उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में एक डिस्पोजेबल प्लेट बनाने वाली फैक्ट्री में 12 मजदूरों को बंधुआ मजदूरी की जंजीरों में जकड़े हुए पाए जाने का मामला सामने आया है। इन मजदूरों को रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक स्थानों से अच्छी नौकरी, मुफ्त भोजन-आवास और अच्छी तनख्वाह का लालच देकर लाया गया था, लेकिन वहां पहुंचते ही उनके मोबाइल फोन छीन लिए गए, उन्हें महीनों तक कैद रखा गया, 20 घंटे तक काम कराया गया और विरोध करने पर लोहे की छड़ों, डंडों से बुरी तरह पीटा गया। एक मजदूर की मौत की भी आशंका जताई जा रही है। मुजफ्फरनगर पुलिस और जिला प्रशासन की संयुक्त टीम ने सोमवार को तितावी क्षेत्र के मंडी गांव स्थित इस फैक्ट्री पर छापा मारा। बचाए गए मजदूरों की उम्र 16 से 44 साल के बीच है और वे उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा और राजस्थान के विभिन्न जिलों से हैं। इनमें नाबालिग भी शामिल हैं। दो आरोपियों फैक्ट्री मालिक अंकित बालियान के पिता प्रदीप बालियान (49) और उनके सहयोगी शिवा त्यागी (26) को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि मुख्य आरोपी अंकित बालियान फरार है। पुलिस की कई टीमें उसे पकड़ने के लिए छापेमारी कर रही हैं।
पीड़ितों की दर्दनाक कहानियां
24 वर्षीय दिलशाद मोहम्मद अमरोहा जिले का निवासी है। पांच महीने पहले वह परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए काम की तलाश में निकला था। शुरुआती कुछ हफ्तों तक वह अपनी पत्नी गुलिस्ता बेगम को फोन करता रहा, फिर अचानक संपर्क टूट गया। उसके पिता मेहरबान शाह ने बताया, “हमने उसे हर जगह ढूंढा। आखिरकार उम्मीद छोड़ दी। पत्नी मायूस होकर मायके चली गई।” मंगलवार को जब दिलशाद का फोन आया तो पिता भावुक हो गए। दिलशाद ने बताया कि तीन महीने तक वह नर्क झेल रहा था। “किसी को घर जाने की बात करने या चार घंटे से ज्यादा सोने पर लोहे की छड़ों और डंडों से पिटाई होती थी।” आगरा के सोनू चौहान (42) ने दो महीने वहां बिताए। उन्होंने बताया, “अंबाला से 14,000 रुपये मासिक वेतन, आठ घंटे काम और मुफ्त भोजन-आवास का वादा किया गया था। पहुंचते ही फोन छीन लिया गया। दिन में सिर्फ एक बार सूखी रोटियां मिलती थीं। विरोध पर मारपीट और गाली-गलौज होती थी।” मजदूरों का आरोप है कि फैक्ट्री में पिटबुल कुत्ता भी रखा गया था, जिसे रात में छोड़ दिया जाता था ताकि कोई भाग न सके। दो छोटे कमरों में उन्हें कैद रखा जाता था। 38 वर्षीय संतोष हेम्ब्रम बिहार के रहने वाले हैं। उन्होंने दस महीने वहां गुजारे। उनके ससुराल वाले ने उन्हें लेने आकर बताया कि परिवार ने नौ महीने तक अंबाला में उनकी तलाश की थी। मजदूरों ने एक साथी मजदूर ‘टोपी उर्फ अर्जुन’ की मौत का भी दावा किया है। उनके अनुसार सात महीने पहले उसे बुरी तरह पीटा गया और शव बोरे में भरकर फेंक दिया गया। पुलिस ने नवंबर में गांव में एक अज्ञात शव बोरे में मिलने की पुष्टि की है और मामले की जांच कर रही है। कुछ रिपोर्टों में एक से तीन मौतों की आशंका जताई गई है।
पुलिस कार्रवाई और कानूनी प्रावधान
पुलिस अधीक्षक संजय कुमार ने बताया कि एक भागे हुए मजदूर की सूचना पर छापा मारा गया। सभी बचाए गए मजदूरों के शरीर पर चोट के निशान मिले हैं। उन्हें मेडिकल जांच और मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग दी गई है। आठ मजदूरों के परिजन पहुंच चुके हैं और बाकी कानूनी औपचारिकताओं के बाद घर भेजे जाएंगे। आरोपियों पर बाल श्रम निषेध अधिनियम, किशोर न्याय अधिनियम और बंधुआ मजदूर प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। हत्या का भी मामला दर्ज किया गया है। एसआईटी का गठन कर गहन जांच की जा रही है।
पृष्ठभूमि और व्यापक मुद्दा
यह घटना बंधुआ मजदूरी की समस्या को फिर उजागर करती है, जो देश के कई हिस्सों में अभी भी विद्यमान है। मजदूरों को अक्सर आर्थिक संकट का फायदा उठाकर फंसाया जाता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐसे मामलों में सख्ती बरतने का दावा किया है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में निगरानी की कमी सवाल उठाती है। प्रशासन ने बचाए गए मजदूरों को पुनर्वास पैकेज, मुआवजा और सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का आश्वासन दिया है। वहीं, फरार मालिक अंकित की तलाश जारी है। यह मामला न केवल कानून व्यवस्था की चुनौती है बल्कि मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन भी है। स्थानीय प्रशासन और श्रम विभाग को ऐसे छिपे शोषण के खिलाफ सतर्क रहने की जरूरत है, ताकि गरीब मजदूरों का भरोसा टूटने न पाए।
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