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हेपेटाइटिस-बी पीड़ित महिला का फेलिक्स हॉस्पिटल में सुरक्षित सिजेरियन, मां और नवजात दोनों स्वस्थ – जय हिन्द जनाब हेपेटाइटिस-बी पीड़ित महिला का फेलिक्स हॉस्पिटल में सुरक्षित सिजेरियन, मां और नवजात दोनों स्वस्थ – जय हिन्द जनाब

हेपेटाइटिस-बी पीड़ित महिला का फेलिक्स हॉस्पिटल में सुरक्षित सिजेरियन, मां और नवजात दोनों स्वस्थ

ग्रेटर नोएडा के गामा स्थित फेलिक्स हॉस्पिटल में डॉक्टरों की टीम ने एक बेहद जटिल गर्भावस्था में सफल सिजेरियन ऑपरेशन कर मां और नवजात दोनों की जान बचा ली। हेपेटाइटिस-बी संक्रमण, बढ़े हुए बिलीरुबिन, एनीमिया और पहले हो चुके सिजेरियन ऑपरेशन जैसी गंभीर चिकित्सकीय चुनौतियों के बावजूद विशेषज्ञों ने सूझबूझ और सावधानी से प्रसव कराया। फिलहाल मां और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं और डॉक्टरों की निगरानी में हैं।

मरीज के पति जीन थियरी अजाफ ने बताया कि उनकी पत्नी एनी की गर्भावस्था शुरू से ही जोखिम भरी थी। महिला हेपेटाइटिस-बी से पीड़ित थी और लिवर फंक्शन भी ठीक से काम नहीं कर रहा था। जांच में बिलीरुबिन का स्तर लगभग 6 तक पहुंच गया था, जो गंभीर लिवर समस्या और जॉन्डिस का संकेत माना जाता है। इसके अलावा मरीज एनीमिया से भी जूझ रही थी। पहले सिजेरियन डिलीवरी हो चुकी थी, जिससे इस बार ऑपरेशन और अधिक जटिल हो गया था। फेलिक्स हॉस्पिटल की गायनोकोलॉजिस्ट डॉ. अनुराधा ने बताया कि ऐसे मामलों में मां और बच्चे, दोनों की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है। उन्होंने कहा कि मरीज की हालत को देखते हुए पहले विस्तृत जांच की गई, जिसमें लिवर फंक्शन टेस्ट, हीमोग्लोबिन, बिलीरुबिन और अन्य जरूरी पैरामीटर शामिल थे। इसके बाद टीम ने मरीज को स्थिर किया और फिर सिजेरियन डिलीवरी का फैसला लिया।

डॉ. अनुराधा के अनुसार, हेपेटाइटिस-बी पॉजिटिव मां से नवजात में संक्रमण का जोखिम बना रहता है, इसलिए डिलीवरी के दौरान और बाद में विशेष प्रोटोकॉल अपनाया गया। संक्रमण नियंत्रण, ब्लड मैनेजमेंट और नवजात की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा और एक स्वस्थ शिशु का जन्म हुआ। जन्म के तुरंत बाद नवजात को आवश्यक टीकाकरण और हेपेटाइटिस-बी से बचाव के लिए जरूरी उपचार भी दिया गया।

डॉक्टरों की टीम की सतर्कता से टला बड़ा खतरा

विशेषज्ञों के मुताबिक, गर्भावस्था के दौरान यदि महिला को लिवर संबंधी समस्या, हेपेटाइटिस-बी, एनीमिया या पहले से सिजेरियन का इतिहास हो, तो मामला और जटिल हो जाता है। ऐसे मामलों में समय पर निदान, निरंतर निगरानी और मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम की भूमिका बेहद अहम होती है। डॉक्टरों का कहना है कि बढ़ा हुआ बिलीरुबिन केवल पीलिया नहीं, बल्कि लिवर की गंभीर गड़बड़ी का संकेत भी हो सकता है, जिसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, ऑपरेशन के दौरान सभी जरूरी एहतियात बरती गईं और मां-बच्चे की हालत पर लगातार नजर रखी गई। डॉक्टरों ने बताया कि सफलता का श्रेय टीमवर्क, समय पर निर्णय और मरीज की स्थिति की बारीकी से निगरानी को जाता है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया भी आई सामने

इस घटना ने स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीरता और अस्पतालों में विशेषज्ञ सुविधाओं की जरूरत को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। स्थानीय स्तर पर कुछ जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने डॉक्टरों की टीम की सराहना की है। एक स्थानीय जनप्रतिनिधि ने कहा कि ऐसे मामलों में निजी और सरकारी दोनों स्तरों पर मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि जटिल प्रसव के दौरान किसी परिवार को जान का जोखिम न उठाना पड़े। वहीं, स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि गर्भवती महिलाओं की नियमित स्क्रीनिंग, खासकर हेपेटाइटिस-बी और लिवर फंक्शन की जांच, को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

कुछ सामाजिक संगठनों ने भी इस केस को उदाहरण बताते हुए यह मांग उठाई कि गर्भवती महिलाओं को संक्रमण संबंधी बीमारियों की समय पर जांच और इलाज के लिए जागरूक किया जाए। उनका कहना है कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में कई महिलाएं गर्भावस्था के दौरान लक्षणों को नजरअंदाज कर देती हैं, जिससे स्थिति गंभीर हो जाती है।

आम लोगों ने जताई राहत

अस्पताल में इलाज के दौरान मौजूद लोगों और क्षेत्र के स्थानीय निवासियों ने इस सफलता पर खुशी जताई। परिजनों ने डॉक्टरों की टीम के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जब हालत बेहद नाजुक थी, तब भी चिकित्सकों ने हार नहीं मानी। आसपास मौजूद लोगों ने भी इसे “जिंदगी बचाने वाली मेडिकल टीमवर्क” का उदाहरण बताया। ग्रेटर नोएडा और नोएडा क्षेत्र के लोगों में इस खबर के बाद चर्चा रही कि आधुनिक चिकित्सा और समय पर सही निर्णय से बेहद कठिन मामलों को भी सुरक्षित संभाला जा सकता है। कई लोगों ने कहा कि गर्भवती महिलाओं को नियमित जांच और विशेषज्ञ सलाह से ही ऐसी जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

विशेषज्ञों की सलाह

डॉक्टरों ने सलाह दी है कि गर्भावस्था के दौरान यदि किसी महिला को बार-बार कमजोरी, पीलापन, आंखों में पीलापन, उल्टी, भूख न लगना या लिवर संबंधी लक्षण दिखें, तो तुरंत जांच करानी चाहिए। हेपेटाइटिस-बी, एनीमिया या पुराने सिजेरियन का इतिहास होने पर प्रसव की योजना विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में ही बनानी चाहिए। नवजात को जन्म के तुरंत बाद सही टीकाकरण और प्रोफिलैक्सिस मिलना भी बेहद जरूरी है। फिलहाल एनी और उनका नवजात पूरी तरह स्वस्थ हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, यह मामला इस बात का प्रमाण है कि समय पर इलाज, विशेषज्ञ निगरानी और समन्वित चिकित्सा व्यवस्था से सबसे कठिन गर्भावस्थाओं को भी सुरक्षित रूप से संभाला जा सकता है।

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