भारत में 5G की रफ्तार पर सवाल, महंगे रिचार्ज, लेकिन स्पीड 4G जैसी

टावर घनत्व की कमी और भीड़भाड़ भरे नेटवर्क से जूझ रहे यूजर्स, आगे रिचार्ज और महंगा होने के आसार

देशभर में 5G सेवाओं के तेज़ी से विस्तार के बावजूद लाखों उपभोक्ताओं की शिकायत है कि उनके फोन में 5G का आइकॉन दिखने के बावजूद इंटरनेट की रफ्तार 4G से बेहतर महसूस नहीं होती। यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब मोबाइल रिचार्ज की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं।

कमजोर पड़ती औसत स्पीड

आंकड़े भी इस चिंता की पुष्टि करते हैं। जीएसएमए के अनुमान के अनुसार भारत में औसत 5G डाउनलोड स्पीड घट रही है, जो पिछले साल के लगभग 300 एमबीपीएस के मुकाबले अब करीब 243 एमबीपीएस रह गई है यानी करीब 19 प्रतिशत की गिरावट। इसी तरह ओकला के आंकड़ों में भी 5G स्टैंडअलोन नेटवर्क पर डाउनलोड स्पीड में गिरावट दर्ज हुई है, जिसे विश्लेषक स्टैंडअलोन नेटवर्क ग्राहकों और कुल डेटा खपत में तेज़ बढ़ोतरी से जोड़कर देखते हैं। यानी जैसे-जैसे अधिक लोग 5G इस्तेमाल कर रहे हैं, नेटवर्क क्षमता उस अनुपात में नहीं बढ़ पाई है।

असल वजहें क्या हैं

इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी: सही मायने में तेज़ 5G के लिए ज़्यादा टावर घनत्व, मज़बूत फाइबर बैकहॉल और डेडिकेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, जो देश के कई इलाकों में अब तक नहीं पहुँचा है।

लो बैंड स्पेक्ट्रम: कई जगह 5G लो बैंड स्पेक्ट्रम पर चल रहा है, जहाँ आइकॉन तो 5G दिखता है लेकिन असल स्पीड में खास फर्क नहीं आता।

पुराना 4G ढांचा: कुछ नेटवर्क अब भी पुराने 4G बैकबोन के सहारे ही 5G सेवा दे रहे हैं।

टावर पर भीड़: एक ही टावर पर बहुत से यूजर जुड़ने से बैंडविड्थ बंट जाती है — यही वजह है कि एक ही शहर में किसी को 300 Mbps तो किसी को मुश्किल से 20-30 Mbps मिलती है। तकनीकी विशेषज्ञ भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि दूरी और भीड़भाड़ बड़ी वजहें हैं। 5G की फ्रीक्वेंसी बहुत हाई होती है, जिससे स्पीड तो तेज़ मिल सकती है लेकिन इसकी रेंज (कवरेज दायरा) 4G से कम होती है — टावर के पास स्पीड 500 Mbps से 1 Gbps तक मिल सकती है, लेकिन दूरी बढ़ते ही स्पीड घटती जाती है। इसके अलावा शाम के व्यस्त समय में एक साथ हज़ारों यूजर टावर से जुड़ते हैं, जिससे ‘बैंडविड्थ कंजेशन’ के चलते सिग्नल फुल होने पर भी स्पीड धीमी हो जाती है।

अब जेब पर और बोझ

स्पीड की समस्या के बीच रिचार्ज महंगा होने की आहट भी तेज़ हो गई है। मॉर्गन स्टेनली के अनुमान के मुताबिक भारतीय टेलीकॉम कंपनियां वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में टैरिफ बढ़ा सकती हैं, जिसका असर प्रीपेड और पोस्टपेड दोनों तरह के 4G व 5G यूजर्स पर पड़ेगा। रिपोर्ट के अनुसार दरें करीब 16-20 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं, यानी आज ₹300-350 में मिलने वाला प्लान भविष्य में ₹400 के आसपास पहुँच सकता है। ICRA के अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में औसत प्रति यूजर आय (ARPU) करीब ₹220 तक पहुँच चुकी है, और संभावित टैरिफ बढ़ोतरी के बाद वित्त वर्ष 2027 में यह ₹230 तक जा सकती है। हालांकि जियो, एयरटेल और वोडाफोन आइडिया फिलहाल दाम बढ़ाने के मूड में नहीं दिख रहीं, लेकिन बाज़ार विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में एक और बड़ी बढ़ोतरी संभव है।

निष्कर्ष

विशेषज्ञों की मानें तो समस्या 5G तकनीक में नहीं, बल्कि क्रियान्वयन में है। भविष्य के सुपरफास्ट नेटवर्क का वादा तो जल्दी कर दिया गया, लेकिन उस स्तर का टावर घनत्व, फाइबर बैकहॉल और स्पेक्ट्रम आवंटन अब तक हर ग्राहक तक नहीं पहुँच पाया है। नतीजा यह है कि उपभोक्ता ज़्यादा कीमत चुका रहे हैं, लेकिन अनुभव अक्सर 4G जैसा ही रह जाता है।

यह भी पढ़ें: वेनेजुएला भूकंप चमत्कार: 8 दिनों तक मलबे में दबे सुरक्षा गार्ड हर्नान अल्बर्टो गिल फ्लोरेस को 100 घंटे के मिशन के बाद जिंदा बचे

यहां से शेयर करें