नोएडा। बरौला और आसपास के इलाकों में लंबे समय से चल रहे अवैध निर्माण को लेकर नोएडा प्राधिकरण की कार्रवाई अब सवालों के घेरे में आ गई है। मंगलवार को प्राधिकरण के औचक निरीक्षण में बरौला में अवैध निर्माण जारी मिला, जिसके बाद संविदा पर तैनात जूनियर इंजीनियर और सुपरवाइजर को हटाने के निर्देश दिए गए। निरीक्षण के दौरान वर्क सर्किल के वरिष्ठ प्रबंधक की ओर से एफआईआर और नोटिस की कार्रवाई का हवाला दिया गया, लेकिन अधिकारी इससे संतुष्ट नहीं हुए।
कार्रवाई होना जरूरी है, लेकिन असली सवाल यह है कि बरौला में बड़े पैमाने पर खड़े हो चुके शोरूम, कई मंजिला इमारतें और फ्लैट क्या महज पिछले दो महीनों में तैयार हो गए? अगर अवैध निर्माण वर्षों से चल रहा था तो उसकी जिम्मेदारी केवल उस जेई पर डालना, जो करीब दो महीने पहले ही वहां तैनात हुआ, पूरी व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
नए जेई ने कराई एफआईआर, फिर भी कार्रवाई का ठीकरा उसी पर?
स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक, करीब दो महीने पहले बरौला क्षेत्र में नए जेई की तैनाती हुई थी। इसके बाद अवैध निर्माण के खिलाफ एफआईआर कराने और निर्माण कार्यों को रुकवाने की कार्रवाई भी की गई। कई स्थानों पर निर्माणाधीन ऊंची इमारतों पर कार्रवाई की कोशिश की गई। ऐसे में सवाल यह है कि जिस अधिकारी ने हाल में चार्ज संभालने के बाद कार्रवाई शुरू की, उसे ही पूरी व्यवस्था की विफलता का जिम्मेदार कैसे माना जा सकता है?
अगर किसी क्षेत्र में अवैध निर्माण कई वर्षों से लगातार बढ़ता रहा है तो इसकी जांच केवल मौजूदा जेई तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उस अवधि में तैनात रहे सभी संबंधित जेई, सुपरवाइजर और वर्क सर्किल प्रभारियों की भूमिका की भी रिकॉर्ड के आधार पर जांच होनी चाहिए।
बरौला में वर्षों से बनते रहे शोरूम और फ्लैट, तब कौन देख रहा था?
बरौला और आसपास के इलाकों में जिस तरह बड़े पैमाने पर निर्माण खड़े हुए हैं, उन्हें देखकर यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि निर्माण की शुरुआत से लेकर कई मंजिलों तक पहुंचने के दौरान प्राधिकरण की निगरानी व्यवस्था कहां थी।
किसी भी अवैध निर्माण को खड़ा होने में एक-दो दिन नहीं लगते। खासकर बहुमंजिला इमारतों, शोरूम और फ्लैटों के निर्माण में लंबे समय तक निर्माण सामग्री, मजदूर, मशीनरी और लगातार गतिविधियां चलती हैं। ऐसे में यदि प्राधिकरण की फील्ड मॉनिटरिंग व्यवस्था सक्रिय थी तो इतने बड़े निर्माण अधिकारियों की नजर से कैसे बचते रहे? और यदि अधिकारियों को इन निर्माणों की जानकारी थी, तो समय रहते प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
कार्रवाई में ‘सौतेला व्यवहार’ का सवाल क्यों?
मामला सिर्फ एक जेई को हटाने का नहीं है। सवाल जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया का है। यदि किसी क्षेत्र में अवैध निर्माण के लिए फील्ड स्तर के कर्मचारी जिम्मेदार हैं तो उस समय उस क्षेत्र की निगरानी करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों और वर्क सर्किल प्रभारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए। आखिर वर्क सर्किल में जेई अकेले काम नहीं करता। उसके ऊपर निगरानी और प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करने के लिए पूरा तंत्र मौजूद होता है।
ऐसे में यदि कार्रवाई केवल मौजूदा जेई तक सीमित रहती है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि पहले से चले आ रहे अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदारी किसकी थी?
CEO कृष्ण करुणेश से रिकॉर्ड के आधार पर जांच की मांग
नोएडा प्राधिकरण के सीईओ कृष्ण करुणेश के सामने अब इस पूरे मामले की निष्पक्ष और रिकॉर्ड आधारित जांच कराने की जरूरत दिखाई देती है। प्राधिकरण यह पता लगाए कि बरौला क्षेत्र में पिछले कई वर्षों के दौरान कौन-कौन से जेई, सुपरवाइजर और वर्क सर्किल प्रभारी तैनात रहे। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि संबंधित अधिकारियों ने कितने नोटिस जारी किए, कितनी एफआईआर दर्ज कराई गईं, कितने निर्माण कार्य रुकवाए गए और किन मामलों में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई प्रस्तावित या की गई।
यदि रिकॉर्ड में यह सामने आता है कि मौजूदा जेई ने चार्ज संभालने के बाद कार्रवाई शुरू की थी, तो उसके खिलाफ की गई कार्रवाई की परिस्थितियों की भी समीक्षा होनी चाहिए। वहीं यदि किसी पूर्व अधिकारी की लापरवाही सामने आती है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।
सिर्फ छोटे कर्मचारी पर कार्रवाई से खत्म नहीं होगी समस्या
नोएडा में अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई को लेकर प्राधिकरण लगातार सख्त रुख अपनाने की बात करता रहा है। इससे पहले भी सीईओ स्तर से अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए जाते रहे हैं। जून में डूब क्षेत्र के अवैध निर्माणों को लेकर संबंधित वर्क सर्किल के अधिकारियों को समयबद्ध कार्रवाई नहीं होने पर हटाने की चेतावनी भी दी गई थी।
ऐसे में बरौला का मामला एक कर्मचारी पर कार्रवाई से आगे जाकर पूरे निगरानी तंत्र की जवाबदेही तय करने का विषय बन गया है।
प्राधिकरण को यह स्पष्ट करना होगा कि यदि बरौला में वर्षों से अवैध निर्माण होता रहा तो उस दौरान तैनात अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की? यदि कार्रवाई की तो उसका परिणाम क्या हुआ? और यदि कार्रवाई नहीं की तो उसकी जिम्मेदारी किसकी थी? बरौला में अवैध निर्माण की असली तस्वीर तभी सामने आएगी, जब जांच सिर्फ उस अधिकारी तक सीमित न रहकर पूरे कार्यकाल और पूरे वर्क सर्किल की जिम्मेदारी तय करेगी।

