नोएडा का 158 करोड़ रुपये का आठ-मंजिला सिटी बस टर्मिनल पाँच साल से खामोश: उद्घाटन के बाद भी न कोई बस, न यात्री, प्रशासनिक उलझन और योजना की कमी पर सवाल

नोएडा अथॉरिटी द्वारा लगभग ₹158 करोड़ की लागत से सेक्टर 82 में बनाया गया आठ मंजिला “सिटी बस टर्मिनल” जो नवंबर 2022 में भव्य उद्घाटन के साथ सार्वजनिक किया गया था, उद्घोषणाओं के बावजूद परिचालनहीन पड़ा हुआ है। पांच साल बीतने के बाद भी टर्मिनल के गेट पर ताले लगे हैं, अंदर बिजली, पंखे तथा सीसीटीवी जैसी सुविधाएँ सुलभ हालत में होने के बावजूद न कोई बस आती दिखती है और न ही यात्री। स्थानीय प्रशासन की उदासीनता और योजना संबंधी प्रश्‍नों ने परियोजना की उपयोगिता पर गंभीर शंकाएं खड़ी कर दी हैं।

परियोजना का उद्देश्य और बनावट

टर्मिनल को नोएडा को “स्मार्ट सिटी” बनाने और क्षेत्रीय परिवहन सुविधाओं को केंद्रीकृत करने के उद्देश्य से विकसित किया गया था। आधिकारिक रूपरेखा के अनुसार इस सुविधा में यूपीएसआरटीसी की अधिकांश सिटी बसों का प्रस्थान-बिंदु बनाया जाना था। इमारत में यात्रियों के ठहरने के लिए वार्ड, फूड कोर्ट, टिकटिंग काउंटर और 522 कारों के लिए पार्किंग की व्यवस्था की गई है। आठ मंजिल होने के कारण इसे शहरी मोबिलिटी के बड़े केंद्र के रूप में परिकल्पित किया गया था।

वर्तमान हालात: सुनसान भवन, खराब होती सुविधाएँ

स्थल का दौरा करने पर रिपोर्टर ने पाया कि टर्मिनल के मुख्य द्वार पर सेरीयल संख्या वाले ताले लगे हैं। परिक्षेत्र में अंदर बिजली चालू दिखती है — लिफ्ट, पंखे और कुछ सीसीटीवी कैमरे काम करते मिले — परंतु ऑड-इफैक्टिव उपस्थिति के कारण कुर्सियाँ और अन्य बैठने की सुविधाएँ इस्तेमाल न होने से धीरे-धीरे खराब हो रही हैं। पार्किंग क्षेत्र में भी गाड़ियाँ गायब हैं। स्थानीय दुकानदारों और आसपास के निवासियों का कहना है कि उद्घाटन के समय सरकारी समारोह के बाद से सच्चे परिचालन का कोई संकेत नहीं मिला। कई गुमशुदा घोषणाएँ और उपयोग के वायदे अब सुनसान ढांचे में बदल चुके हैं।

प्रशासनिक जवाबदेही और असफल हस्तांतरण के प्रयास

रिपोर्ट के अनुसार, नोएडा अथॉरिटी ने टर्मिनल के संचालकीय कर्तव्यों को स्थानीय परिवहन विभाग या केंद्रीय परिवहन मंत्रालय/ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री को हस्तांतरित करने के प्रयास किए। हालांकि ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री ने इसे लेने से इनकार कर दिया। वहीं चर्चा रही कि इस संरचना को बैंकवेट हॉल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अथवा अस्पताल में बदला जाए, पर पिछले लगभग पांच वर्षों में किसी भी प्रस्ताव पर निर्णायक कदम नहीं उठाया गया। नोएडा अथॉरिटी के वरिष्ठ अधिकारियों और सीईओ से जवाबदेही तय करने के प्रयास पर रिपोर्टर को कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिली। संबंधित विभागों के मौन ने सवालों को और बढ़ा दिया है।

