नई दिल्ली। राजस्थान के कोटा की 15 वर्षीय किशोरी तन्वी परियानी की एम्स दिल्ली में मौत ने एक बार फिर बड़े सरकारी अस्पतालों में लंबी प्रतीक्षा, जटिल मामलों के प्रबंधन और संचार की कमी के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है। तन्वी जन्मजात हृदय दोष (वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट यानी VSD के साथ पल्मोनरी एट्रेशिया) से पीड़ित थीं। दो साल की उम्र से एम्स के चक्कर काट रही थीं। 1 सितंबर 2026 तड़के कार्डियक अरेस्ट के बाद उनका निधन हो गया। पिता मुकेश परियानी ने अस्पताल प्रशासन और डॉक्टरों पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि समय पर सर्जरी की होती तो बेटी बच जाती। एम्स ने मामले की विस्तृत जांच के लिए समिति गठित कर दी है।
पिता का आरोप: तारीख पर तारीख, ऑपरेशन कभी नहीं हुआ
मुकेश परियानी का बयान कई समाचार माध्यमों में आया है। उनके अनुसार, 10 अक्टूबर 2012 को पहली बार बेटी को एम्स ओपीडी ले गए। कमरा नंबर 14 से 18 भेजा गया। डॉ. कोठारी ने शुरुआती जांच की। करीब एक साल बाद डॉ. सचिन तलवार (रूम नंबर 4) के पास रेफर किया गया। 4 अप्रैल 2014 को पैसे और खून जमा कराने को कहा गया। सर्जरी की तारीख दी गई। 2 सितंबर 2015 को पहुंचे तो दिवाली के बाद की बात कही गई। इसके बाद बार-बार टालमटोल हुई। पीएमओ में शिकायत की तो अस्पताल से फोन आया, लेकिन शिकायत वापस लेने की शर्त पर ऑपरेशन की बात कही गई। 2018 में जांच कराई गई, लेकिन बीमारी की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। 2023 में फिर मना कर दिया गया। 2025 में दोबारा शिकायत की। 28 जुलाई 2025 को बुलाया गया तो डॉक्टर छुट्टी पर थे। दवा से चलने की बात कहकर लौटा दिया गया। 9 फरवरी 2026 को फिर शिकायत दर्ज कराई। जांच पर जांच चलती रही, लेकिन ऑपरेशन कभी नहीं हुआ। “अगर 2015, 2016 या 2017 में ऑपरेशन हो जाता तो मेरी बेटी आज जिंदा होती। कौन जिम्मेदार है? सख्त कार्रवाई हो, जांच हो, न्याय मिले,” मुकेश परियानी ने कहा। परिवार का दावा है कि 13-14 साल में सौ से ज्यादा बार दिल्ली-कोटा का चक्कर काटा गया। मां भाविका परियानी ने भी लापरवाही का आरोप लगाया है।
अस्पताल का पक्ष: सर्जरी संभव नहीं थी, जटिल एनाटॉमी
एम्स के अनुसार, तन्वी को 2012 में VSD के साथ पल्मोनरी एट्रेशिया का निदान हुआ। 2013 में विस्तृत जांच (सीटी एंजियोग्राफी, कैथीटराइजेशन आदि) हुई। 31 जनवरी 2014 के अनुमान पत्र में ‘यूनिफोकलाइजेशन एंड कंड्यूट’ सर्जरी की सिफारिश थी और खर्च करीब 1.20-1.25 लाख रुपये बताया गया था। बाद में 2017-18 के आकलन में पाया गया कि फेफड़ों को रक्त पहुंचाने वाली प्रमुख रक्त वाहिकाएं लगभग अनुपस्थित थीं। जटिल हृदय संरचना के कारण सुधारात्मक सर्जरी संभव नहीं मानी गई। मरीज को दवाओं से प्रबंधित किया गया और नियमित फॉलोअप की सलाह दी गई। अगस्त 2026 में हालत बिगड़ने पर 24 अगस्त को भर्ती किया गया। हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट की संभावना का आकलन चल रहा था। 1 सितंबर तड़के करीब 2:50 बजे थकान और कमजोरी की शिकायत हुई। ऑक्सीजन सैचुरेशन 48 प्रतिशत तक गिर गया। सायनोसिस बढ़ा। ऑक्सीजन सपोर्ट शुरू किया गया, लेकिन हाइपोक्सिक स्पेल के बाद कार्डियक अरेस्ट हो गया। सभी प्रयासों के बावजूद 5:06 बजे मृत घोषित कर दिया गया।
जांच समिति गठित
एम्स के कार्यकारी निदेशक डॉ. निखिल टंडन ने मामले की समीक्षा के लिए समिति बनाई है। समिति संपूर्ण उपचार इतिहास, मेडिकल रिकॉर्ड, जांच, विशेषज्ञ राय, मौत की परिस्थितियों और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की जांच करेगी। परिवार की शिकायतों और मीडिया रिपोर्ट्स के मद्देनजर यह कदम उठाया गया है।
13 साल की यात्रा (संक्षेप में)
2012: पहली बार एम्स, निदान VSD + पल्मोनरी एट्रेशिया।
2013-14: विस्तृत जांच, सर्जरी की सिफारिश और अनुमान पत्र।
2015: परिवार के अनुसार तारीख दी गई, फिर टाली गई।
2016-18: शिकायतें, आकलन में सर्जरी असंभव मानी गई।
2023-25: दोबारा प्रयास और शिकायतें।
अगस्त 2026: ट्रांसप्लांट मूल्यांकन के लिए भर्ती।
1 सितंबर 2026: मौत।
यह मामला जन्मजात हृदय रोगों के जटिल प्रबंधन, लंबी प्रतीक्षा सूची, डॉक्टर-परिवार संचार और बड़े संस्थानों में संसाधनों की चुनौतियों को उजागर करता है। परिवार न्याय की मांग कर रहा है, जबकि अस्पताल कहता है कि चिकित्सा दृष्टि से सुधारात्मक सर्जरी संभव नहीं थी। जांच समिति की रिपोर्ट आने के बाद ही पूरी तस्वीर साफ होगी।

