नई दिल्ली / पोर्ट ब्लेयर: भारत के सुदूर दक्षिण में स्थित अंडमान और निकोबार द्वीप समूह इस समय एक बड़े विकास प्रोजेक्ट और पर्यावरण संरक्षण की बहस के केंद्र में है। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘ग्रेट निकोबार द्वीप विकास योजना’ (Great Nicobar Island Development Project) के तहत इस द्वीप पर बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे और रियल एस्टेट का निर्माण होना है। इस परियोजना के विकास की ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से अडानी समूह (Adani Group) और अन्य सरकारी/निजी निकायों के पास है।
जहां एक तरफ सरकार इसे रणनीतिक और आर्थिक रूप से गेम-चेंजर मान रही है, वहीं दूसरी तरफ लाखों पेड़ों की कटाई और स्थानीय जनजातियों के अस्तित्व को लेकर पर्यावरणविदों ने मोर्चा खोल दिया है।
क्या है पूरा प्रोजेक्ट और अडानी समूह की भूमिका?
नीति आयोग (NITI Aayog) के विज़न के तहत तैयार किए गए इस मेगा प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत लगभग ₹72,000 करोड़ है। इस परियोजना के प्रमुख घटकों में शामिल हैं:
- इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT): यह इस प्रोजेक्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके विकास और संचालन के लिए अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (APSEZ) को चुना गया है। यह रणनीतिक बंदरगाह हिंद महासागर के प्रमुख व्यापारिक मार्ग पर स्थित है।
- इंटरनेशनल एयरपोर्ट और ग्रीनफील्ड सिटी: बंदरगाह के साथ ही एक विशाल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और एक आधुनिक ‘टाउनशिप’ (स्मार्ट सिटी) विकसित की जाएगी।
- रियल एस्टेट और पर्यटन: इस ग्रीनफील्ड सिटी में बड़े पैमाने पर रियल एस्टेट का विकास होगा, जिसमें आवासीय परिसर, होटल, रिसॉर्ट्स और वाणिज्यिक क्षेत्र शामिल हैं ताकि इसे एक वैश्विक पर्यटन और व्यापारिक केंद्र बनाया जा सके।
लाखों पेड़ों पर चलेगी कुल्हाड़ी: पर्यावरण का बड़ा नुकसान
इस विशालकाय शहर, बंदरगाह और हवाई अड्डे को बसाने के लिए ग्रेट निकोबार के प्राचीन और घने वर्षावनों (Rainforests) को साफ किया जाना है। विभिन्न रिपोर्ट्स और सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार:
- कितने पेड़ काटे जाएंगे?: केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अनुमानों के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट के लिए लगभग 8.5 लाख से लेकर 9.6 लाख पेड़ों को काटा जाना तय हुआ है।
- प्रभावित क्षेत्र: परियोजना के लिए लगभग 130 वर्ग किलोमीटर से अधिक के जंगलों को डायवर्ट (Divert) किया जा रहा है, जो कि इस द्वीप के कुल क्षेत्रफल का एक बड़ा हिस्सा है।
- क्षतिपूर्ति वनीकरण (Compensatory Afforestation): सरकार का तर्क है कि निकोबार में कटने वाले पेड़ों के बदले भारत के मुख्य भूभाग (जैसे हरियाणा या अन्य राज्यों) में पौधे लगाए जाएंगे। हालांकि, पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि निकोबार के लाखों साल पुराने सदाबहार जंगलों और वहां के पारिस्थितिकी तंत्र की भरपाई किसी अन्य राज्य में नए पौधे लगाकर नहीं की जा सकती।
जैव विविधता और स्थानीय जनजातियों पर संकट
विभिन्न पर्यावरण संगठनों, जैसे सर्फ़र फाउंडेशन और कंजर्वेशन इंटरनेशनल से जुड़े शोधकर्ताओं, का मानना है कि इस प्रोजेक्ट से द्वीप की अनूठी जैव विविधता पूरी तरह नष्ट हो जाएगी:
“ग्रेट निकोबार केवल पेड़ों का समूह नहीं है, यह दुनिया के सबसे दुर्लभ जीवों जैसे जायंट लेदरबैक कछुए (Giant Leatherback Turtles), निकोबार मेगापोड (Nicobar Megapode) और दुर्लभ केकड़ों का घर है। जंगलों के कटने और समुद्र में निर्माण से इनकी प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच जाएंगी।”
इसके अलावा, यह द्वीप दो प्रमुख स्वदेशी जनजातियों—शोम्पेन (Shompen) और निकोहबारी (Nicobarese) का मूल निवास स्थान है। शोम्पेन जनजाति बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटी हुई है और जंगलों पर निर्भर है। इस प्रोजेक्ट के कारण उनके पैतृक आवास और संस्कृति पर सीधा खतरा मंडरा रहा है।
सरकार और समर्थकों का पक्ष: सामरिक और आर्थिक लाभ
तमाम विरोधों के बीच, सरकार और रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रोजेक्ट भारत के भविष्य के लिए बेहद ज़रूरी है:
- चीन को टक्कर (Geopolitical Strategy): मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के पास स्थित होने के कारण यह द्वीप सैन्य और व्यापारिक दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील है। यहां बंदरगाह और शहर बनने से भारत हिंद महासागर में चीनी नौसेना की गतिविधियों पर नज़र रख सकेगा।
- आर्थिक समृद्धि: ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल बनने से भारत वैश्विक शिपिंग मैप पर एक बड़ा हब बन जाएगा, जिससे सालाना अरबों डॉलर का राजस्व मिलेगा और हज़ारों रोज़गार पैदा होंगे।
अंडमान-निकोबार का यह मेगा प्रोजेक्ट आधुनिक भारत की उस कशमकश को दर्शाता है जहां एक तरफ ‘आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा’ है, तो दूसरी तरफ ‘पर्यावरण और जनजातीय अस्तित्व’। अडानी समूह द्वारा संभाले जा रहे इस प्रोजेक्ट के तहत रियल एस्टेट और पोर्ट का निर्माण तो शुरू होने की दिशा में है, लेकिन इसके लिए चुकाई जाने वाली पर्यावरणीय कीमत (लाखों पेड़ों की बलि) ने इसे देश के सबसे विवादित प्रोजेक्ट्स में से एक बना दिया है।
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