इंडो-पैसिफिक का महा-संतुलन: अमेरिका-चीन के बिच गहराता असंतोष, एशियाई देश में नए रक्षा-गठबंधनों की तलाश 

शांग्री-ला वार्ता से उठी आवाज़ें: “अकेले अमेरिका पर भरोसा नहीं”, जापान, भारत, ऑस्ट्रेलिया मिलकर बना रहे हैं नई सुरक्षा वास्तुकला

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा के केंद्र में एक नया और निर्णायक बदलाव आ रहा है। एक तरफ चीन की फौजी ताकत तेज़ी से बढ़ रही है, दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की प्रतिबद्धता को लेकर गहरे सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में एशिया-प्रशांत के देश भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस, वियतनाम आपस में रक्षा संबंध इतनी तेज़ी से मज़बूत कर रहे हैं, जितना पहले कभी नहीं हुआ था। विशेषज्ञ इसे “महा-संतुलन” या द ग्रेट इंडो-पैसिफिक हेज कह रहे हैं।

शांग्री-ला डायलॉग: चिंताओं का सबसे बड़ा मंच

सिंगापुर में 29 से 31 मई 2026 तक आयोजित 23वें शांग्री-ला डायलॉग एशिया का सबसे प्रतिष्ठित रक्षा और सुरक्षा सम्मेलन में 40 से अधिक देशों के रक्षामंत्री, सैन्य प्रमुख और रणनीतिकार एकत्रित हुए। चीन का तेज़ सैन्य आधुनिकीकरण और इंडो-पैसिफिक में उसकी बढ़ती आक्रामकता, तथा अमेरिका की प्राथमिकताओं को लेकर बढ़ती चिंताएं इस सम्मेलन के केंद्र में रहीं। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेग्सेथ ने पहले पूर्ण सत्र को संबोधित किया, जिन पर उन सहयोगियों की नज़रें टिकी थीं जो ट्रंप प्रशासन की विश्वसनीयता को लेकर अभी भी अनिश्चित हैं।

भारत की सक्रिय भूमिका

भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने इस सम्मेलन में ऊँचे स्तर की द्विपक्षीय बैठकें कीं। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की समकक्ष मेघन क्विन से मुलाक़ात कर भारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापक रणनीतिक साझेदारी की प्रगति की समीक्षा की। अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमान के प्रमुख एडमिरल सैमुएल जे. पापारो से मिलकर सैन्य-से-सैन्य सहयोग गहरा करने पर चर्चा की। भारत को अब क्षेत्रीय सुरक्षा में एक गंभीर हिस्सेदार के रूप में देखा जा रहा है अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और सिंगापुर जैसी हर बड़ी शक्ति द्विपक्षीय स्तर पर भारत से जुड़ रही है। इसके अलावा रक्षा सचिव सिंह ने सिंगापुर सशस्त्र बलों के डिजिटल ऑपरेशंस टेक्नोलॉजी सेंटर का दौरा किया और AI, साइबर-इंटेलिजेंस तथा डिजिटल सुरक्षा जैसे उभरते युद्ध-क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं तलाशीं।

ऑस्ट्रेलिया का भारत-प्रेम: बेमिसाल प्रगति

ऑस्ट्रेलिया के उप-प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री रिचर्ड मार्ल्स ने शांग्री-ला के बाद सीधे भारत की यात्रा की, जहाँ उन्होंने भारतीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के साथ दूसरी ऑस्ट्रेलिया-भारत रक्षामंत्री वार्ता में शिरकत की। यह मुलाक़ात द्विपक्षीय रक्षा साझेदारी में अभूतपूर्व प्रगति और सहयोग बढ़ाने की साझा महत्वाकांक्षा को दर्शाती है। ऑस्ट्रेलियाई मंत्री ने कहा, “विगड़ते रणनीतिक माहौल में, विशेष रूप से इंडो-पैसिफिक में, हम अपने साझेदारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

जापान का ऐतिहासिक सैन्य परिवर्तन

जापान एक संकुचित चरण से गुज़र रहा है: उसे चीन को रोकना है, ताइवान के इर्द-गिर्द अस्थिरता के लिए तैयार रहना है, और अमेरिकी प्रतिबद्धताओं की अनिश्चितता से बचाव करना है यह सब बिना किसी उकसावे या अपनी क्षमता से अधिक बोझ उठाए। जापान का वित्त वर्ष 2026 का मुख्य रक्षा बजट 9.04 ट्रिलियन येन (लगभग 58 अरब डॉलर) तक पहुँच गया है, और कुल सुरक्षा संबंधित खर्च लगभग 10.6 ट्रिलियन येन यानी जीडीपी का करीब 1.9% हो गया है। 2% की सीमा, जो लंबे समय से संवेदनशील मानी जाती थी, अब समय से पहले ही व्यावहारिक रूप से छू ली गई है। जापान के रक्षा बजट में 970 अरब येन (लगभग 608 मिलियन डॉलर) स्टैंड-ऑफ मिसाइलों के लिए और 177 अरब येन स्वदेशी रूप से विकसित टाइप-12 सतह-से-जहाज़ मिसाइलों के लिए शामिल हैं, जिनकी मारक दूरी 1,000 किलोमीटर है।

