नोएडा। नोएडा की औद्योगिक इकाइयों में हुई तोड़फोड़ की घटनाओं के बाद भले ही पुलिस सुरक्षा के चलते कारखानों में शांति बहाल हो गई हो, लेकिन उद्योग जगत के सामने एक नई और गहरी चुनौती खड़ी हो गई है। एक तरफ श्रमिकों के वेतन में वृद्धि, दूसरी तरफ ईरान युद्ध के कारण कच्चे माल की आसमान छूती कीमतें और ऊपर से उत्पाद के बिक्री मूल्य में कोई बदलाव नहीं — इस तिहरी मार से परेशान नोएडा के उद्योगपति अब मशीनों पर निर्भरता बढ़ाने की राह पकड़ रहे हैं। और यही राह दुनिया में ‘डार्क फैक्ट्री’ के नाम से जानी जाती है।
शांति तो आई, लेकिन संकट गहराया
नोएडा की विभिन्न फैक्टरियों में हुई तोड़फोड़ की घटनाओं के बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी और अब कंपनियों में काम शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा है। लेकिन उद्योगपतियों की परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रहीं। श्रमिक आंदोलन के बाद जहां वेतन बढ़ाना मजबूरी बन गई, वहीं इससे उत्पादन लागत में भारी इजाफा हो गया है।
ईरान युद्ध ने बढ़ाई कच्चे माल की कीमत
ईरान और इजरायल के बीच चल रहे सैन्य संघर्ष का असर अब नोएडा के कारखानों तक पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। आयात पर निर्भर उद्योगों को विशेष रूप से भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। समुद्री मार्गों पर बढ़े जोखिम के कारण माल ढुलाई की लागत भी बढ़ी है, जिससे उत्पादन की कुल लागत में लगातार वृद्धि हो रही है।
बिक्री मूल्य में बदलाव नहीं, मुनाफा हो रहा शून्य
उद्योगपतियों के सामने सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक तरफ लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन बाजार में उनके उत्पादों के दाम नहीं बढ़ पा रहे। कड़ी प्रतिस्पर्धा और बाजार के दबाव के चलते वे अपने उत्पादों की कीमत नहीं बढ़ा पा रहे। ऐसे में उनका मुनाफा लगातार सिकुड़ता जा रहा है और कई इकाइयां घाटे की कगार पर आ खड़ी हुई हैं।
मशीनों की शरण में जा रहे उद्योगपति
इस पूरी स्थिति से निपटने के लिए नोएडा की बड़ी कंपनियां अब मशीनों पर निर्भरता बढ़ाने की रणनीति अपना रही हैं। कई कंपनियां नई स्वचालित मशीनें खरीद रही हैं, ताकि मानव श्रम पर निर्भरता कम हो और उत्पादन लागत को नियंत्रित किया जा सके। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे उस दिशा में जा रही है जिसे दुनिया ‘डार्क फैक्ट्री’ के नाम से जानती है।
क्या होती है ‘डार्क फैक्ट्री’?
डार्क फैक्ट्री यानी ऐसा कारखाना जहां इंसानों की जरूरत लगभग शून्य हो जाती है। इसे ‘लाइट्स आउट मैन्युफैक्चरिंग’ भी कहते हैं, क्योंकि इन कारखानों में रोशनी की भी जरूरत नहीं होती — मशीनें अंधेरे में भी काम करती हैं। चीन, जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में डार्क फैक्ट्रियां तेजी से फैल रही हैं।
चीन की फैन्यूक कंपनी की फैक्ट्री इसका सबसे चर्चित उदाहरण है, जहां रोबोट खुद रोबोट बनाते हैं। जापान की यासकावा इलेक्ट्रिक और जर्मनी की एडिडास की स्पीड फैक्ट्री भी इसी मॉडल पर काम कर चुकी हैं। इन कारखानों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और इंटरनेट ऑफ थिंग्स के जरिए उत्पादन चौबीसों घंटे बिना रुके होता है।
भारत में भी बढ़ रहा चलन
भारत में अभी डार्क फैक्ट्री का मॉडल पूरी तरह नहीं आया है, लेकिन बड़े औद्योगिक समूह इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्सटाइल क्षेत्र में स्वचालन की गति तेज हो रही है। नोएडा जैसे औद्योगिक हब में यह बदलाव और तेज होने की संभावना है।
रोजगार पर मंडरा रहा खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि मशीनीकरण की यह लहर अल्पकालिक रूप से उद्योगपतियों को राहत दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह हजारों श्रमिकों की आजीविका पर संकट ला सकती है। नोएडा में लाखों प्रवासी मजदूर रोजगार के लिए कारखानों पर निर्भर हैं। अगर मशीनें इंसानों की जगह लेती रहीं तो बेरोजगारी की समस्या और विकराल हो सकती है, जो भविष्य में और बड़े सामाजिक संघर्षों को जन्म दे सकती है। सरकार और उद्योग जगत दोनों के लिए यह समय सोचने का है कि तकनीक और श्रम के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, ताकि उद्योग भी फले-फूले और मजदूरों की रोजी-रोटी भी सुरक्षित रहे।

