अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को एक और बड़ा कानूनी झटका देते हुए मंगलवार को उनके उस कार्यकारी आदेश को असंवैधानिक करार दिया, जिसमें अमेरिकी धरती पर जन्मे बच्चों की जन्मसिद्ध नागरिकता (Birthright Citizenship) को सीमित करने का प्रयास किया गया था। अदालत ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि ट्रम्प द्वारा 20 जनवरी 2025 को, अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही दिन जारी किया गया यह कार्यकारी आदेश गैरकानूनी था।
क्या था मामला
सुप्रीम कोर्ट ने जन्मसिद्ध नागरिकता की व्यापक अवधारणा को बरकरार रखते हुए ट्रम्प के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि अमेरिका में अवैध रूप से या अस्थायी रूप से रह रहे लोगों के यहां जन्मे बच्चे अमेरिकी नागरिक नहीं माने जाएंगे। न्यायाधीशों ने गृहयुद्ध के बाद अपनाए गए संविधान के 14वें संशोधन की लंबे समय से चली आ रही व्याख्या तथा हाल के संघीय कानूनों के आधार पर यह निर्णय दिया कि बेहद सीमित अपवादों को छोड़कर, अमेरिकी धरती पर जन्मा हर व्यक्ति नागरिक है। ट्रम्प प्रशासन का तर्क था कि संविधान के 14वें संशोधन में दर्ज वाक्यांश “subject to the jurisdiction thereof” (अर्थात “जिनके अधिकार क्षेत्र में हों”) की व्याख्या इस तरह की जानी चाहिए कि वह उन प्रवासियों के बच्चों को बाहर रखे जो वैध या अवैध रूप से अमेरिका में रह रहे हैं। दूसरी ओर, इस आदेश को चुनौती देने वाले समूहों ने 1898 के ऐतिहासिक फैसले यूनाइटेड स्टेट्स बनाम वोंग किम आर्क का हवाला दिया, जिसमें चीनी मूल के माता-पिता से सैन फ्रांसिस्को में जन्मे एक व्यक्ति को अमेरिकी नागरिक माना गया था।
ट्रम्प के लिए लगातार तीसरा बड़ा झटका
यह हाल के महीनों में ट्रम्प के लिए सुप्रीम कोर्ट से तीसरी बड़ी हार है इससे पहले फरवरी में अदालत ने उनकी व्यापक टैरिफ नीति को अमान्य ठहराया था, और सोमवार को ही कोर्ट ने उन्हें फेडरल रिजर्व की लीसा कुक को तत्काल बर्खास्त करने से रोका था। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में फिलहाल रूढ़िवादी (कंजर्वेटिव) न्यायाधीशों का 6-3 का बहुमत है, जिसमें ट्रम्प द्वारा नियुक्त तीन न्यायाधीश भी शामिल हैं, और कोर्ट ने अन्य कई महत्वपूर्ण मामलों में राष्ट्रपति के पक्ष में फैसले भी दिए हैं।
सुनवाई के दौरान ट्रम्प की ऐतिहासिक मौजूदगी
इस मामले में 1 अप्रैल को हुई मौखिक बहस के दौरान डोनाल्ड ट्रम्प सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में स्वयं उपस्थित होने वाले पहले मौजूदा राष्ट्रपति बने थे, लेकिन उस दौरान भी पीठ का रुख उनके पक्ष में नहीं दिखा था। रिपब्लिकन नियुक्त तीन न्यायाधीशों समेत कई जजों ने सरकार के तर्कों पर गहरी आपत्तियां जताई थीं, जिनमें जस्टिस एमी कोनी बैरेट का यह तीखा सवाल भी शामिल था कि ट्रम्प के तर्क के अनुसार तो खुद उन मुक्त किए गए दासों की संतानें भी नागरिकता से वंचित रह सकती थीं, जिनके लिए मूलतः 14वां संशोधन लाया गया था।
जनमत भी आदेश के खिलाफ
सर्वेक्षणों में भी जन्मसिद्ध नागरिकता के समर्थन में जनता की राय स्पष्ट रही है। मई में मार्क्वेट लॉ स्कूल के एक सर्वे में 68% अमेरिकी वयस्कों ने कहा था कि कोर्ट को यही फैसला देना चाहिए कि 14वां संशोधन अमेरिका में जन्मे सभी लोगों को नागरिक बनाता है, जबकि केवल 32% लोगों ने ट्रम्प के सीमित आदेश का समर्थन किया था। इसी तरह जून में हुए क्विनिपिएक सर्वे में 69% पंजीकृत मतदाताओं ने 1898 के फैसले को बरकरार रखने के पक्ष में राय दी थी।
आगे क्या
चूंकि ट्रम्प का यह विवादित आदेश पहले ही कई निचली अदालतों द्वारा रोका जा चुका था और देश में कहीं भी लागू नहीं हुआ था, इसलिए इस फैसले से तत्काल किसी की नागरिकता की स्थिति में बदलाव नहीं आएगा। आव्रजन अधिकार संगठनों और नागरिक स्वतंत्रता समूहों ने इस फैसले को “ऐतिहासिक जीत” बताया है, वहीं ट्रम्प प्रशासन की ओर से इस फैसले पर प्रतिक्रिया का इंतजार है। विश्लेषकों का कहना है कि यह फैसला राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियों की सीमाओं को रेखांकित करने वाले मौजूदा न्यायिक रुख की एक और मिसाल है।

