‘मैं निःशब्द हूँ’ — जज ने फैसले में लिखा, ‘ऐसे पिता को समाज में रहने का अधिकार नहीं’
गुजरात से एक ऐसी दर्दनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली खबर सामने आई है, जो इंसानियत को शर्मसार करती है। राज्य के मेहसाणा जिले में एक पिता ने अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ बार-बार बलात्कार किया और सबूत मिटाने के लिए उसे गर्भनिरोधक गोलियाँ (Contraceptive Pills) खिलाता रहा। जब पीड़िता की गर्भावस्था का पता चला, तब पूरा मामला उजागर हुआ। मेहसाणा की विशेष POCSO अदालत ने इस जघन्य अपराध के लिए आरोपी पिता को आजीवन कठोर कारावास और पाँच लाख रुपये पीड़िता को मुआवज़े की सजा सुनाई है।
कैसे उजागर हुआ मामला?
पीड़िता के बड़े भाई ने तब पुलिस में शिकायत दर्ज कराई जब उसने बहन को पेट दर्द की शिकायत करते देखा और अस्पताल ले जाने पर पता चला कि वह गर्भवती है। जब लड़की से इस बारे में पूछा गया, तो उसने बताया कि उसके अपने पिता ने उसके साथ बलात्कार किया था। उसने यह भी कहा कि वह इसलिए चुप रही क्योंकि आरोपी ने उसे और उसके परिवार को जान से मारने की धमकी दी थी। पीड़िता की उम्र 17 वर्ष थी। उसने खुलासा किया कि पिता ने न केवल उसके साथ बार-बार यौन उत्पीड़न किया, बल्कि सबूत नष्ट करने और गर्भधारण से बचाने के लिए उसे गर्भनिरोधक गोलियाँ भी देता रहा। परंतु एक दिन यह षड्यंत्र विफल हो गया और सच सामने आ गया।
FIR और आरोप
पुलिस ने आरोपी के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(f)(j)(n), 354-A, 506(2) और POCSO अधिनियम 2012 की धारा 4, 5(l)(n)(j)(2), 6 तथा 8 के तहत प्राथमिकी दर्ज की।
कोर्ट का फैसला — ‘मेरे पास शब्द नहीं’
मेहसाणा की विशेष POCSO अदालत के न्यायाधीश सारंग एस. काले ने इस अपराध की भयावहता पर गहरी पीड़ा व्यक्त करते हुए 39 पन्नों के फैसले में लिखा कि वे ‘निःशब्द’ और ‘वास्तव में चौंके हुए’ हैं। जज ने कहा कि उन्होंने POCSO के तहत अनेक मामले देखे हैं, लेकिन यह विशेष रूप से दुखद मामला है क्योंकि यहाँ आरोपी पीड़िता का अपना पिता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि POCSO कानून बनाते समय शायद विधायिका ने भी यह कल्पना नहीं की होगी कि एक पिता ही अपनी बेटी के साथ इस तरह का जघन्य कार्य कर सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला जघन्यतम अपराधों की श्रेणी में आता है और ‘यदि ऐसी मानसिकता वाले व्यक्ति को समाज में रहने दिया गया, तो कोई भी लड़की या महिला सुरक्षित नहीं रहेगी।’ कोर्ट ने आरोपी को आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई और पीड़िता को पाँच लाख रुपये का मुआवज़ा दिए जाने का आदेश दिया।
ट्रायल के दौरान पिता ने नहीं दिखाया कोई पश्चाताप
न्यायाधीश ने यह भी नोट किया कि आरोपी ने सुनवाई के दौरान कोई पछतावा नहीं दिखाया, जो उसकी बॉडी लैंग्वेज से स्पष्ट था और इसे कोर्ट ने विशेष रूप से दर्ज किया।
POCSO कानून का कवच और न्यायिक दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट भी ऐसे मामलों में कड़ा रुख अपनाता रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अन्य मामले में स्पष्ट किया कि पिता द्वारा किया गया यौन हिंसा का अपराध एक विशेष श्रेणी का अपराध है, जो पारिवारिक विश्वासघात का सबसे भयावह उदाहरण है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे गंभीर POCSO मामलों में, विशेष रूप से जहाँ पारिवारिक विश्वास का उल्लंघन हो, जमानत जैसी राहत सामान्य रूप से नहीं दी जा सकती।
यह अकेला मामला नहीं — गुजरात में बढ़ती चिंता
गुजरात में इस तरह के मामले लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। गुजरात हाई कोर्ट को एक अन्य मामले में नर्मदा जिले के डेडियापाड़ा तालुका में पिता द्वारा 12 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार के बाद उसकी गर्भावस्था समाप्त कराने के लिए सरकारी अस्पताल को निर्देश देने पड़े थे। राज्य में ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या ने बाल सुरक्षा तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बाल अधिकार संगठनों ने सरकार से माँग की है कि इन मामलों में अभियोजन की विफलताओं को दूर किया जाए, क्योंकि दोषसिद्धि की तुलना में बरी होने के मामले अधिक हैं और चार्जशीट देर से दाखिल की जाती हैं।
विशेषज्ञों की राय
बाल मनोवैज्ञानिकों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि घर के भीतर होने वाले यौन उत्पीड़न (Incest) के मामले सबसे गंभीर होते हैं, क्योंकि पीड़िता का अपना सबसे विश्वसनीय व्यक्ति ही उसका शोषक बन जाता है। इसमें बच्ची न तो घर पर सुरक्षित होती है, न ही किसी से शिकायत कर पाती है। गर्भनिरोधक गोलियाँ देना यह साबित करता है कि आरोपी सुनियोजित और सचेत तरीके से अपराध कर रहा था, जो इस जुर्म को और अधिक जघन्य बनाता है।
क्या कहता है कानून?
POCSO अधिनियम 2012 की धारा 5 और 6 के तहत किसी नजदीकी रिश्तेदार, विशेष रूप से माता-पिता द्वारा बच्चे के साथ यौन उत्पीड़न को ‘एग्रेवेटेड पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ माना जाता है, जिसके लिए न्यूनतम 20 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान है। इस मामले में कोर्ट ने अधिकतम सजा देकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदेश दिया है।
निष्कर्ष
मेहसाणा की यह घटना पूरे देश के लिए एक बड़ी चेतावनी है। जब घर की चारदीवारी ही सुरक्षित नहीं रहती, जब रक्षक ही भक्षक बन जाता है, तो समाज और कानून दोनों को और अधिक सजग एवं सक्रिय होना होगा। कोर्ट का यह फैसला न केवल एक पीड़िता को न्याय दिलाता है, बल्कि ऐसे सभी नराधमों को कड़ा संदेश भी देता है।

