के समय इन्हीं मिलिशियाओं ने खुद को संघर्ष से दूर रखने का दावा किया था, लेकिन इस बार इन्होंने खुलकर तेहरान की सरकार का समर्थन किया और प्रदर्शनकारियों की आलोचना की। इसी दौर में यूरोपीय सैन्य सूत्रों के हवाले से यह भी बताया गया था कि दियाला, मायसान और बसरा प्रांतों से सैकड़ों शिया लड़ाके धार्मिक यात्रा की आड़ में ईरान में दाखिल हुए ताकि वहां की सरकार को आंतरिक कार्रवाई में मदद मिल सके। बाद में जनवरी के अंत तक नुजबा गुट के नेता अकरम अल-काबी ने भी ट्रंप प्रशासन पर इराक की संप्रभुता में हस्तक्षेप का आरोप लगाते हुए कड़ी चेतावनी दी।

28 फरवरी का युद्ध और उसके बाद की उलझन

28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद हालात और बिगड़ गए। “इस्लामिक रेजिस्टेंस इन इराक” नाम के बैनर तले काम करने वाले कट्टरपंथी शिया गुटों ने इराक में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर दर्जनों ड्रोन और रॉकेट हमलों की जिम्मेदारी ली, जिसके जवाब में अमेरिका ने भी कई जगह जवाबी हवाई हमले किए। हालांकि इराक की सरहदों के भीतर ईरान-समर्थक गुटों की कोई बड़े पैमाने पर लामबंदी नहीं देखी गई, क्योंकि कई ताकतवर शिया गुट पहले से ही हथियार छोड़कर घरेलू राजनीति पर ध्यान देने के संकेत दे रहे थे।

अब सामने आई बड़ी खबर: रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के “गुप्त सेल”

रॉयटर्स की 19 जून 2026 की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने इराक में नए, गुप्त मिलिशिया सेल खड़े किए हैं, ताकि अमेरिकी सेनाओं की मौजूदगी वाले खाड़ी देशों पर हमले किए जा सकें—और यह सब स्थापित मिलिशिया नेटवर्क से अलग, ताकि पकड़ में न आया जा सके। आठ इराकी सूत्रों ने रॉयटर्स को बताया कि तीन-चार ऐसे सेल बनाए गए हैं, जिनमें हर एक में करीब दस कुशल इराकी शिया लड़ाके शामिल हैं। इन सेलों ने बसरा और समावा के पास रेगिस्तानी इलाकों से 20 अप्रैल से 17 मई के बीच कुवैत, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में कम से कम सात ड्रोन हमले किए। सूत्रों के मुताबिक इन सेलों के कुछ सदस्य पहले इस्लामिक रेजिस्टेंस इन इराक से जुड़े थे, लेकिन नए गुट उसकी कमान-संरचना से बाहर हैं और सीधे आईआरजीसी को रिपोर्ट करते हैं। पूर्व इराकी सेना जनरल जासिम अल-बहादली के अनुसार, यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि कई बड़े शिया गुट हथियार छोड़ने के संकेत दे रहे थे—इसलिए आईआरजीसी ने अपने सीधे नियंत्रण वाले छोटे, ज्यादा कट्टर और कसकर नियंत्रित गुट बनाए, जो कम संसाधनों में भी असर डाल सकें।

निशाने पर क्या रहा

रिपोर्ट के अनुसार इन हमलों में कुवैत में अमेरिकी सैनिकों वाले अली अल-सलेम एयरबेस और देश के अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के एक सैन्य टर्मिनल को निशाना बनाया गया। सऊदी अरब ने 17 मई को अपनी सीमा में इराक से आए तीन ड्रोन रोकने का दावा किया था—इराकी अधिकारी इसे नए गुट की कार्रवाई बता रहे हैं। इराकी अधिकारी इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि क्या इसी दिन यूएई के बराकाह न्यूक्लियर पावर प्लांट में लगी आग के पीछे भी यही गुट जिम्मेदार था।

नई इराकी सरकार के लिए कड़ी परीक्षा

यह मामला इराक के नए प्रधानमंत्री अली अल-ज़ैदी के लिए शुरुआती और कठिन परीक्षा बन गया है, जिन्होंने पिछले महीने ही पद संभाला—वह भी अमेरिकी दबाव के बाद, जब वाशिंगटन ने ईरान-समर्थक पूर्व प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी की वापसी रोकने पर जोर दिया था। सोमवार को हुई एक बैठक में ज़ैदी और अमेरिकी दूत टॉम बैराक ने इराक में सक्रिय सभी हथियारबंद गुटों को पूरी तरह निरस्त्र करने और भंग करने की योजना पर चर्चा की।इस सिलसिले में दो प्रमुख गुटों, असाइब अहल अल-हक और इमाम अली ब्रिगेड, ने इस महीने अपने हथियार राज्य प्रशासन को सौंपने का एलान भी किया है। अमेरिकी विदेश विभाग ने दोहराया है कि इराकी सरकार को आईआरजीसी समर्थित आतंकी मिलिशियाओं समेत ईरान की सभी “अस्थिरता फैलाने वाली गतिविधियों” के औज़ार खत्म करने होंगे।

युद्धविराम तो हुआ, लेकिन प्रतिरोध-नेटवर्क का सवाल अनसुलझा

बुधवार को अमेरिका और ईरान के राष्ट्रपतियों ने युद्ध खत्म करने के लिए एक अंतरिम समझौते पर दस्तखत किए, जिसके बाद परमाणु कार्यक्रम जैसे जटिल मुद्दों पर आगे बातचीत होनी है। लेकिन ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि तेहरान का अपने “प्रतिरोध गुटों” को समर्थन देना बातचीत का विषय नहीं है, और यह समझौता इस मुद्दे को छूता भी नहीं। यानी इराक, लेबनान और यमन में मौजूद ईरान-समर्थित नेटवर्क पर इसका सीधा असर नहीं पड़ेगा।

क्षेत्रीय “एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस” कमजोर, पर खत्म नहीं

विश्लेषकों का मानना है कि गाजा में हमास, लेबनान में हिज़्बुल्लाह और यमन में हूती आंदोलन पर लगातार हुई सैन्य कार्रवाइयों, और दिसंबर 2024 में सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद के पतन ने ईरान के दशकों पुराने क्षेत्रीय नेटवर्क को बुरी तरह कमजोर किया है। इसी कमजोरी के बीच आईआरजीसी अब बड़े, महंगे मिलिशिया ढांचे के बजाय छोटे, अधिक वफादार और गोपनीय लड़ाकू दस्तों पर निर्भर होता दिख रहा है ऐसे दस्ते जो कम संसाधनों में भी असर डाल सकें। कुवैत, सऊदी अरब और यूएई ने अप्रैल में हुए हमलों को लेकर इराकी राजदूतों को बुलाकर कड़ा एतराज जता दिया था। इराक के लिए यह स्थिति बेहद नाजुक है—वह वाशिंगटन और तेहरान, दोनों के बीच पहले से ही संतुलन बनाने की कोशिश में जुटा है, और अब खाड़ी पड़ोसियों से रिश्ते बिगड़ने का खतरा भी बढ़ गया है, जो सद्दाम हुसैन के कुवैत पर हमले के बाद से ही तनावपूर्ण रहे हैं और हाल के वर्षों में सुधरने लगे थे।

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