नई दिल्ली। विजय देवरकोंडा के करियर में एक पैटर्न सा बन गया है। किसी दमदार निर्देशक के साथ फिल्म की घोषणा होती है, ट्रेलर वापसी का भरोसा दिलाते हैं, दर्शकों की उम्मीदें जागती हैं, लेकिन सिनेमाघरों में फिल्म उन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती। ‘लाइगर’, ‘फैमिली स्टार’ और ‘किंगडम’ के बाद अब ‘रणबाली’ के साथ भी यही कहानी दोहराई गई है।
1876-78 के मद्रास अकाल की पृष्ठभूमि
राहुल सांकृत्यायन के निर्देशन में बनी ‘रणबाली’ ग्रेट मद्रास फैमिन (1876-78) की पृष्ठभूमि पर आधारित है। विजय देवरकोंडा ने रायलसीमा के योद्धा सिंगनमाला बोब्बिली रणबाली की भूमिका निभाई है, जो ब्रिटिश अत्याचार के खिलाफ अपने लोगों की रक्षा के लिए लड़ता है। रश्मिका मंदाना जयम्मा के किरदार में उनकी भावनात्मक सहारा बनी हैं, जबकि अर्नोल्ड वोस्लू क्रूर ब्रिटिश खलनायक सर थियोडोर हेक्टर के रूप में नजर आते हैं। फिल्म भद्रमल्लन्ना से जुड़ी लोककथाओं से प्रेरित है और इतिहास, एक्शन व पौराणिकता को एक साथ पिरोने की कोशिश करती है। महत्वाकांक्षा साफ दिखती है, लेकिन अमल में फिल्म लड़खड़ा जाती है।
शुरुआत दमदार, फिर बिखरता स्क्रीनप्ले
फिल्म की शुरुआत बुर्रा कथा शैली की नरेशन और रणबाली के जन्म की किंवदंती से होती है, जो तुरंत महाकाव्य जैसा एहसास कराती है। लेकिन यह जोश ज्यादा देर नहीं टिकता। पहले 15-20 मिनट बाद ही पटकथा की रफ्तार थमने लगती है और कहानी अत्याचार, ब्रिटिश दमन और बदले के दोहराव भरे चक्र में फंस जाती है। इंटरवल और उसके बाद के हिस्से में कुछ देर के लिए संभावनाएं दिखती हैं, पर गति फिर ढीली पड़ जाती है। सबसे बड़ी कमजोरी फिल्म की लय है। नायक का इंट्रोडक्शन फाइट सीन भी जैसे ही चरम पर पहुंचता है, खत्म हो जाता है। पूरी फिल्म में यही दिक्कत बार-बार दिखती है, जहां दृश्य उत्सुकता तो जगाते हैं, लेकिन उसका संतोषजनक नतीजा नहीं देते। मेलोड्रामा हर खाली जगह भर देता है और एक्शन, भावना व शांत पलों के बीच संतुलन की जगह लगातार तीव्रता थोपी जाती है, जो थका देती है। जयम्मा और रणबाली के हाथों मारे गए व्यक्ति की पत्नी वाला भावनात्मक मोड़ भी एक चूका हुआ मौका है। यह दृश्य नायक को अपने कृत्यों के नतीजों से रूबरू कराने वाला और दिल तोड़ने वाला होना चाहिए था, लेकिन यह एक सामान्य नाटकीय सीन बनकर रह जाता है। ट्विस्ट भी इतने अनुमानित हैं कि दर्शक पहले ही भांप लेते हैं।
तकनीकी पक्ष मजबूत
तकनीकी रूप से ‘रणबाली’ में काफी कुछ अच्छा है। सिनेमैटोग्राफर जिष्णु भट्टाचार्जी और निरव शाह ने शानदार विजुअल्स रचे हैं। शिवम राव नगासानी का प्रोडक्शन डिजाइन और अर्चना राव की कॉस्ट्यूम डिजाइन उस दौर को विश्वसनीय ढंग से जीवंत करते हैं। फिल्म के हर फ्रेम में स्केल, बारीकी और रिसर्च नजर आती है। विडंबना यह है कि फिल्म महाकाव्य जैसी दिखती जरूर है, पर वैसा महसूस नहीं कराती। यह एक यकीन दिलाने वाली दुनिया तो गढ़ती है, लेकिन दर्शकों को उसमें भावनात्मक रूप से जोड़ नहीं पाती।
अभिनय: विजय की मेहनत, पर किरदार कमजोर
