Dharmendra Pradhan’s resignation: नई दिल्ली / केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया। नीट-यूजी सहित विभिन्न परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं को लेकर हफ्तों से चल रहे छात्र आंदोलन के दबाव में यह फैसला हुआ। इस्तीफे की खबर आते ही दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शनकारियों में जश्न का माहौल छा गया।
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने इस्तीफे को “छात्रों और युवाओं की बड़ी जीत” बताया। जंतर मंतर पर उन्होंने कहा, “हमने कर दिखाया। पहला विकेट गिर गया है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन यहीं नहीं रुकेगा। प्रभावित परिवारों को मुआवजा, जुलाई 20 की पुलिस कार्रवाई में शामिल अधिकारियों पर कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमों की वापसी तक संघर्ष जारी रहेगा। दीपके ने समर्थकों से अपील की कि उन्हें हीरो न बनाया जाए। “एक व्यक्ति को हीरो बनाकर देश पहले भी बर्बाद हो चुका है। यह व्यक्तिगत जीत नहीं, सामूहिक संघर्ष की जीत है,” उन्होंने कहा।
जंतर मंतर पर इस्तीफे की खबर पहुंचते ही माहौल बदल गया। छात्र नारे लगाते, नाचते और एक-दूसरे को गले लगाते नजर आए। “धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो” के नारे अब “हमने जीत लिया” में बदल गए। कई युवा कह रहे थे कि यह सिर्फ एक मंत्री का इस्तीफा नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही की शुरुआत है। जेन-जी प्रदर्शनकारियों ने इसे “लोकतांत्रिक जीत” करार दिया। एक छात्र ने कहा, “सोशल मीडिया से शुरू हुई आवाज अब सड़क पर जीत बन गई है। अब सिस्टम बदलेगा।”
जेएनयू की पीएचडी स्कॉलर और एआईएसए अध्यक्ष नेहा बोरा लंबे समय से इस आंदोलन में शामिल रहीं। उन्होंने पहले भूख हड़ताल भी की थी। इस्तीफे के बाद उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक शुरुआत है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार, छात्रों के अधिकार और पुलिस की कार्रवाई की जवाबदेही तक लड़ाई जारी रहेगी। नेहा बोरा ने पहले भी कहा था कि सरकार शिक्षा और युवाओं के भविष्य को गंभीरता से नहीं लेती।
पर्यावरण कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक, जिन्होंने लंबे समय तक भूख हड़ताल की थी, ने इस्तीफे को “लोकतंत्र की जीत” बताया। अस्पताल के बेड से वी साइन दिखाते हुए उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “यह शांति, धैर्य और दृढ़ता की जीत है। सीजेपी, जेन-जी और सभी नागरिकों को धन्यवाद जिन्होंने डर छोड़कर आवाज उठाई।” उनकी पत्नी गीतांजलि अंग्मो पहले से ही जंतर मंतर पर सक्रिय थीं। उन्होंने कांग्रेस के कुछ प्रदर्शनों को “असंवेदनशील” बताया था और कहा था कि राजनीति से ऊपर उठकर छात्रों के साथ खड़ा होना चाहिए। वांगचुक को सोशल मीडिया पर कुछ लोग “गद्दार” और “बीजेपी एजेंट” कह रहे थे, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष शिक्षा सुधार और युवाओं के भविष्य के लिए है, किसी पार्टी के लिए नहीं।
राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रहीं। विपक्ष ने इसे बड़ी जीत बताया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने छात्रों को बधाई दी और कहा कि शिक्षा व्यवस्था सुधारने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है। प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी युवाओं की आवाज को सराहा। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने कहा, “यह पूरी डेमोक्रेसी की जीत है। सरकार को अब जनता की सुननी पड़ेगी।” सत्ता पक्ष की ओर से संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू समेत कुछ नेताओं ने धर्मेंद्र प्रधान के योगदान को याद करते हुए कहा कि वे शिक्षा क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे थे। बीजेपी के कुछ नेताओं ने इस्तीफे को “जिम्मेदारी का उदाहरण” बताया, जबकि कुछ ने कहा कि परीक्षाओं की समस्या सिर्फ एक मंत्री की नहीं है।
सोशल मीडिया पर, जहां से सीजेपी का आंदोलन शुरू हुआ था, इस्तीफे के बाद मीम्स और कमेंट्स की बाढ़ आ गई। कई यूजर्स ने “कॉकरोच ने हाथी को हरा दिया” जैसे मीम्स शेयर किए। कुछ ने लिखा, “सोशल मीडिया से खड़ी हुई पार्टी ने मंत्री गिरा दिया।” दूसरी तरफ कुछ कमेंट्स में सवाल उठाए गए कि क्या सिर्फ इस्तीफे से पेपर लीक की समस्या खत्म हो जाएगी। कई युवाओं ने लिखा, “अब असली लड़ाई शुरू हुई है—सिस्टम चेंज की।” कुछ मीम्स में अभिजीत दीपके और सोनम वांगचुक को “नए युग के नेता” बताया गया, तो कुछ में सरकार को “झुकने” का मजाक उड़ाया गया।
इस्तीफे के बाद भी सीजेपी और सरकार आमने-सामने हैं। दीपके ने साफ कहा है कि सिर्फ इस्तीफा पर्याप्त नहीं। मुआवजा, पुलिस कार्रवाई की जांच और परीक्षा सुधारों पर ठोस कदम उठाए बिना आंदोलन नहीं रुकेगा। जंतर मंतर पर अब भी छात्र मौजूद हैं और देश के अन्य शहरों में भी समर्थन प्रदर्शन जारी हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे सोशल मीडिया से उपजे युवा आंदोलन की ताकत का उदाहरण बता रहे हैं, जहां पारंपरिक पार्टियों से अलग एक नई आवाज उभरकर सामने आई है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है। अब देखना यह है कि सरकार शेष मांगों पर क्या रुख अपनाती है और सीजेपी का आंदोलन आगे किस रूप में आगे बढ़ता है।

