रॉड के नाम पर 25 हजार ऐंठे, पैर में डाल दी सस्ती प्लेट; इंफेक्शन से सड़ने की कगार पर मरीज का पैर

जिला अस्पताल में डॉक्टरों की लापरवाही का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें एक मरीज को महीनों तक अनजाने में गलत इलाज का शिकार होना पड़ा। मामला जिला अस्पताल के एक ऑर्थोपेडिक सर्जन से जुड़ा है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने मरीज के पैर में रॉड डालने के नाम पर 25 हजार रुपये वसूले, लेकिन ऑपरेशन के दौरान रॉड की जगह सस्ती प्लेट लगा दी। नतीजा यह हुआ कि मरीज के पैर में गंभीर इंफेक्शन फैल गया और अब उसका पैर सड़ने की कगार पर पहुंच गया है।

सड़क हादसे के बाद शुरू हुई मुसीबत

सेक्टर-55 निवासी नीरज चौबे जनवरी महीने में एक सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके बाद उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां तैनात ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. अरविंद अत्री ने उनका ऑपरेशन किया। परिवार का दावा है कि रॉड डालने के लिए उनसे 25 हजार रुपये लिए गए थे। तीन महीने बाद जब नीरज को चलने में भारी परेशानी होने लगी, तो उन्होंने एक निजी अस्पताल में एक्स-रे कराया। रिपोर्ट देखकर पूरा परिवार सन्न रह गया पैर में रॉड नहीं, बल्कि एक सस्ती प्लेट डाली गई थी।

डॉक्टर का पलटवार, प्रशासन में हड़कंप

महीनों तक न्याय के लिए भटकने के बाद जब पीड़ित ने मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई, तो अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मच गया। इसके बाद अस्पताल ने मरीज को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल रेफर कर दिया, लेकिन वहां के डॉक्टरों ने भी इलाज करने से हाथ खड़े कर दिए। नतीजतन, गंभीर हालत में पीड़ित अब इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। वहीं आरोपी डॉक्टर अरविंद अत्री ने आरोपों को नकारते हुए कहा कि ऑपरेशन के समय रॉड डालने की बात तय हुई थी और परिजनों ने इम्प्लांट का पैसा भी उसी हिसाब से जमा किया था, लेकिन ऑपरेशन के दौरान चिकित्सकीय आवश्यकता के अनुसार रॉड की जरूरत नहीं पड़ी, इसलिए प्लेट लगाई गई। उनका यह भी कहना है कि पैर में फैला इंफेक्शन प्लेट की वजह से नहीं, बल्कि पुराने घाव के कारण हुआ है।

सीएमएस बोले – मामला उनके कार्यकाल से पहले का

जिला अस्पताल के सीएमएस अशोक कुमार झा ने कहा कि मरीज के समुचित इलाज के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं और जरूरत पड़ने पर आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। हालांकि 25 हजार रुपये लेने के आरोप पर उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि यह प्रकरण उनके चार्ज संभालने से पहले का है। फिलहाल यह मामला अस्पताल प्रशासन की जवाबदेही और सरकारी अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। पीड़ित परिवार न्याय और उचित इलाज की मांग को लेकर अब भी संघर्षरत है।

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