विजय देवरकोंडा ने एक बार फिर अपना पूरा जोर लगाया है। उनका शारीरिक बदलाव, हाव-भाव और समर्पण साफ दिखता है, मगर दमदार अभिनय को दमदार किरदार का साथ भी चाहिए। रणबाली लड़ता है, दर्द सहता है और अपने लोगों की रक्षा करता है, पर उसके भीतरी संघर्ष और किरदार के विकास को हम शायद ही समझ पाते हैं। उसकी वीरता फैसलों से ज्यादा शारीरिक ताकत और दैवीय आशीर्वाद पर टिकी नजर आती है। रश्मिका मंदाना ने जयम्मा के किरदार में गर्मजोशी और हास्य का पुट दिया है और विजय के साथ उनकी केमिस्ट्री फिल्म के बेहतर पहलुओं में से है। ईश्वरी राव और बाकी सहायक कलाकारों ने भी अच्छा प्रयास किया है, लेकिन कमजोर लेखन उनके असर को सीमित कर देता है।
दूसरी फिल्मों की झलक, अपनी पहचान नहीं
फिल्म देखते हुए कई जगह दूसरी फिल्में याद आती हैं। पीरियड एक्शन सेटिंग ‘कैप्टन मिलर’ की याद दिलाती है, जबकि लोककथा और बड़े-से-बड़े नायकत्व का मिश्रण ‘कांतारा’ और ‘थंगालान’ जैसा लगता है। कुछ दृश्यों में रजनीकांत की ‘बाबा’ की झलक भी मिलती है। प्रेरणा लेना गलत नहीं, पर फिल्म की अपनी पहचान जरूरी है। यहां ऐतिहासिक और पौराणिक तत्व पूरी तरह एक-दूसरे में घुल नहीं पाते। फिल्म के खत्म होने जैसा एहसास होने के करीब 30 मिनट बाद आने वाला लोककथा आधारित क्लाइमैक्स स्वाभाविक परिणति कम और पौराणिक तमाशों के ट्रेंड को भुनाने की कोशिश ज्यादा लगता है।
खलनायक और संगीत भी निराश करते हैं
ब्रिटिश किरदारों के तेलुगु डब संवाद उन्हें समझना आसान बनाते हैं, लेकिन उस दौर की प्रामाणिकता को कमजोर भी करते हैं। अर्नोल्ड वोस्लू की स्क्रीन प्रेजेंस दमदार है, मगर उनका किरदार सिर्फ खतरनाक दिखने और नायक का विरोध करने तक सीमित रह गया है। वे किरदार में फिट दिखते हैं, पर पटकथा उन्हें और कुछ करने को नहीं देती। अजय-अतुल का संगीत भी निराश करता है। एक विराट योद्धा की कहानी को ऐसे बैकग्राउंड स्कोर की जरूरत थी जो एक्शन को ऊंचाई और भावनात्मक पलों को गहराई दे, लेकिन यहां संगीत शायद ही असर छोड़ पाता है।
फैसला
निर्देशक राहुल सांकृत्यायन की इस बात के लिए तारीफ बनती है कि उन्होंने इतिहास के एक भुला दिए गए अध्याय को इतने भव्य पैमाने पर पर्दे पर उतारा। फिल्म में एक बेहतरीन फिल्म की झलकियां हैं, जिन्हें समर्पित अभिनय, प्रभावशाली विजुअल्स और दिलचस्प केंद्रीय विचार का सहारा मिला है। लेकिन दोहराव भरी कथा, अधपके किरदार, अनुमानित ट्विस्ट, हद से ज्यादा मेलोड्रामा और असमान संगीत इस संभावना को संतोषजनक सिनेमाई अनुभव में नहीं बदल पाते। विजय देवरकोंडा के लिए ‘रणबाली’ एक और गंवाया हुआ मौका है। फिल्म में स्केल, महत्वाकांक्षा और चमक के कुछ पल जरूर हैं, पर एक योद्धा और जनविद्रोह की कहानी को जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वही गायब है: धड़कन। अंत में यह एक रणभेरी से ज्यादा उन दर्शकों के लिए लोरी जैसी लगती है, जो एक्शन तमाशे की उम्मीद लेकर सिनेमाघर पहुंचे थे।
फिल्म की जानकारी
- फिल्म: रणबाली (Ranabaali)
- निर्देशक: राहुल सांकृत्यायन
- कलाकार: विजय देवरकोंडा, रश्मिका मंदाना, अर्नोल्ड वोस्लू, ईश्वरी राव
- संगीत: अजय-अतुल
- सिनेमैटोग्राफी: जिष्णु भट्टाचार्जी, निरव शाह
- जॉनर: पीरियड एक्शन ड्रामा

