यूपी रेरा: जेपी इंफ्राटेक होम बायर्स के मामले में पीएमओ सख्त, यूपी रेरा को जांच के निर्देश, 20 हजार से ज्यादा खरीदारों का वर्षों से इंतजार

यूपी रेरा: नोएडा। जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड (जेआईएल) की अधूरी परियोजनाओं में फंसे हजारों घर खरीदारों की पीड़ा अब सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) तक पहुंच गई है। नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में जेपी की विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े 1300 से अधिक बायर्स ने प्रधानमंत्री को पोस्टकार्ड भेजकर अपनी शिकायतें दर्ज कराई थीं, जिन पर पीएमओ ने संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश रेरा को जरूरी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

क्या है पूरा मामला

खरीदारों ने आरोप लगाया है कि उनकी परियोजनाएं वर्षों से अधूरी पड़ी हैं, कब्जे में लगातार देरी हो रही है और प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी संभाल रहे समूह की ओर से रेरा के नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रिवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम (सीपीग्रैम्स) के जरिए पीएमओ ने यूपी रेरा के संयुक्त सचिव केके सिंह को पूरे प्रकरण की जांच कर आवश्यक कदम उठाने को कहा है। खरीदारों की शिकायत है कि सुरक्षा ग्रुप ट्रांसफर फीस के नाम पर अधिक वसूली कर रहा है, जबकि परियोजनाओं में रेरा के किसी भी नियम का पालन होता नहीं दिख रहा। जेपी इंफ्राटेक की परियोजनाओं विशटाउन, जेपी ग्रीन्स सहित कई अन्य में करीब 20 हजार से ज्यादा खरीदार प्रभावित हैं। इनमें से कई परिवार एक से डेढ़ दशक से अपने घरों का इंतजार कर रहे हैं, और कुछ मामलों में तो प्रतीक्षा के दौरान खरीदारों की मौत तक हो चुकी है। जेआईएल रियल एस्टेट अलॉटी वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष आशीष मोहन गुप्ता ने बताया कि लगातार भेजे गए पोस्टकार्ड को पीएमओ ने गंभीरता से लिया है, और अब एसोसिएशन प्रधानमंत्री से सीधे मुलाकात का समय मांग रहा है।

पृष्ठभूमि: दिवालिया प्रक्रिया से अब तक की कहानी

जेपी इंफ्राटेक का मामला भारत में दिवालियापन कानून (आईबीसी) और रेरा के टकराव का पहला बड़ा उदाहरण बना था। 2017 में आईडीबीआई बैंक द्वारा कंपनी के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद चित्रा शर्मा मामले में खरीदार प्रतिनिधियों को कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स में शामिल किया गया था। कई असफल समाधान योजनाओं के बाद आखिरकार सुरक्षा रियल्टी को रुके हुए प्रोजेक्ट पूरा करने की जिम्मेदारी के साथ समाधानकर्ता चुना गया, और 2026 तक कुछ हिस्सों में निर्माण फिर शुरू हो चुका है, हालांकि हजारों खरीदार करीब एक दशक बाद भी अधर में लटके हुए हैं। एनसीएलटी ने मार्च 2023 में सुरक्षा रियल्टी की समाधान योजना को मंजूरी दी थी, लेकिन उसके बाद भी 22 हजार से अधिक बायर्स फ्लैट की डिलीवरी का इंतजार करते रहे। खरीदारों के समूह ने आरोप लगाया कि सुरक्षा रियल्टी प्रशासनिक शुल्कों में मनमानी वृद्धि कर रही है, आईबीसी अवधि के लिए भी ब्याज वसूल रही है, निर्माण बंद होने के बावजूद पुनर्बिक्री को बढ़ावा दे रही है, और सैकड़ों करोड़ रुपये समूह की अन्य कंपनियों की ओर मोड़े जाने के भी आरोप लगे। इसी असंतोष के चलते जेआईएल रियल एस्टेट अलॉटीज वेलफेयर सोसाइटी ने एनसीएलटी में एक निगरानी समिति गठित करने की मांग को लेकर याचिका भी दाखिल की, ताकि निर्माण की प्रगति पर नजर रखी जा सके। यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण ने भी खरीदारों की शिकायत के बाद सुरक्षा रियल्टी से जवाब-तलब किया था। प्राधिकरण के अधिकारियों के अनुसार प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए करीब 3000 करोड़ रुपये के निवेश का दावा किया गया था, जिससे 2026 से 2028 के बीच परियोजनाओं को पूर्णता और उपभोग प्रमाण पत्र मिलने की उम्मीद जताई गई थी।

आगे क्या

पीएमओ के निर्देश के बाद अब यह देखना अहम होगा कि यूपी रेरा जांच में क्या तथ्य सामने लाता है और सुरक्षा रियल्टी के खिलाफ क्या ठोस कार्रवाई होती है। खरीदारों का कहना है कि वे प्रधानमंत्री से सीधे मिलकर अपनी पीड़ा बताना चाहते हैं, ताकि वर्षों से लंबित उनके सपनों के घर को हकीकत में बदला जा सके।

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