एक तरफ मोनिंदर के समर्थन में पुलिस कमिश्नर से मिला सपा प्रतिनिधिमंडल, दूसरी तरफ पार्टी के ही नेता पर दलित की जमीन हड़पने का आरोप एक ही वक्त की दो विरोधाभासी तस्वीरों ने खड़े किए सवाल
नोएडा की राजनीति में बुधवार का दिन समाजवादी पार्टी के लिए गहरे विरोधाभासों से भरा रहा। यह वह दिन था जब ‘पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक’ यानी PDA के नारे की ध्वजवाहक पार्टी एक ही पल में दो बिल्कुल अलग-अलग भूमिकाओं में नजर आई, एक मंच पर दलित उत्पीड़न के विरुद्ध खड़ी, और दूसरे मंच पर खुद उत्पीड़क के रूप में उजागर।
मोनिंदर के समर्थन में पुलिस कमिश्नर से मिला सपा प्रतिनिधिमंडल
समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह से मुलाकात कर सेक्टर-150 में युवराज मेहता को डूबने से बचाने का प्रयास करने वाले मुनेंद्र पर की गई पुलिस कार्यवाही पर चर्चा की। यह वही मुनेंद्र उर्फ मोनिंदर हैं, जो एक डिलीवरी एजेंट के तौर पर काम करते हैं और जनवरी में हुई उस दर्दनाक घटना के चश्मदीद गवाह हैं, जब घने कोहरे के बीच नोएडा सेक्टर-150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार बिना बैरिकेड वाले गहरे गड्ढे में जा गिरी थी। उस रात मोनिंदर ने अपनी जान की परवाह किए बिना कमर में रस्सी बांधकर अंधेरी रात में पानी में उतरकर युवराज को खोजने की कोशिश की थी। इस साहसिक कदम के बाद मोनिंदर जनमानस में नायक की तरह उभरे थे। सपा सांसद हरेन्द्र मलिक ने कहा कि गड्ढे में भरे पानी में मदद के लिए आगे आने से मुनेंद्र की लोकप्रियता काफी बढ़ गई थी, जिससे कुछ लोग उनसे ईर्ष्या करने लगे और द्वेष की भावना से उन पर झूठा मुकदमा दर्ज करवा दिया। साथ ही आरोप लगाया कि पुलिस ने बिना तहकीकात के उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। सपा नेताओं ने पुलिस कमिश्नर से मुनेंद्र पर की गई कार्यवाही की निष्पक्ष जांच किए जाने की मांग की। हालांकि पुलिस सूत्रों का पक्ष अलग है। पुलिस के अनुसार मोनिंदर पर क्षेत्र में पहले से ही कई आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं और पुलिस केवल नियमानुसार कार्यवाही कर रही है। मोनिंदर सिंह का खुद कहना है कि “मैं इस मामले में एकमात्र चश्मदीद गवाह हूं और मैं सच के साथ खड़ा रहूंगा।”

ठीक उसी वक्त — मीडिया क्लब में सपा नेता पर दलित का बड़ा आरोप
लेकिन नोएडा राजनीति की विडंबना देखिए। जिस वक्त सपा का यह प्रतिनिधिमंडल पुलिस कमिश्नर के दफ्तर में दलित उत्पीड़न का विरोध कर रहा था, ठीक उसी समय नोएडा मीडिया क्लब में एक दलित व्यक्ति सपा के ही एक नेता के विरुद्ध प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहा था। प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीड़ित दलित ने आरोप लगाया कि भंगेल क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के एक कथित पूर्व लोकसभा प्रत्याशी नेता ने उनकी 1000 वर्ग मीटर जमीन पर कोर्ट के आदेश और एसडीएम की पैमाइश के बावजूद चारदीवारी नहीं होने दी। पीड़ित का कहना है कि जब भी वे अपनी भूमि पर निर्माण के लिए प्रशासन से सहायता मांगते हैं, तब-तब यह सपा नेता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से प्रशासन को फोन करवा देते हैं, जिसके बाद प्रशासन कभी पुलिस बल की कमी का बहाना बनाता है, तो कभी अन्य कारण गिनाता है।
‘PDA की आड़ में दलितों को परेशान कर रही है सपा’
मीडिया से बात करते हुए पीड़ित दलित व्यक्ति ने समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर ‘PDA’, यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक, की आड़ में दलितों को ही परेशान करने का सीधा आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जो पार्टी दलित हितों की रक्षा का नारा बुलंद करती है, उसी पार्टी के नेता जमीनी हकीकत में दलितों का उत्पीड़न कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषण : ‘उलटबांसी’ से उठे गंभीर सवाल
एक ही दिन में, एक ही शहर में, एक ही पार्टी की ये दो विरोधाभासी तस्वीरें एक तरफ दलित के हक में पुलिस से लड़ती सपा, दूसरी तरफ खुद सपा के नेता पर दलित की जमीन हड़पने का आरोप ने नोएडा में राजनीतिक बहस का नया मोर्चा खोल दिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह घटना सपा के PDA फॉर्मूले की साख के लिए एक असहज परीक्षा की घड़ी है। पार्टी जब दलितों के साथ खड़े होने का प्रदर्शन करे, तभी पार्टी के भीतर से दलित उत्पीड़न के आरोप उठें यह संयोग नहीं, बल्कि पार्टी की आंतरिक कार्यसंस्कृति पर सवालिया निशान है। अब सबकी निगाहें समाजवादी पार्टी के प्रदेश नेतृत्व पर टिकी हैं क्या पार्टी इस जमीन हड़पने के आरोपी नेता के विरुद्ध कोई कार्यवाही करेगी? या फिर ‘PDA’ नारे की गूंज सिर्फ चुनावी मंचों तक सीमित रहेगी? यह सवाल अब नोएडा की गलियों से निकलकर प्रदेश की राजनीति का हिस्सा बन गया है।

