अध्यादेश से ताकत बढ़ी, कोलेजियम की सिफ़ारिश पर तुरंत अमल — 93,000 से अधिक लंबित मामलों के बीच न्यायपालिका में ऐतिहासिक फेरबदल
दिल्ली न्यायपालिका के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ते हुए भारत के राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय में पाँच नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने 1 जून 2026 को सोशल मीडिया के माध्यम से इसकी आधिकारिक घोषणा की।
कौन हैं पाँच नए न्यायाधीश?
नव नियुक्त न्यायाधीशों में देश के चार प्रमुख उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और वकील बिरादरी की एक वरिष्ठ सदस्य शामिल हैं:
1. न्यायमूर्ति शील नागू — पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद से पदोन्नत
2. न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर — बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद से पदोन्नत
3. न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा — मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद से पदोन्नत
4. न्यायमूर्ति अरुण पल्ली — जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद से पदोन्नत
5. श्रीमती वेंकिता सुब्रमणि मोहाना — बार से सीधे सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश नियुक्त, जहाँ वे वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में कार्यरत थीं
इन पाँचों नामों की फाइल कानून मंत्रालय को भेजी गई थी और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी होते ही ये भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में शपथ लेंगे।
अध्यादेश से पहले हुई थी ज़मीन तैयार
यह नियुक्ति अचानक नहीं हुई। इसके पीछे एक सुनियोजित कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया रही। भारत की राष्ट्रपति ने 16 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 प्रख्यापित किया, जिसे उसी दिन भारत के राजपत्र (Gazette of India) में प्रकाशित किया गया। इस अध्यादेश ने सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करते हुए मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी, जिससे CJI सहित कुल स्वीकृत संख्या 38 हो गई। इससे पहले 5 मई 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भी इस प्रस्ताव को हरी झंडी दी थी। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए घोषणा की थी कि राष्ट्रपति ने ‘सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026’ को अपनी मंजूरी दे दी है और ‘सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956’ में आवश्यक संशोधन किया गया है।
कोलेजियम की बैठक और तेज़ निर्णय-प्रक्रिया
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में हुई कोलेजियम की बैठक में इन पाँच प्रमुख नामों को सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में पदोन्नत करने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी गई थी।कोलेजियम ने 22 मई और 27 मई 2026 को हुई बैठकों में इन नामों का चयन किया था, और अध्यादेश लागू होने के मात्र कुछ ही दिनों के भीतर नियुक्ति की औपचारिकता पूरी कर दी गई, जो त्वरित न्यायिक कार्यवाही का बेहतरीन उदाहरण है।
93,000 से अधिक मामले लंबित — यही है असली चुनौती
राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में इस समय कुल 93,848 मामले लंबित हैं। यह आँकड़ा स्वयं में बताता है कि जजों की संख्या बढ़ाना कितना ज़रूरी था। अप्रैल 2026 तक सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या रिकॉर्ड 92,823 तक पहुँच चुकी थी और न्यायाधीशों की कमी के कारण मामलों के निपटारे की दर धीमी थी। संविधान के अनुच्छेद 145(3) के अनुसार, संविधान की व्याख्या से जुड़े मामलों के लिए कम से कम 5 न्यायाधीशों की पीठ जरूरी होती है। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से बड़ी और नियमित संवैधानिक पीठों का गठन आसान होगा और न्यायाधीशों को मामलों के गहन अध्ययन तथा गुणवत्तापूर्ण निर्णय लिखने का पर्याप्त समय मिलेगा।
आगे और भी बदलाव — जून में दो और जज होंगे सेवानिवृत्त
सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार जून 2026 में दो और जज सेवानिवृत्त होने वाले हैं। न्यायमूर्ति पंकज मिथल 16 जून को और न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी 28 जून को 65 वर्ष की आयु पूरी होने पर रिटायर होंगे, जिससे शीर्ष अदालत में खाली पदों की संख्या फिर बढ़ने की संभावना है। हालाँकि विधि विशेषज्ञों का कहना है कि इन नई नियुक्तियों से भविष्य के मुख्य न्यायाधीशों की उत्तराधिकार श्रृंखला पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि नए न्यायाधीश वरिष्ठता क्रम में नीचे के पदों पर नियुक्त हो रहे हैं।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
सुप्रीम कोर्ट के 1950 में गठन के समय मुख्य न्यायाधीश सहित केवल आठ न्यायाधीश थे। उसके बाद से न्यायाधीशों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती रही, और 2026 का यह कदम उस लंबी यात्रा में एक और मील का पत्थर है।

