सफाई कर्मचारियों को 10-15 साल तक नहीं मिले PF, ESI और ग्रेच्युटी के लाभ; ठेकेदारों से मिलीभगत की जांच की मांग
नोएडा विकास प्राधिकरण में सफाई कर्मचारियों के श्रम अधिकारों के हनन का एक और बड़ा मामला सामने आया है। इस बार आवाज़ उठाई है नगीना के सांसद चंद्र शेखर ने, जिन्होंने प्राधिकरण के महाप्रबंधक (GM) एसपी सिंह पर गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक विस्तृत पत्र लिखा है। इस पत्र में सांसद ने आरोप लगाया है कि एसपी सिंह ठेकेदारों के साथ कथित मिलीभगत और भ्रष्टाचार में संलिप्त हैं तथा सफाई कर्मचारियों को उनके वैधानिक अधिकारों से वर्षों से वंचित किया जा रहा है।
क्या हैं आरोप?
सांसद चंद्र शेखर के पत्र में कहा गया है कि नोएडा प्राधिकरण में 10 से 15 वर्षों से लगातार सेवाएं दे रहे सफाई कर्मचारियों को आज तक ग्रेच्युटी, कर्मचारी राज्य बीमा (ESI), भविष्य निधि (PF) और अन्य श्रम सुविधाओं का लाभ नहीं दिया गया है। इसे सांसद ने श्रम कानूनों का खुला उल्लंघन करार दिया है। पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अधिकारी अपने स्तर पर अनियमितताएं बरतते हुए इन कर्मचारियों के हकों की अनदेखी कर रहे हैं। सबसे गंभीर आरोप यह है कि GM एसपी सिंह पर ठेकेदारों के साथ कथित सांठगांठ की बात कही गई है, यानी ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के बदले में आर्थिक फायदे लेने की बात। सांसद ने मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए।
नोएडा में सफाई कर्मचारियों का पुराना दर्द
यह मामला अचानक सामने नहीं आया है। नोएडा प्राधिकरण में नए CEO कृष्णा करुणेश के पद संभालने के बाद से सफाई व्यवस्था को वर्क सर्कल्स के अधीन करने के फैसले से वरिष्ठता और तैनाती के विवाद खड़े हो गए थे, जिसके विरोध में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल शुरू हुई थी। कर्मचारियों की मुख्य मांगें अतिरिक्त कार्यभार, उचित वेतन और पुरानी व्यवस्था की बहाली से जुड़ी थीं। प्राधिकरण ने कड़ी कार्रवाई करते हुए 100 सफाई कर्मचारियों की सेवाएं तत्काल समाप्त कर दी थीं और 15 ठेकेदार कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। इसके बाद से प्रशासन और कर्मचारियों के बीच तनाव और गहरा होता गया। नोएडा प्राधिकरण की सफाई व्यवस्था बार-बार ठप होने की कगार पर पहुंच रही है। डोर-टू-डोर गार्बेज कलेक्शन एजेंसी की हड़ताल के कारण कई सेक्टरों में कूड़ा उठाने वाली गाड़ियां नहीं पहुंची और सड़कों पर कूड़े के ढेर लगने से जनता में आक्रोश है।
ठेकेदारों पर श्रम विभाग की कार्रवाई, लेकिन राहत अधूरी
योगी सरकार ने नोएडा में श्रम कानून उल्लंघन पर कड़ा रुख अपनाते हुए 24 कारखानों से जुड़े 203 ठेकेदारों के लाइसेंस रद्द किए और ब्लैकलिस्टिंग की प्रक्रिया शुरू की। श्रमिकों के बकाया भुगतान के लिए 1.16 करोड़ रुपये की पेनल्टी भी लगाई गई है।इसके बावजूद ज़मीनी स्तर पर कर्मचारियों को अभी भी उनका पूरा हक नहीं मिल रहा, यही सांसद के पत्र का मूल बिंदु है। विशेषज्ञों का कहना है कि नए श्रम कानूनों के बावजूद ठेका श्रमिकों को न्यूनतम वेतन, PF और ESI जैसी सुविधाएं ठीक तरह से नहीं मिल पा रही हैं। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के एक मामले में भी सुप्रीम कोर्ट से पुष्टि के बाद भी श्रमिकों को अवार्ड राशि का भुगतान नहीं हुआ। 46 करोड़ 36 लाख 80 हजार रुपये की राशि जमा होने के बाद भी आठ माह से अधिक समय बीत जाने पर श्रमिकों को भुगतान नहीं किया गया। यह दर्शाता है कि पूरे नोएडा-ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में श्रम शोषण की जड़ें गहरी हैं।
CM योगी का रुख और सरकार की प्रतिबद्धता
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में एक उच्चस्तरीय बैठक में स्पष्ट किया था कि श्रमिकों के अधिकारों, सुरक्षा और सम्मान की रक्षा के मामले में राज्य सरकार कोई समझौता नहीं करेगी। उन्होंने सभी औद्योगिक प्राधिकरणों को 24 घंटे के भीतर उद्योग समूहों, प्रबंधन और श्रमिकों से सीधे संवाद करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद नोएडा प्राधिकरण के अंदर चल रही कथित अनियमितताओं पर सांसद का यह पत्र सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
राजनीतिक हलचल तेज
सांसद चंद्र शेखर के इस पत्र ने जहां प्राधिकरण के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है, वहीं राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को अपने-अपने तरीके से उठाना शुरू कर दिया है। विपक्षी दल पहले से ही सफाई कर्मचारियों के समर्थन में आवाज़ उठाते रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, GM एसपी सिंह की भूमिका की जांच के लिए शासन स्तर पर दबाव बढ़ रहा है। सफाई कर्मचारी संगठनों ने सांसद के इस पत्र का स्वागत किया है और मांग की है कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ तत्काल कठोर कार्रवाई की जाए।
क्या होगा आगे?
सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस पत्र को संज्ञान में लिया है। यदि जांच के आदेश जारी होते हैं, तो नोएडा प्राधिकरण के कई और अधिकारियों पर गाज गिर सकती है। वहीं, सफाई कर्मचारी संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि शीघ्र कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वे बड़े आंदोलन की राह पर चलने को बाध्य होंगे। यह पूरा प्रकरण एक बार फिर यह सवाल उठाता है कि जब सरकार श्रमिकों के हितों की बात करती है, तो उसी सरकार के अधीन काम करने वाले प्राधिकरणों में इतने वर्षों से यह शोषण कैसे जारी रहा?

