मेरठ: पति अमित कश्यप की गला घोंटकर हत्या करने और मौत को सांप के डसने से हुई दिखाने वाली रविता और उसके प्रेमी अमरदीप को शुक्रवार (16 अक्टूबर 2026) को मेरठ जिला कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है। वारदात के 547 दिन बाद एडीजे-12 जयवीर सिंह नागर की अदालत ने दोनों को रेयरेस्ट ऑफ रेयर श्रेणी में रखते हुए मृत्युदंड दिया। सजा सुनाने से पहले कोर्ट ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दोनों का पक्ष सुना। जज ने पूछा— “तुम दोनों को हत्या का दोषी ठहराया गया है। क्या सजा चाहते हो?”
रविता ने कहा, “मेरे तीन छोटे-छोटे बच्चे हैं। उनका ख्याल रखा जाए।” इसके बाद वह चुप हो गई। अमरदीप ने कहा, “मेरे मां-बाप बूढ़े हैं। उनकी सेवा करने वाला कोई नहीं है। उनकी देखभाल में कोई कमी न रहे।” दोनों फूट-फूटकर रोने लगे। जज ने फैसले में कहा, “केवल काट डालना ही जघन्य अपराध नहीं है।” उन्होंने सती सावित्री का जिक्र करते हुए कहा, “पति की लंबी उम्र के लिए पत्नी करवाचौथ का व्रत करती है, लेकिन यहां प्रेमी के साथ ये कृत्य किया जो माफी लायक नहीं है।” जज ने 131 पन्नों के जजमेंट में मनुस्मृति और आत्रेय संहिता के श्लोकों का उल्लेख किया तथा पेन तोड़कर फेंक दिया।
क्या था मामला?
17 अप्रैल 2025 (कुछ रिपोर्ट्स में 12/13 अप्रैल) की रात बहसूमा थाना क्षेत्र के अकबरपुर सादात गांव में रविता ने अमरदीप के साथ मिलकर पति अमित कश्यप (उर्फ मिक्की) की गला, नाक और मुंह दबाकर हत्या कर दी। मौत को सर्पदंश दिखाने के लिए बिस्तर पर जिंदा सांप छोड़ दिया गया। शव पर सांप के 10 निशान भी मिले थे। पुलिस ने हत्या के 60 दिन बाद चार्जशीट दाखिल की। 551 दिन में 87 तारीखें और 12 से ज्यादा गवाहों के बयान हुए। 7 अक्टूबर 2026 को दोनों को दोषी करार दिया गया और 16 अक्टूबर को सजा सुनाई गई।
मेरठ कोर्ट का सख्त रुख
मेरठ कोर्ट ने पिछले तीन दिन में चार दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है। 14 अक्टूबर को नीले ड्रम हत्याकांड की मुस्कान और साहिल को भी मृत्युदंड मिला था। जज ने दामिनी-अतुल और इल्मा-तालिब जैसे मामलों का भी जिक्र किया। डीजीसी केके चौबे ने कहा कि सिर्फ शव के टुकड़े करना ही जघन्य अपराध नहीं, पवित्र रिश्तों और सात वचनों को तोड़ना भी गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में मृत्युदंड न देना न्याय के प्रति नरमी होगी। दोनों आरोपियों को जेल में सजायाफ्ता बैरक में शिफ्ट किया जाएगा। अदालत ने तीन मासूम बच्चों के भरण-पोषण पर भी चर्चा की। यह फैसला मेरठ की न्यायपालिका का सख्त संदेश माना जा रहा है।

