तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी अंदरूनी कलह और संगठनात्मक संकट ने एक और बड़ा झटका खाया है। पार्टी के सबसे वरिष्ठ राज्यसभा सदस्य और दशक से अधिक समय से संसद में टीएमसी का प्रतिनिधित्व कर रहे सुखेंदु शेखर रॉय ने आज पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और राज्यसभा सदस्य पद से भी इस्तीफा सौंप दिया। इस्तीफे के साथ उन्होंने भाजपा की सराहना करते हुए पार्टी छोड़ने का फैसला लिया।
रॉय ने ममता बनर्जी को अपना इस्तीफा सौंपा। उनके छोटे से प्रेस रिलीज और बयानों की भाषा काफी प्रभावशाली बताई जा रही है, जिसमें उन्होंने भाजपा की नीतियों और राष्ट्रीय स्तर पर उसके प्रभाव की सराहना की। इस घटनाक्रम से टीएमसी की राज्यसभा में सदस्य संख्या घटकर 12 रह गई है, जिससे भाजपा आसानी से उपचुनाव में जीत हासिल कर सकती है।
पृष्ठभूमि: चुनावी हार और विद्रोह की लहर
यह इस्तीफा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में टीएमसी की करारी हार के बाद आया है, जिसमें भाजपा ने 207 सीटों पर जीत हासिल की जबकि टीएमसी मात्र 80 सीटों तक सिमट गई। हार के बाद पार्टी में बगावत की लहर उठी। लगभग 60 टीएमसी विधायकों ने विद्रोह कर अलग समूह बनाया और नेता विपक्ष के पद के लिए दावा किया। कई काउंसिलरों और स्थानीय नेताओं ने भी इस्तीफे दिए या पार्टी से दूरी बना ली।
रॉय, जो 77 वर्षीय वरिष्ठ नेता और पूर्व कांग्रेस से टीएमसी में आए हैं, पिछले कई दिनों से पार्टी की आंतरिक स्थिति पर खुलकर बोल रहे थे। उन्होंने आरजी कर मामले, भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देने, आईपीएसी (राजनीतिक परामर्शदाता फर्म) के अत्यधिक प्रभाव और नेतृत्व में लोकतंत्र की कमी पर तीखी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि पार्टी “कुछ दिनों में खत्म” हो सकती है और “विघटन” की ओर बढ़ रही है। उन्होंने दावा किया था कि कई सांसद भाजपा की ओर रुख कर सकते हैं।
रॉय का सफर और योगदान
सुखेंदु शेखर रॉय टीएमसी के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे हैं और राज्यसभा में पार्टी के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले सदस्य थे। उन्होंने पार्टी की कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं, जिसमें संसदीय मामलों में सक्रिय भागीदारी शामिल रही। उनके इस्तीफे को टीएमसी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है क्योंकि वे पार्टी के “ग्रासरूट” से जुड़े चेहरे के रूप में जाने जाते थे। इस्तीफे में उन्होंने भाजपा की प्रशंसा करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर स्थिरता और विकास के लिए भाजपा की नीतियां बेहतर हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल में भाजपा मजबूत स्थिति में है।
टीएमसी पर क्या असर?
टीएमसी सूत्रों में इस घटना से हड़कंप मचा हुआ है। पार्टी पहले ही विधायकों के विद्रोह, काउंसिलरों के इस्तीफों और आंतरिक कलह से जूझ रही है। सुखेंदु रॉय जैसे वरिष्ठ नेता का जाना ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवालिया निशान लगाता है। विपक्षी दलों, खासकर भाजपा ने इसे टीएमसी के “अंत” की शुरुआत बताया है। भाजपा नेताओं ने रॉय के कदम का स्वागत किया है। इस घटनाक्रम से राज्यसभा में टीएमसी की स्थिति कमजोर हुई है और आगे और इस्तीफों की अटकलें लगने लगी हैं।
राजनीतिक विश्लेषण
राजनीतिक experts का मानना है कि टीएमसी में लोकतंत्र की कमी, भ्रष्टाचार के आरोप और जनता के मूड को न समझ पाने ने पार्टी को इस मुकाम पर पहुंचाया है। रॉय के बयानों में आरजी कर मामले के बाद जनता के आक्रोश को नजरअंदाज करने की बात प्रमुख रही। अब सवाल यह है कि क्या यह विद्रोह पार्टी के और विखंडन का कारण बनेगा या ममता बनर्जी इसे संभाल पाएंगी। यह घटना पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ती है, जहां भाजपा का उदय और टीएमसी का संकट स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। आगे की घटनाएं बंगाल की सियासी दिशा तय करेंगी।

