‘हर घर जल’ की सरकारी घोषणाएँ धरातल पर खोखली साबित, पाँच साल में बनी टंकी आज भी बेकार पड़ी; महिलाएँ और बच्चे रोज़ाना किलोमीटर दूर से ढो रहे पानी

नल में पानी नहीं, हर घर में नीला ड्रम, महोबा के गाँव आज भी बूँद-बूँद को तरस रहे

बुंदेलखंड का नाम सुनते ही जो तस्वीर मन में उभरती है सिर पर घड़ा लिए पगडंडियों पर चलती औरत  वह आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी दशकों पहले थी। उत्तर प्रदेश के महोबा जनपद के दर्जनों गाँवों और कस्बों में भीषण गर्मी के बीच जल संकट ने एक बार फिर अपना विकराल रूप दिखाया है। महोबा के कबरई नगर पंचायत के कई इलाकों में अभी तक न योजना पहुँची है और न पानी, जबकि बुंदेलखंड के ज़्यादातर हिस्सों में सरकारी योजनाएँ पहुँचने का दावा किया जा रहा है।

सुबह के छह बजे और खाली बाल्टियाँ

सुबह छह बजे का वक्त है। कस्बे की महिलाएँ अपने-अपने घरों के बाहर तमाम बाल्टियाँ रखे एक ओर नज़र किए बैठी हैं इस इंतज़ार में कि पानी का टैंकर आएगा। लेकिन टैंकर नहीं आता। जब उनसे बात की जाती है तो एक बुज़ुर्ग महिला का दर्द छलक पड़ता है  “सालों से यहाँ पानी नहीं पहुँचा है, योजनाएँ सिर्फ़ कागज़ पर हैं। इस उम्र में सिर पर बाल्टी रखकर घर के लिए पानी लाने दूर जाना पड़ता है।” एक और महिला बताती हैं कि टैंकर आते ही भीड़ लग जाती है, जिसके चलते कई बार आपसी लड़ाई भी हो जाती है। वे कहती हैं वो वृद्ध हैं और कई बार जब तक बाल्टी लेकर पहुँचती हैं, पानी खत्म हो जाता है।

बच्चे पानी ढोएँ या स्कूल जाएँ?

एक तरफ हीटवेव और बढ़ते तापमान के चलते गर्मी की मार, दूसरी तरफ पानी की किल्लत। एक महिला ने बताया कि उन्हें अपने बच्चों से पानी भरवाना पड़ता है। बेटा नवीं कक्षा में है, वो पहले कंधे पर टाँगकर भरी बाल्टी लाता है और फिर उसी कंधे पर किताबों से भरा हुआ भारी बस्ता लेकर स्कूल जाता है। एक दस साल का लड़का आजतक संवाददाता के सामने ही दस से ज़्यादा बाल्टियाँ भर देता है यह उसकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी है। कबरई के करीबी आधा दर्जन से ज़्यादा मोहल्ले और लगभग 35 हज़ार की आबादी इस समस्या से परेशान है।

पाइपलाइन है, पानी नहीं — बिल है, हल नहीं

इस कस्बे में एक बात आम है किसी भी घर में नल नहीं लगा है, न ही हैंडपंप। जब पाइपलाइन ही नहीं बिछ पाई हो तो नल किस काम का। एक हैंडपंप ज़रूर लगा है, लेकिन वो भी एक शोपीस बनकर रह गया है। इंद्रानगर इलाके में जगह-जगह पाइप तो लगे हैं, लेकिन पानी नहीं आता। एक व्यक्ति 2025 में दिए पानी का बिल दिखाता है, तो दूसरा कहता है कि पानी तो दिया नहीं, टैंकर भेजने का बिल ले रहे हैं। महोबा के ब्लॉक जैतपुर के गाँव बिहार में भी यही हाल है। गाँव की प्रधान केशन रानी बताती हैं कि आधा गाँव पानी की बर्बादी देख रहा है और आधा गाँव पानी के बिना परेशान है। गाँव के सुरेंद्र कुमार बताते हैं कि पानी न आने के कारण महिलाएँ और बेटियाँ आधा किलोमीटर दूर से पानी लाने को मजबूर हैं।

‘हर घर नल’ नहीं, ‘हर घर नीला ड्रम’

इंदिरानगर और राजेन्द्रनगर में हर घर नल तो नहीं पहुँच पाए, लेकिन हर घर नीले ड्रम ज़रूर पहुँच गए। यहाँ हर घर के बाहर नीले रंग के ड्रम रखे हैं जिनमें टैंकर आने पर पानी भरा जाता है। यही इस क्षेत्र के लोगों की ‘जल आपूर्ति व्यवस्था’ है कागज़ों पर ‘हर घर जल’, ज़मीन पर हर घर एक नीला ड्रम।

बिजली गई तो पानी भी गया

बुंदेलखंड के तमाम इलाकों में आँधी के बाद बिजली नहीं आई, नतीजा यह रहा कि न टैंकर भर पाए और न कबरई कस्बे में पहुँच पाए। महिलाओं की बाल्टियाँ खाली की खाली रह गईं। जो हिम्मत दिखा पाए वे दूर जाकर पानी भर कर ले आए, जो नहीं दिखा पाए वे भीषण गर्मी में बंद बिजली में प्यासे बैठे रहे। जल शक्ति विभाग के ऑपरेटर ने बताया कि बिजली नहीं आई तो टैंकर नहीं भर पाए कोई जनरेटर बैकअप नहीं है।

