नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात है। सड़कों पर बैरिकेडिंग, प्रदर्शन स्थलों पर भारी सुरक्षा बल और जगह-जगह निगरानी के बीच पुलिस प्रशासन का पूरा जोर विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने पर है। लेकिन इसी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कथित तौर पर ‘गोली मारो’ जैसे भड़काऊ नारे लगाए जाने का मामला एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करता है। सवाल यह है कि जब पुलिस की भारी मौजूदगी में इस तरह की नारेबाजी होती है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है? सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो वायरल हो रहे है जिनमें नारे लगाते कुछ युवक सुनाई दे रहे है। मौके पर पुलिस मौजूद है लेकिन सुनने के बाद भी पुलिस ने कान बंद किये हुए है।
प्रदर्शनकारियों को रोकने में सख्ती, भड़काऊ नारों पर क्या कार्रवाई?
दिल्ली में हाल के दिनों में विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए बड़े स्तर पर पुलिस बल तैनात किया गया है। जंतर-मंतर, कनॉट प्लेस और मध्य दिल्ली के दूसरे इलाकों में प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए बैरिकेडिंग और हिरासत जैसी कार्रवाई भी हुई है। दूसरी ओर, 11 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों के साथ कथित मारपीट तथा धमकी की घटनाओं को लेकर भी रिपोर्ट सामने आई थीं। इन घटनाओं ने पुलिस की भूमिका और मौके पर कानून लागू करने के तरीके पर बहस तेज की है।
ऐसे माहौल में यदि किसी समूह की ओर से ‘गोली मारो’ जैसे नारे लगाए जाने की पुष्टि होती है, तो पुलिस के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि नारे लगाने वाले कौन थे, क्या उनकी पहचान की गई और उनके खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाई की गई। कानून का पालन सभी के लिए समान होना चाहिए, चाहे कोई प्रदर्शन सरकार के समर्थन में हो या विरोध में।
आखिर कौन लगा रहा है ऐसे नारे?
यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। नारे लगाने वालों की पहचान और उनके संगठन के बारे में ठोस जानकारी के बिना किसी राजनीतिक दल या समूह पर आरोप लगाना उचित नहीं होगा। हालांकि, ऐसे नारों की प्रकृति को देखते हुए पुलिस को मामले की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। यदि वीडियो उपलब्ध है, तो उसकी प्रामाणिकता की जांच, उसमें मौजूद लोगों की पहचान और मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों के बयान जांच का हिस्सा होने चाहिए।
सिर्फ किसी समूह के नारे लगाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसके पीछे कोई राजनीतिक दल या संगठन है। लेकिन अगर जांच में किसी व्यक्ति या संगठन की भूमिका सामने आती है, तो उसके आधार पर कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए।
क्या दिल्ली पुलिस की कार्रवाई में दिखना चाहिए समानता का सिद्धांत?
दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी केवल प्रदर्शनकारियों को हटाना या सड़कों पर भीड़ नियंत्रित करना नहीं है। उसकी जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। यदि कोई व्यक्ति हिंसा के लिए उकसाने वाले नारे लगाता है, किसी को धमकाता है या शांति भंग करने की कोशिश करता है, तो मामले के तथ्यों के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
वहीं, शांतिपूर्ण विरोध करने वाले लोगों के अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। दिल्ली पुलिस ने पहले सार्वजनिक सुरक्षा और यातायात व्यवस्था के हवाले से बिना अनुमति सभाओं और प्रदर्शनों पर प्रतिबंध संबंधी आदेश जारी किए थे। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रतिबंधों और कानूनी कार्रवाई का पालन सभी समूहों के मामले में एक समान तरीके से हो रहा है या नहीं।
पुलिस की निष्पक्षता पर उठते सवालों का जवाब कौन देगा?
लोकतंत्र में पुलिस की निष्पक्षता केवल कार्रवाई करने से नहीं, बल्कि कार्रवाई में समानता दिखाई देने से भी साबित होती है। यदि एक पक्ष के प्रदर्शनकारियों को तुरंत हिरासत में लिया जाता है, जबकि दूसरे पक्ष की कथित भड़काऊ गतिविधियों पर कार्रवाई स्पष्ट नहीं होती, तो लोगों के मन में पक्षपात की आशंका पैदा हो सकती है। ऐसी आशंकाओं को दूर करने के लिए पुलिस को तथ्यों के आधार पर पारदर्शी जवाब देना चाहिए।
यह भी जरूरी है कि किसी वायरल वीडियो या अधूरी जानकारी के आधार पर निष्कर्ष न निकाला जाए। घटना का स्थान, समय, नारे लगाने वालों की पहचान और पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई की पुष्टि होने के बाद ही पूरी तस्वीर सामने आ सकेगी।
सबसे बड़ा सवाल: कानून सबके लिए बराबर कब दिखेगा?
दिल्ली में भारी पुलिस बल की तैनाती का उद्देश्य शांति बनाए रखना और किसी भी अप्रिय घटना को रोकना है। ऐसे में कथित भड़काऊ नारेबाजी की घटनाओं पर निष्पक्ष जांच और कार्रवाई जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
अब सवाल दिल्ली पुलिस और प्रशासन से है—क्या कथित ‘गोली मारो’ नारेबाजी के मामले में जांच कर लोगों की पहचान सार्वजनिक की जाएगी? क्या यह बताया जाएगा कि मौके पर मौजूद पुलिस ने क्या कार्रवाई की? और क्या कानून का पालन हर राजनीतिक विचारधारा और हर समूह पर समान रूप से लागू होगा?
इन सवालों का जवाब तथ्यों, जांच और आधिकारिक कार्रवाई से ही मिलना चाहिए। राजधानी में शांति बनाए रखने के लिए जरूरी है कि न तो शांतिपूर्ण विरोध को अनावश्यक रूप से दबाया जाए और न ही किसी भी समूह को कानून से ऊपर समझा जाए।

