नोएडा। नोएडा सेक्टर-110 स्थित महर्षि आश्रम की जमीन को लेकर सामने आया घोटाला जितना बड़ा है, उससे कहीं ज्यादा गहरी है इसकी जड़ें। स्पिरिचुअल रिजेनेरेशन मूवमेंट फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एसआरएमएफ) ट्रस्ट की 3.36 हेक्टेयर बहुमूल्य जमीन को ट्रस्ट के ही कुछ भीतरी लोगों ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे खुर्द-बुर्द कर दिया। इस पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने शिकंजा कसते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है और सेक्टर-105 व सेक्टर-100 में छापेमारी कर अहम दस्तावेज जब्त किए हैं।
कैसे रची गई साजिश — ट्रस्ट के भीतर से ही हुई सेंधमारी
ईडी की जांच में खुलासा हुआ है कि इस घोटाले का मुख्य सूत्रधार जी. रामचंद्र मोहन है, जिसने वर्ष 2010 में खुद को ट्रस्ट का फर्जी कोषाध्यक्ष बताकर मिलते-जुलते नाम से फर्जी पैन कार्ड तैयार कराया और उसी के जरिये बैंक खाते खुलवाए। इस काम में उसका साथ दिया आकाश मालवीय ने, जिसने खुद को ट्रस्ट का कार्यकारी सदस्य बताते हुए फर्जी सेल डीड यानी बिक्री विलेखों पर हस्ताक्षर कर दिए।
यानी, जिस संस्था की जमीन की रखवाली जिन लोगों के जिम्मे थी, उन्हीं ने उसे बेचने की साजिश रची। फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी, जाली बोर्ड प्रस्ताव और नकली प्राधिकरण पत्रों का इस्तेमाल कर ट्रस्ट की प्राइम लोकेशन वाली जमीनें एक-एक कर बाजार में उतार दी गईं, जिनकी कीमत सैकड़ों करोड़ रुपये आंकी जा रही है।
बिल्डर ने जानते-बूझते खरीदी जमीन, फिर तुरंत आगे बेचकर धोया काला धन
जांच में सामने आया है कि नोएडा के गेझा-तिलपताबाद रकबे में आने वाली इस जमीन को वर्ष 2024-25 में सिंहवाहिनी इंफ्रा प्रोजेक्ट्स को बेचा गया। इस कंपनी के निदेशक प्रदीप सिंह ने यह जानते हुए भी कि जमीन एक धार्मिक-आध्यात्मिक ट्रस्ट की है, खरीद ली और इसके तुरंत बाद उसे अन्य पक्षों को बेचकर अपराध की कमाई यानी ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ को ठिकाने लगा दिया। ईडी ने प्रदीप सिंह की सक्रिय संलिप्तता पाई है और अब उन सभी अन्य लाभार्थियों की तलाश जारी है जो इस पूरे सिंडिकेट को चलाने में शामिल रहे।
जमीन पर रोक के बावजूद हो रहीं रजिस्ट्रियां — छोटे बिल्डर बना रहे फ्लैट
इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इस जमीन की खरीद-फरोख्त पर कानूनी रोक लगी होने के बावजूद कुछ छोटे-छोटे बिल्डर यहां फ्लैट निर्माण में जुटे हैं। सूत्रों के मुताबिक ये बिल्डर आपसी सांठगांठ के जरिये रजिस्ट्री कराने में सफल हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब अदालत तक ने इस जमीन पर नजर टेढ़ी कर रखी है, तब रजिस्ट्री कार्यालय में किसकी शह पर ये दस्तावेज पास हो रहे हैं?
ईडी की जांच अब केवल मूल खरीदारों तक सीमित नहीं रहेगी — जमीन खरीदने वाले सभी पक्षों की भी जांच होनी है, क्योंकि अवैध रूप से बेची गई इस जमीन को जानते या अनजाने में खरीदने वाले भी इस धन शोधन की कड़ी का हिस्सा बन सकते हैं।
प्राधिकरण के अफसर बने रहे मूकदर्शक — आंखें मूंदने का आरोप
इस पूरे मामले में नोएडा प्राधिकरण के वर्क सर्किल अधिकारियों की भूमिका भी कठघरे में है। जानकारों का कहना है कि प्राधिकरण के संबंधित अफसरों को इस जमीन पर हो रहे अवैध निर्माण और फर्जी रजिस्ट्रियों की पूरी जानकारी थी, फिर भी उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। यह चुप्पी महज लापरवाही नहीं, बल्कि मिलीभगत का संकेत मानी जा रही है। यदि समय रहते इन अफसरों ने अपनी जिम्मेदारी निभाई होती तो शायद यह घोटाला इतना विस्तार न पाता।
सुप्रीम कोर्ट का SIT आदेश, ईडी की समानांतर जांच
उल्लेखनीय है कि ट्रस्ट की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुप्रीम कोर्ट ने महज दो दिन पहले ही एसआईटी जांच का आदेश दे दिया था। इसी के साथ ईडी ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में दर्ज कई एफआईआर के आधार पर अपनी समानांतर जांच तेज कर दी है। गुरुवार और शुक्रवार को दो ठिकानों पर की गई छापेमारी के दौरान एजेंसी ने अहम दस्तावेज जब्त किए हैं और दोनों परिसर पूरी छापेमारी के दौरान सुरक्षा घेरे में रहे।
आगे क्या?
ईडी अब उन सभी कड़ियों को जोड़ने में लगी है जो इस पूरे सिंडिकेट को एकजुट करती हैं। जांच के दायरे में हैं:
- फर्जी दस्तावेजों पर रजिस्ट्री कराने वाले बिल्डर
- जमीन के अंतिम खरीदार और फ्लैट निर्माण में लगी कंपनियां
- प्राधिकरण के वे अधिकारी जिन्होंने जानते हुए भी आंखें फेरीं
- वे बैंक खाते जिनमें इस अवैध जमीन की रकम घूमी
महर्षि महेश योगी की विरासत से जुड़े इस ट्रस्ट की जमीन को लेकर चल रहा यह विवाद अब केवल एक संपत्ति विवाद नहीं रहा — यह एक संगठित भूमाफिया, प्रशासनिक मिलीभगत और मनी लॉन्ड्रिंग का गठजोड़ उजागर कर रहा है। अब देखना यह होगा कि SIT और ईडी की दोहरी जांच इस पूरे नेटवर्क को कहां तक खंगाल पाती है।

