बिहार के भोजपुर जिले में हुए एक कथित पुलिस एनकाउंटर ने पूरे राज्य की राजनीति और प्रशासन को हिला दिया है। 17 जून 2026 को शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में पुलिस की गोली से 28 वर्षीय भरत भूषण तिवारी की मौत हो गई थी। नौ दिन बीत जाने के बाद भी यह मामला थमने का नाम नहीं ले रहा, बल्कि लगातार नए मोड़ ले रहा है पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज हो गया है, मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है, और पीड़ित परिवार ने आत्मदाह की चेतावनी तक दे डाली है।
कौन थे भरत भूषण तिवारी?
भरत बिहार के भोजपुर जिले के बिलौटी गांव के रहने वाले थे। बीएससी पास इस युवक का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। गांव और आसपास के क्षेत्र में वे एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर जाने जाते थे, जो बाढ़ और गंगा कटाव से विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए सक्रिय रूप से काम करते थे और सोशल मीडिया के जरिए प्रशासनिक भ्रष्टाचार व लापरवाही को उजागर करते रहते थे। वे भगत सिंह को अपना आदर्श मानते थे और एक बड़े सामाजिक बदलाव की सोच रखते थे।
घटना से पहले की पृष्ठभूमि
घटना से कुछ समय पहले भरत ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो डाला था, जिसमें वे एक देसी कट्टा लहराते हुए दिखे और प्रशासन को चेतावनी दी कि यदि बाढ़ पीड़ितों की समस्याएं हल नहीं हुईं तो वे खुद सिस्टम से भिड़ जाएंगे। इस वीडियो के बाद पुलिस पूछताछ के लिए उनके घर पहुंची, जहां विवाद हो गया और टीम को खाली हाथ लौटना पड़ा। इस घटना के बाद पुलिस ने उन्हें “मानसिक रूप से अस्थिर” करार दे दिया था।
17 जून: कैसे हुई मौत?
अगली सुबह भारी पुलिस बल और एसटीएफ की टीम उनके घर पहुंची। भरत घर से बाहर निकले और फेसबुक लाइव शुरू कर दिया। वायरल हुए वीडियो में दिखता है कि उन्होंने सरेंडर के इरादे से अपनी पिस्तौल पुलिस से करीब 20 मीटर दूर फेंक दी और हाथ ऊपर उठा दिए। लाइव स्ट्रीम बंद होने के ठीक बाद पुलिस ने उन पर गोलियां चला दीं। बताया जाता है कि उनके पैरों और निचले हिस्से में चार-पांच गोलियां लगीं, और अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही उनकी मौत हो गई।
परिवार और जनता का गुस्सा
घटना के तुरंत बाद से ही परिवार और गांववालों ने पुलिस के दावे पर सवाल उठाना शुरू कर दिया। भरत की मां आशा देवी लगातार आरोप लगाती रही हैं कि उनके बेटे को मुठभेड़ में नहीं, बल्कि घेरकर गोली मारी गई। मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद यह मुद्दा भोजपुर से निकलकर पूरे बिहार में चर्चा का विषय बन गया। गांव में महापंचायत भी आयोजित हुई, जिसमें इंसाफ की मांग उठी। भरत के भाई चंदन तिवारी ने पुलिस अधिकारियों से सीधा सवाल पूछा कि जब उनके भाई ने पिस्तौल फेंक दी थी, तो फिर गोली क्यों चलाई गई। परिवार ने सरकार की घोषित न्यायिक जांच पर भी भरोसा जताने से इनकार करते हुए चेतावनी दी है कि अगर इंसाफ नहीं मिला, तो पूरा परिवार सामूहिक आत्मदाह करेगा।
पुलिसकर्मियों पर मुकदमा, अधिकारी बदले गए
आशा देवी की शिकायत पर एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है। जगदीशपुर एसडीपीओ और शाहपुर थानाध्यक्ष समेत कई अन्य पुलिसकर्मियों पर शाहपुर थाने में एफआईआर दर्ज हुई है। बढ़ते दबाव के बीच प्रशासन ने जगदीशपुर एसडीपीओ को हटाकर पंकज मिश्रा को नया एसडीपीओ नियुक्त किया। हाल ही में भोजपुर के पुलिस अधीक्षक मिस्टर राज खुद भरत के घर पहुंचे और परिवार को निष्पक्ष जांच व सुरक्षा का भरोसा दिलाया, लेकिन परिवार ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक दोषियों को सजा नहीं मिलती, वे संतुष्ट नहीं होंगे।
कानूनी सवाल और मोबाइल फोन का रहस्य
मामले से जुड़ी याचिका में पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए दिशा-निर्देशों का हवाला देकर आरोप लगाया गया है कि एनकाउंटर के बाद पुलिस ने परिवार पर ही एफआईआर दर्ज कर दी, और किसी मैजिस्ट्रियल जांच के आदेश नहीं दिए गए, जो स्थापित प्रक्रिया का सीधा उल्लंघन है। यह मांग भी उठ रही है कि भरत का मोबाइल फोन, जो फिलहाल पुलिस के कब्जे में है, कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा जाए, क्योंकि इसमें स्थानीय प्रशासनिक भ्रष्टाचार से जुड़े सबूत होने की संभावना जताई जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता विशाल तिवारी ने एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर इस एनकाउंटर को “न्यायेतर हत्या” करार दिया और मांग की कि मामले की जांच सीबीआई या किसी स्वतंत्र विशेष जांच टीम (SIT) को सौंपी जाए। याचिका में यह भी मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाई जाए, जो वायरल वीडियो समेत सभी तकनीकी, कानूनी व डिजिटल सबूतों की निगरानी करे। हालांकि, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की वेकेशन बेंच ने मामले की गंभीरता को मानते हुए भी तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को पहले सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री से संपर्क कर तय प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक अधिवक्ता ने पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मामले में स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) लेने की अपील भी की थी।
सियासत गरमाई, सरकार बैकफुट पर
इस मामले ने बिहार की राजनीति को भी गरमा दिया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार, जिन्होंने इसी साल अप्रैल में शपथ ली थी — पर अब अपने ही सहयोगी दलों से सवाल उठने लगे हैं। जेडीयू नेता संजय झा ने कहा कि सिर्फ चार पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करने से बात नहीं बनेगी, जबकि शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने भी भोजपुर पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। दूसरी ओर, हम पार्टी सुप्रीमो जीतन राम मांझी की उस टिप्पणी पर भी विवाद हुआ जिसमें उन्होंने कथित तौर पर एनकाउंटर को सही ठहराने की कोशिश की थी, जिसके बाद जनता में नाराजगी और तेज हो गई। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि पुलिस ने सुपारी लेकर हत्या करने वाले गिरोह की तरह काम किया है। बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक दबाव के बीच बिहार सरकार ने मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच और विभागीय जांच के आदेश दे दिए हैं।
आगे क्या?
फिलहाल यह मामला कई मोर्चों पर एक साथ चल रहा है — राज्य सरकार की घोषित न्यायिक जांच, पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर चल रही जांच, और सुप्रीम कोर्ट में लंबित जनहित याचिका। परिवार और स्थानीय लोग अब भी सीबीआई जांच की मांग पर अड़े हुए हैं, जबकि सरकार राज्य स्तरीय न्यायिक जांच को ही पर्याप्त बता रही है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री इस याचिका पर सुनवाई की तारीख कब तय करती है, और राज्य की न्यायिक जांच में आखिर क्या निष्कर्ष सामने आते हैं।