योजना और अपेक्षा में स्पष्ट कमी

स्थानीय नागरिकों और शहरी नियोजन विशेषज्ञों ने कहा कि क्षेत्र में यात्रियों की कमी और बसों का टर्मिनल पर न रुकना इस बात का संकेत है कि परियोजना से पहले पर्याप्त ‘डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट’ (DPR) या व्यावहारिकता (फिजिबिलिटी) अध्ययन नहीं कराया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि कोई सही यातायात सर्वे, रूट-इंटीग्रेशन अध्ययन या परिचालन मॉडल तैयार किए बिना भव्य इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने से संसाधनों की बर्बादी हुई है। एक शहरी परिवहन विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “यह क्लासिक प्लानिंग विफलता है — ग्राउंड-रिक्वायरमेंट, कैचमेंट एरिया का आकलन और स्टेकहोल्डर एग्रीमेंट के बिना प्रोजेक्ट बनाया गया।”

आर्थिक और नागरिक प्रभाव

158 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली इस परियोजना के लंबे समय तक निष्क्रिय रहने से सरकारी कोष के साथ-साथ स्थानीय जनता का भरोसा प्रभावित हुआ है। आसपास के छोटे व्यवसायों और फूड कारोबारियों ने कहा कि टर्मिनल के पूर्ण संचालन के वादे के कारण उनके निवेश योजनाएँ प्रभावित रहीं, परंतु वास्तविक संचालन न होने से वे आर्थिक तौर पर प्रभावित हुए। साथ ही सार्वजनिक संसाधन की यह निष्क्रियता करदाताओं के पैसे के ठीक उपयोग पर प्रश्नचिन्ह लगाती है।

आगे का रास्ता: विकल्प और मांगें

स्थानीय नागरिक समूह और कुछ पार्षद अब मांग कर रहे हैं कि अथॉरिटी खुली और पारदर्शी समीक्षा करे — DPR व प्रोजेक्ट रिकार्ड सार्वजनिक किए जाएँ, और यदि योजना विफल रही है तो पुन: उपयोग विकल्पों पर तेज़ निर्णय लिया जाए। वे सुझाव दे रहे हैं कि कम समय में इसे सार्वजनिक उपयोग जैसे सामुदायिक अस्पताल, बैंकवेट/मल्टीपरपज़ हॉल, या सांझा जिला परिवहन हब में बदला जाए — बशर्ते आर्थिक और संचालनीय मॉडल स्पष्ट हों। साथ ही, कई आवाज़ें दोषियों की जवाबदेही तय करने और भविष्य के लिए स्वतंत्र ऑडिट की भी मांग कर रही हैं।

नोएडा अथॉरिटी का तालमेल और पारदर्शिता प्रश्न के घेरे में

टर्मिनल की हालत ने स्थानीय प्रशासन की योजना बनाने और लागू करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता तथा समन्वय की कमी की कल्पना को बल दिया है। क्षेत्रीय नियोजन, परिवहन संचालन एजेंसियों और वित्त प्रबंधन के बीच समन्वयहीनता इस निष्क्रियता की मुख्य वजह प्रतीत होती है। नोएडा अथॉरिटी से कई बार टिप्पणी माँगी गई पर कोई आधिकारिक बयान प्राप्त नहीं हुआ। ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री ने भी कथित तौर पर टर्मिनल लेने से इनकार किया है पर उसके औपचारिक कारण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

निष्कर्ष

158 करोड़ रुपये की लागत से बनी इस प्रोजेक्ट की खामोशी न केवल वित्तीय हानि का मामला है बल्कि शहरी नियोजन और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल भी उठाती है। पारदर्शी जांच, DPR और फिजिबिलिटी रिपोर्टों का सार्वजनिक विमोचन तथा तेज़ निर्णय  चाहे वह पुन: उपयोग हो अथवा वास्तविक परिचालन शुरू करने का आवश्यक दिखाई देता है। स्थानीय नागरिक और विशेषज्ञ अब स्पष्ट जवाब और जवाबदेही की माँग कर रहे हैं। रिपोर्टर ने नोएडा अथॉरिटी और संबंधित अधिकारियों से टिप्पणी के लिए कई बार संपर्क किया; रिपोर्टिंग टाइम तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। रिपोर्ट में उद्धृत विशेषज्ञ टिप्पणियाँ अनुरोध पर उपलब्ध कराई जाएँगी।

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