चीन का बढ़ता सैन्य बजट और आक्रामकता

चीन ने 2026 के लिए अपना रक्षा बजट 7% बढ़ाकर 1.9096 ट्रिलियन युआन (276.8 अरब डॉलर) कर दिया है। प्रधानमंत्री ली कियांग ने प्रतिनिधियों से कहा कि चीन अगले पाँच वर्षों में प्रमुख रक्षा-संबंधित परियोजनाएं चलाएगा। यह रक्षा आवंटन पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को 2035 तक पूरी तरह आधुनिक बनाने के दीर्घकालिक प्रयास का हिस्सा है। पिछले एक दशक में चीन ने उन्नत मिसाइल प्रणालियों, नौसेना मंचों, पनडुब्बियों और निगरानी तकनीकों में भारी निवेश किया है। चीनी नौसेना ने दक्षिण चीन सागर और पश्चिमी प्रशांत में दो बड़े सैन्य अभ्यास किए, जो फिलीपींस में चल रहे बालिकाटान 2026 संयुक्त अभ्यासों की प्रतिक्रिया में थे, जिसमें अमेरिकी और जापानी बलों ने हिस्सा लिया।

अमेरिका पर संदेह: “अकेले रहे तो भारी पड़ेगा”

अमेरिका की चीन-विरोधी बयानबाज़ी और सहयोगियों के प्रति उसके कठोर रवैये के बीच विरोधाभास के चलते इंडो-पैसिफिक के देश तेज़ी से अमेरिकी सुरक्षा गारंटियों पर संदेह करने लगे हैं। सहयोगी देश भले ही अधिक निवेश करें, लेकिन वे अधिक “हेजिंग” भी करेंगे यानी यह सोचेंगे कि क्या अमेरिका की सुरक्षा भरोसेमंद है या शर्तों पर निर्भर। यदि सहयोगी देश यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वाशिंगटन की प्राथमिक चिंता क्षेत्रीय व्यवस्था की रक्षा करने के बजाय घरेलू सुरक्षा है, तो परिणाम सामूहिक शक्ति के बजाय विखंडन हो सकता है। 2026 के अमेरिकी राष्ट्रीय रक्षा रणनीति दस्तावेज़ में ताइवान का नाम तक नहीं लिया गया। इससे ताइवान इस बात से चिंतित है कि वह अमेरिकी रक्षा परिधि से बाहर न हो जाए और वाशिंगटन की नज़र में वह सुरक्षा के बजाय केवल एक आर्थिक मुद्दा बनकर न रह जाए।

नई सुरक्षा वास्तुकला: “अमेरिका के बिना भी ज़िंदा रहो”

अमेरिका जब व्यस्त या “विचलित” दिखता है, तो जो देश कम अमेरिकी प्रतिबद्धता महसूस करते हैं, वे अनिश्चितता से बचाव के लिए अपने बाहरी गठबंधनों में विविधता लाते हैं। यही आज इंडो-पैसिफिक में हो रहा है। अमेरिकी अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि इंडो-पैसिफिक में “डिनायल डिफेंस” यानी अग्रिम बलों, लंबी दूरी की मिसाइलों और गहरे सहयोगी एकीकरण के जरिए इनकार की रणनीति बनाई जा रही है।

विशेषज्ञों की राय

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन की रिपोर्ट के अनुसार, इंडो-पैसिफिक के देश अमेरिकी प्रतिबद्धता को आकर्षित करने की कोशिश और अपने दाँव सुरक्षित रखने के बीच फँसे हुए हैं। अंततः इस क्षेत्र को एक अनिश्चित नई सुरक्षा स्थिति के साथ तालमेल बिठाना होगा।

निष्कर्ष: एक नए युग की शुरुआत

इंडो-पैसिफिक में जो बदलाव हो रहा है वह केवल सैन्य नहीं, बल्कि रणनीतिक मानसिकता का भी है। भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश अब सुरक्षा के लिए केवल अमेरिकी छतरी पर निर्भर नहीं रहना चाहते। वे आपस में रक्षा उद्योग, तकनीक, खुफिया सूचनाएं और नौसेना सहयोग साझा कर एक बहु-ध्रुवीय सुरक्षा ढाँचा बना रहे हैं — और यह ढाँचा चीन के उदय और अमेरिका की अनिश्चितता, दोनों का एक साथ जवाब है।

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