निर्जला एकादशी 2026: हरिद्वार से वाराणसी तक उमड़ा आस्था का सैलाब, जल-अन्न त्याग कर साधा कठोर व्रत

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी आज, 25 जून 2026 को देशभर में “निर्जला एकादशी” के रूप में मनाई जा रही है। सनातन धर्म के सबसे कठिन और सबसे पवित्र व्रतों में शुमार यह पर्व लाखों श्रद्धालुओं को सुबह से ही पवित्र नदियों के घाटों पर खींच लाया है। ‘निर्जला’ का अर्थ है “बिना जल के”, और इसी संकल्प के साथ भक्त चौबीस घंटे अन्न-जल दोनों का त्याग कर भगवान नारायण की आराधना में लीन हैं।

हरिद्वार में श्रद्धा का सैलाब, प्रशासन अलर्ट

धर्मनगरी हरिद्वार में आज तड़के से ही गंगा घाटों पर भारी भीड़ देखी गई। गंगा में स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने जल, फल और अन्य सामग्री का दान करते हुए धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया, और घाटों पर भजन-कीर्तन व मंत्रोच्चार की गूंज सुनाई दी। सुबह से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगा घाटों पर पहुंचे और स्नान के बाद विधि-विधान से व्रत-पूजन किया, इनमें कई परिवार भी शामिल रहे। भीड़ को देखते हुए हरिद्वार पुलिस-प्रशासन ने घाटों पर सुरक्षा बल तैनात किए और यातायात व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए विशेष प्रबंध किए। उत्तराखंड पुलिस ने स्नान पर्व के मद्देनज़र पहले ही ट्रैफिक और पार्किंग की विशेष योजना जारी कर दी थी, ताकि दूर-दूर से आ रहे श्रद्धालुओं को असुविधा न हो। 

आज ही है व्रत, कल सुबह होगा पारण

पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि का प्रारंभ 24 जून की शाम 6 बजकर 12 मिनट से हुआ और इसका समापन 25 जून रात 8 बजकर 09 मिनट पर होगा, और उदया तिथि के अनुसार आज ही व्रत रखा जा रहा है। व्रत खोलने यानी पारण का शुभ समय भी तय है पारण कल, 26 जून को सुबह 5:25 बजे से 8:13 बजे के बीच किया जाएगा। इससे पहले व्रती स्नान-पूजा करके ही जल ग्रहण करेंगे।

भीमसेन से जुड़ी पौराणिक कथा

निर्जला एकादशी को ‘भीमसेनी एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ भी कहा जाता है, और इसके पीछे महाभारत की एक प्रसिद्ध कथा है। मान्यता है कि भीम को भोजन का इतना शौक था कि वे साल की बाकी एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते थे। अपनी इस विवशता से परेशान भीमसेन महर्षि वेदव्यास के पास पहुंचे, जिन्होंने उन्हें वर्ष में केवल एक बार निर्जला एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी और बताया कि यह व्रत साल की चौबीस एकादशियों के बराबर पुण्य देता है। इसी कथा के कारण यह पर्व आज भी भीम के नाम से जाना जाता है।

पूजा-विधि और दान का महत्व

भक्तगण ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं। इस दिन अन्न, जल, वस्त्र, फल, मिट्टी का घड़ा, छाता, जूते-चप्पल और धन का दान करना विशेष शुभ माना जाता है, जिनमें अन्नदान और जलदान का महत्व सबसे अधिक होता है। साथ ही, पितरों के निमित्त पूजा-अर्चना और पिंडदान की परंपरा भी कई स्थानों पर निभाई जाती है। मान्यता है कि निर्जला एकादशी पर गंगा स्नान और व्रत से जाने-अनजाने सभी पाप धुल जाते हैं और साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि साल की चौबीस एकादशियों में से इसे सबसे फलदायी और सबसे कठिन दोनों माना जाता है — कठिन इसलिए कि भीषण गर्मी के बावजूद बिना एक बूंद पानी के यह व्रत निभाया जाता है, और फलदायी इसलिए कि इसे साल भर की सभी एकादशियों के पुण्य के समान माना गया है।व्रत व पूजा का समय स्थान विशेष के पंचांग के अनुसार थोड़ा भिन्न हो सकता है।

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