पाँच साल पहले बनी टंकी, आज भी खड़ी है बेकार

दो बार के लगातार बीजेपी विधायक की विधायक निधि से बनी कबरई की पानी की टंकी का शिलान्यास 2020 में हुआ था। यह टंकी आज भी नहीं चल पाई है, जबकि इसे बने पाँच से छह साल हो गए। टंकी के बाहर शिलान्यास का शिलापट्ट भी लगा है। स्थानीय लोग कड़वाहट के साथ कहते हैं “यह चुनावी वादों में से एक है। यह चल गई तो चुनावी मुद्दा भी खत्म हो जाएगा। नेता आते हैं, वोट माँगते हैं, पानी की समस्या हल करने का वादा करते हैं और भूल जाते हैं। सरकारें आईं और गईं, लेकिन कबरई के कई मोहल्लों में पानी नहीं आ पाया।”

बुंदेलखंड की भौगोलिक त्रासदी

यह संकट महज़ प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि भौगोलिक विडंबना का भी नतीजा है। बुंदेलखंड में औसत वर्षा पर्याप्त होने के बावजूद जल संकट बना रहता है इसके पीछे चट्टानी भूतल, उच्च तापमान, तेज़ जल प्रवाह, भूजल स्तर का गिरना और ऊपरी ढलानों पर वनों की कटाई जैसे पर्यावरणीय कारण हैं। पर्यावरणविद् गुंजन मिश्रा के अनुसार, ललितपुर, चित्रकूट और महोबा जिलों में भूजल स्तर में बारिश के बाद भी कोई सुधार नहीं होता, क्योंकि खनन और चट्टानी धरातल पानी को ज़मीन के भीतर जाने से रोकते हैं।

महिलाओं पर सबसे भारी बोझ

महोबा ज़िले के चिपिया गाँव में रहने वाली फूलकाली जैसी हज़ारों महिलाएँ इस जल संकट की सबसे बड़ी पीड़ित हैं। बुंदेलखंड क्षेत्र में 1.83 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं, जिनमें से 79 प्रतिशत ग्रामीण हैं। एनजीओ ‘अभियान’ के निदेशक अशोक कुमार का कहना है कि यह पुरानी सांस्कृतिक मान्यता है कि पानी लाना महिलाओं की ज़िम्मेदारी है इसलिए जल संकट में सबसे ज़्यादा महिलाएँ ही पीड़ित होती हैं।

प्रशासन का आश्वासन — जल्द होगा समाधान

महोबा के कबरई नगर पंचायत के एक्जीक्यूटिव ऑफिसर (EO) संजीव कुमार ने कहा है कि जल्दी ही यहाँ की समस्या खत्म हो जाएगी, तब तक पानी के टैंकर भेजे जा रहे हैं। उनका कहना है कि पानी की टंकी एक महीने में बनकर तैयार होने वाली है, जिसके बाद पानी पहुँचेगा। उप-जिलाधिकारी शिवध्यान पांडे भी कबरई की मुसीबत को स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि पानी की टंकी जल्द शुरू होगी जिससे स्थाई समाधान होगा। लेकिन स्थानीय लोगों को इन आश्वासनों पर भरोसा नहीं। वे कहते हैं पिछले पाँच साल से यही सुन रहे हैं।

जल जीवन मिशन की ज़मीनी सच्चाई

केंद्र सरकार की ‘हर घर जल’ योजना के तहत जल जीवन मिशन ने महोबा में बड़े पैमाने पर काम करने का दावा किया है। जल जीवन मिशन के तहत पाँच परियोजनाओं के ज़रिए ज़िले में 1.12 लाख से अधिक घरों में पाइपलाइन से जोड़ने का काम किया गया है। हालाँकि यह विशाल योजना आसानी से नहीं बन पाई काम के दौरान लगभग 1,131 किलोमीटर सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं। मगर ज़मीनी हक़ीकत यह है कि महोबा के कबरई जैसे दर्जनों इलाके अभी भी इस योजना की पहुँच से बाहर हैं।

यह सवाल पूछता है बुंदेलखंड

एक बुज़ुर्ग महिला के शब्द पूरे बुंदेलखंड की पीड़ा बयान करते हैं — “अगले जनम मोहे बुंदेलखंड में जनम न दीजो।” यह महज़ एक वाक्य नहीं, बल्कि दशकों की उपेक्षा का दस्तावेज़ है। सरकारें बदलती रहीं, योजनाएँ आती-जाती रहीं, शिलापट्ट लगते रहे लेकिन महोबा के मुधरा और कबरई जैसे गाँवों के घड़े आज भी खाली हैं। सवाल यह नहीं कि टंकी कब चालू होगी सवाल यह है कि आज़ादी के 78 साल बाद भी इस धरती के लोगों को पानी के लिए यह लड़ाई क्यों लड़नी पड़ रही है?

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