ईरान में एकता और प्रतिरोध की नई लहर, खामेनेई के बाद ईरान-तेहरान की ज़मीनी हकीकत, बदले के लिए ईरान तैयार

दो महीने पहले 28 फरवरी को इजरायली-अमेरिकी हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामनेई की शहादत के बाद तेहरान और पूरे ईरान में राष्ट्रवाद, धार्मिक एकता और प्रतिरोध की अभूतपूर्व लहर उभरी है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की ग्राउंड रिपोर्ट्स से पता चलता है कि आम ईरानी नागरिक युद्ध की धमकियों और आर्थिक दबाव के बावजूद सामान्य जीवन जी रहे हैं, बाजार खुले हैं और सड़कों पर अडिग प्रदर्शन जारी हैं।

खामनेई की शहादत: सादगी और साहस का प्रतीक

तेहरान के एक मध्यम वर्गीय इलाके में खामनेई का निवास स्थान अब श्रद्धांजलि का केंद्र बन गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, खामनेई किसी बंकर या महल में नहीं, बल्कि साधारण घर में रहते थे जहां घर और दफ्तर एक ही परिसर में थे।

जब खुफिया जानकारी मिली कि हमला होने वाला है और उन्हें सुरक्षित बंकर में जाने की सलाह दी गई, तो उन्होंने कहा था, “अगर आप आम जनता को वैसी सुरक्षा दे सकते हैं जैसी मुझे, तो मैं ले लूंगा, वरना नहीं।” हमले में उनकी पत्नी, बेटे मुस्तफा खामनेई (जो अब नए सुप्रीम लीडर हैं) और अन्य परिवार सदस्य मौजूद थे। उनकी बेटी और दामाद शहीद हो गए। स्थानीय लोग ‘कुफिया’ (फिलिस्तीनी स्कार्फ) पहने नजर आ रहे हैं, जिन पर नए लीडर मुस्तफा खामनेई की तस्वीरें हैं। यह संदेश साफ है फिलिस्तीन के साथ ईरान का साथ अटूट है। खामनेई का अंतिम संदेश लोगों को प्रेरित कर रहा है: “इस्लाम जिंदा रहना चाहिए, मैं जिंदा रहूं या न रहूं।” उन्होंने जुमे की नमाज में अमेरिका को खुली चुनौती दी थी। उनकी शहादत ने शिया-सुन्नी मुसलमानों को एकजुट किया है; भारत के शाहीन बाग जैसे इलाकों में भी सुन्नी दुकानदारों ने उनकी तस्वीरें और उद्धरण लगाए हैं।

बी-ब्रिज (करज) पर ट्रिपल टैप हमला: युद्ध अपराध का आरोप

मध्य पूर्व के सबसे ऊंचे पुलों में शुमार बी-1 ब्रिज (करज-तेहरान को जोड़ने वाला) पर 2  अप्रैल को अमेरिकी हमला हुआ। यह पुल औद्योगिक शहर करज को तेहरान से जोड़ता था और रूस-मध्य एशिया व्यापार के लिए रणनीतिक महत्व रखता था। ईरान इसे स्वदेशी तकनीक से बना रहा था। रिपोर्ट्स में इसे ‘ट्रिपल टैप’ हमला बताया गया पहले हमले के बाद घायल लोगों को बचाने आए पैरामेडिक्स पर भी हमला, जिसे जिनेवा कन्वेंशन का उल्लंघन (युद्ध अपराध) माना जा रहा है। कई नागरिक मारे गए। विशेषज्ञों का कहना है कि उद्देश्य तेहरान को अजेरी इलाकों से काटकर विद्रोह भड़काना था, लेकिन ईरानी समाज की एकता ने इसे नाकाम कर दिया। ईरान ने जवाब में सऊदी-बहरीन को जोड़ने वाले किंग फहद कॉजवे पर प्रतीकात्मक हमला किया। पुनर्निर्माण तेजी से चल रहा है; उम्मीद है एक-डेढ़ महीने में पुल फिर चालू हो जाएगा।

तेहरान की महिलाएं और हिजाब: प्रोपेगेंडा vs हकीकत

इंकलाब स्क्वायर और वली असर चौराहे से ग्राउंड रिपोर्ट्स बताती हैं कि पश्चिमी और कुछ भारतीय मीडिया में तेहरान को “खाली और डरा हुआ” दिखाया जा रहा है, लेकिन हकीकत उलट है। शुक्रवार की रात बाजारों में भारी भीड़ है, लोग परिवार के साथ घूम रहे हैं और खरीदारी कर रहे हैं। कई महिलाएं बिना हिजाब या ढीले हिजाब के, पश्चिमी कपड़ों और रंगे बालों के साथ नजर आ रही हैं। पॉश इलाकों में युवा जोड़े हाथ पकड़कर घूमते और कॉफी पीते दिखते हैं। पत्रकारों का तर्क है कि अगर हिजाब न मानने पर गोलियां या सामूहिक जेल होती, तो सड़कों पर इतनी महिलाएं नहीं दिखतीं। हालांकि, युद्ध के दौरान कुछ क्षेत्रों में प्रतिबंध सख्त हुए, लेकिन कुल मिलाकर enforcement ढीला पड़ा है। महिलाएं विवाह में अपनी शर्तें रखती हैं और सशक्त नजर आ रही हैं।

“हम अमेरिका से नहीं डरते”: 62 दिनों से सड़कों पर डटे लोग

मैदान-ए-वली असर से रिपोर्ट: पिछले 62 दिनों से लोग रात भर प्रदर्शन कर रहे हैं। दिन में काम, शाम को सड़क पर। बड़ा पोस्टर ट्रंप की जुबान सीते हुए दिखाता है “At the Breaking Point”। नारा गूंजता है: “मैदान बाशुमा, खयाबाने बामा” (मैदान-ए-जंग सेना का, सड़कें जनता की)। एक महिला प्रदर्शनकारी कहती है, “अमेरिका हमें अपनी शर्तों पर बात नहीं करवा सकता।” 62 वर्षीय बुजुर्ग कुरान चूमते हुए भावुक होकर कहते हैं कि उन्होंने 8 साल की इराक जंग देखी है, अब भी नहीं डरेंगे। शिक्षिकाएं बताती हैं कि परिवार की चिंता के बावजूद यह कर्तव्य है। जनता खुद लंगर (मुफ्त भोजन-चाय) का इंतजाम करती है। राष्ट्रवाद और धार्मिक भावनाएं एक साथ हैं – हर कोई 10-15 मिनट झंडा फहराता है।

आम जनता की प्रतिक्रियाएं

तेहरान के बाजारों में दुकानदार कहते हैं, “खामनेई की शहादत ने हमें मजबूत किया।” युवा छात्र एकजुटता पर जोर देते हैं। कुछ आर्थिक दबाव और युद्ध थकान स्वीकार करते हैं, लेकिन “रिजीम चेंज” या बाहरी दबाव स्वीकार करने को तैयार नहीं। सुन्नी-शिया एकता और फिलिस्तीन समर्थन हर जगह दिखता है। विश्लेषकों का मानना है कि यह संकट ईरान को अंदर से और मजबूत कर रहा है, हालांकि पुनर्निर्माण और कूटनीति की चुनौतियां बाकी हैं। तेहरान की सड़कें संदेश दे रही हैं ईरानी हौसला बुलंद है।

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