Noida Medanta Hospital controversy: नोएडा। राजधानी से सटे नोएडा के सेक्टर-50 स्थित मेदांता सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल इन दिनों बिलिंग को लेकर सवालों के घेरे में है। एक मरीज के परिजन की शिकायत के बाद गौतमबुद्ध नगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने अस्पताल प्रबंधन को नोटिस जारी कर पूरे मामले पर जवाब मांगा है।
क्या है पूरा मामला?
ग्रेटर नोएडा के कुलेसरा इलाके में रहने वाले प्रशांत कुमार ने 12 जून 2026 को आईजीआरएस (इंटीग्रेटेड ग्रीवांस रिड्रेसल सिस्टम) के जरिए मेदांता अस्पताल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के मुताबिक भर्ती के समय अस्पताल की ओर से इलाज का रोजाना खर्च करीब 50 से 60 हजार रुपये बताया गया था, लेकिन डिस्चार्ज के वक्त थमाया गया बिल शुरू में बताई गई रकम से लगभग दोगुना निकला। शिकायतकर्ता का आरोप है कि बिना पहले से कोई जानकारी दिए यह अतिरिक्त राशि जोड़ी गई।
CMO के नोटिस में क्या-क्या सवाल?
शिकायत का संज्ञान लेते हुए CMO ने 30 जून 2026 को अस्पताल को नोटिस जारी किया। नोटिस में कहा गया है कि प्रथम दृष्टया यह मामला मरीजों को इलाज के खर्च को लेकर भ्रम में डालने जैसा प्रतीत होता है, और अस्पताल प्रबंधन से इस पर विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा गया है|नोटिस केवल बिलिंग तक सीमित नहीं है। इसमें अस्पताल में कार्यरत डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के पंजीकरण को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। CMO के मुताबिक, जिन डॉक्टरों और स्टाफ के नाम अस्पताल के पंजीकरण के वक्त दर्ज कराए गए थे, उसके बाद नियुक्त हुए कर्मचारियों का पूरा ब्योरा अब तक स्वास्थ्य विभाग को नहीं दिया गया। यह भी सामने आया है कि कुछ डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ सिर्फ दिल्ली मेडिकल काउंसिल में पंजीकृत हैं, जबकि क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2010 के तहत उत्तर प्रदेश में काम करने वाले सभी डॉक्टरों और स्टाफ का उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण अनिवार्य है। CMO ने अस्पताल को निर्देश दिया है कि अपंजीकृत डॉक्टरों और स्टाफ का तुरंत पंजीकरण कराकर पूरा विवरण विभाग को सौंपा जाए। ऐसा न करने पर क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत नियमानुसार कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
सिर्फ इकलौता मामला या बड़े पैटर्न की झलक?
नोएडा-ग्रेटर नोएडा में निजी अस्पतालों की बिलिंग को लेकर यह पहली शिकायत नहीं है। इससी पहले ग्रेटर नोएडा के शारदा अस्पताल में भी बिलिंग में देरी और पारदर्शिता को लेकर मरीज के परिजनों और अस्पताल के बाउंसरों के बीच विवाद हो चुका है, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकार लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि निजी अस्पतालों में इलाज से पहले लिखित अनुमानित खर्च (कॉस्ट एस्टीमेट) देना और डिस्चार्ज के समय आइटमाइज्ड बिल दिखाना अनिवार्य किया जाए, ताकि मरीजों के साथ ऐसी स्थिति दोबारा न बने।
आगे क्या?
फिलहाल मामला CMO कार्यालय के स्तर पर जांच और स्पष्टीकरण के चरण में है। अस्पताल प्रबंधन की ओर से सार्वजनिक तौर पर अभी कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है। नियमों के मुताबिक, अगर जांच में बिलिंग में गड़बड़ी या स्टाफ पंजीकरण में उल्लंघन साबित होता है, तो अस्पताल के खिलाफ क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत कार्रवाई हो सकती है, साथ ही मरीज को अतिरिक्त वसूली गई रकम वापस दिलाने का रास्ता भी खुल सकता है।

