उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में चार साल की मासूम बच्ची के साथ दरिंदगी और उसकी निर्मम हत्या का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। मार्च 2026 में हुई इस घटना में पड़ोसी द्वारा बच्ची को चॉकलेट के बहाने ले जाकर यौन शोषण करने और ईंट से सिर कुचलकर मार डालने का आरोप है। अब बच्ची के पिता ने न केवल पुलिस जांच पर सवाल उठाए हैं, बल्कि दो निजी अस्पतालों पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं कि खून से लथपथ बच्ची को भर्ती करने से मना कर दिया गया, जिससे उसकी मौत हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को “अत्यंत चिंता जनक” करार देते हुए विशेष जांच टीम (SIT) गठित करने के निर्देश दिए हैं और अस्पतालों को मुआवजे का अल्टीमेटम दिया है।
घटना का क्रम
16 मार्च 2026 की शाम को नंदग्राम क्षेत्र में रहने वाली चार वर्षीय बच्ची घर के बाहर खेल रही थी। पड़ोसी आरोपी (जिसकी पहचान प्रजापति के रूप में बताई गई) ने उसे चॉकलेट दिलाने के बहाने साथ ले लिया। देर शाम तक बच्ची घर नहीं लौटी तो परिजनों ने तलाश शुरू की। बच्ची बेहोश हालत में खून से लथपथ मिली। पिता ने तुरंत उसे नजदीकी निजी अस्पतालों में ले जाया, लेकिन दोनों अस्पतालों ने इलाज से इनकार कर दिया। पिता का आरोप है कि “खून बह रहा था, लेकिन किसी अस्पताल ने भर्ती नहीं किया। एम्बुलेंस का भी इंतजाम नहीं हुआ। दो घंटे तक वह जिंदा रही, लेकिन सरकारी अस्पताल ले जाते समय रास्ते में उसकी मौत हो गई।” पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में यौन शोषण के स्पष्ट संकेत मिले, जिसमें सिर पर कई चोटें, गला घोंटने के निशान, काटने के निशान और जननांगों पर चोटें शामिल थीं। शुरू में पुलिस ने केवल हत्या का केस दर्ज किया, जिस पर पिता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पुलिस की लापरवाही, अस्पतालों की उदासीनता और परिवार के साथ कथित बदसलूकी पर गहरी नाराजगी जताई। अप्रैल 2026 में मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर और SHO को तलब किया। कोर्ट ने UP DGP को निर्देश दिया कि तीन वरिष्ठ महिला अधिकारियों की टीम वाली SIT गठित कर दो सप्ताह में रिपोर्ट सौंपे। ट्रायल कोर्ट को चार्जशीट पर आगे बढ़ने से रोका गया। हालिया सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों निजी अस्पतालों (खजान सिंह और मांवी हेल्थकेयर तथा सेंट जोसेफ अस्पताल) से पूछा है कि वे पीड़िता परिवार को मुआवजा देंगे या कोर्ट खुद राशि तय कर आदेश देगा। SIT ने पिता के अस्पतालों संबंधी आरोपों को सही पाया है। कोर्ट ने परिवार के खिलाफ कोई जबरदस्ती न करने का भी आदेश दिया।
आरोपी की गिरफ्तारी और पुलिस का बचाव
आरोपी को घटनास्थल पर गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में उसने अपराध कबूल किया। पुलिस का कहना है कि वह नशे में था और बच्ची को बाजार ले गया था। गिरफ्तारी के दौरान आरोपी ने फायरिंग की, जिसमें वह घायल हुआ। पुलिस ने 900 पृष्ठों की चार्जशीट दाखिल की है, जिसमें POCSO एक्ट, BNS की हत्या और अन्य धाराएं शामिल हैं। हालांकि पिता का कहना है कि पुलिस ने शुरू में रेप एंगल को नजरअंदाज किया और परिवार पर दबाव डाला।
सामाजिक-प्रशासनिक सवाल
यह मामला न केवल बाल सुरक्षा की विफलता को उजागर करता है, बल्कि आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं, निजी अस्पतालों की जिम्मेदारी और पुलिस संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। गाजियाबाद जैसे घनी आबादी वाले इलाके में ऐसी घटनाएं समाज के लिए चिंता का विषय हैं। पीड़िता परिवार न्याय की आस लगाए बैठा है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली SIT की रिपोर्ट आने के बाद मामले की दिशा स्पष्ट होगी। नवभारत टाइम्स समेत अन्य मीडिया में पिता के दर्द भरे बयान ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। यह कांड हमें याद दिलाता है कि कानून-व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की कितनी जरूरत है, ताकि कोई मासूम दोबारा ऐसी बर्बरता का शिकार न बने। परिवार को न्याय मिले, यही उम्मीद।

