भारत में रबी लामिछाने का ढोल-नगाड़ा, असली संदेश क्या काठमांडू के लिए था?

मोदी-लामिछाने मुलाकात के पीछे की कूटनीतिक चाल, बालेन शाह को नई दिल्ली का अप्रत्यक्ष संदेश

जब नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के अध्यक्ष रबी लामिछाने पिछले सप्ताह भारत की राजधानी नई दिल्ली पहुँचे, तो उनका स्वागत किसी राष्ट्राध्यक्ष से कम नहीं हुआ। 3 जून को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ एक घंटे से अधिक की मुलाकात से पहले लामिछाने ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर, गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल और भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन के साथ भी बैठकें कीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सारा राजनयिक आतिथ्य केवल लामिछाने के लिए था, या भारत असल में नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह को कोई संदेश देना चाहता था?

तनाव की पृष्ठभूमि: लिपुलेख से शुरू हुई खटास

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में अपने पहले औपचारिक संबोधन में एक चौंकाने वाला बयान दिया कि न केवल भारत ने नेपाल की ज़मीन पर कब्ज़ा किया है, बल्कि नेपाल ने भी भारत की कुछ भूमि पर अतिक्रमण किया हुआ है, यह नेपाल के उस परंपरागत रुख से बिल्कुल अलग था, जो आमतौर पर अपने बड़े पड़ोसी पर कब्ज़े का आरोप लगाता रहा है। भारत-नेपाल संबंधों में हालिया तनाव की जड़ें कालापानी, लिपुलेख दर्रा और लिम्पियाधुरा को लेकर चल रहे विवाद में हैं, जिस पर दोनों देश अपना-अपना दावा ठोकते हैं।  तनाव तब और बढ़ गया जब नेपाल ने 2026 की कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भारत द्वारा लिपुलेख मार्ग के उपयोग पर आपत्ति जताते हुए भारत और चीन दोनों को अलग-अलग राजनयिक विरोध-पत्र भेजे। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिश्री की काठमांडू यात्रा की योजना थी, लेकिन उससे ठीक पहले लिपुलेख विवाद ने सिर उठाया। प्रधानमंत्री शाह ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे अपने प्रोटोकॉल स्तर से नीचे के अधिकारियों से नहीं मिलेंगे। इन दो कारणों से मिश्री की यात्रा रद्द हो गई। इसके बाद ही नई दिल्ली ने लामिछाने को भारत आने का निमंत्रण दिया।

लामिछाने की यात्रा: दल-से-दल की कूटनीति या पिछले दरवाज़े से संपर्क?

काठमांडू में मंत्री पोखरेल ने कहा कि लामिछाने की यह यात्रा पूरी तरह व्यक्तिगत क्षमता में है और इसे किसी आधिकारिक सरकारी दौरे से जोड़ना ग़लत होगा। लेकिन राजनयिक विश्लेषकों की नज़र में यह दावा अधिक विश्वसनीय नहीं लगा।अल जज़ीरा से बात करते हुए एक विशेषज्ञ ने कहा — “भारत यह समझने की कोशिश कर रहा है कि बालेन और उनकी सरकार के साथ कैसे पेश आया जाए। रबी लामिछाने की यात्रा उसी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है।” दिल्ली विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर निहार नायक का मानना है कि RSP अध्यक्ष की यह यात्रा नेपाल-भारत संबंधों को सरकारी और दलीय दोनों स्तरों पर मज़बूत करेगी। इससे भाजपा को RSP के विदेश, आर्थिक और रणनीतिक दृष्टिकोण को समझने का मौका मिलेगा। अब तक भाजपा मुख्य रूप से नेपाल की स्थापित पार्टियों के साथ ही जुड़ती रही है।

मोदी-लामिछाने मुलाकात: नए संबंधों का संकल्प

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रबी लामिछाने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल-भारत संबंधों में बदले राजनीतिक संदर्भ में एक नए अध्याय की शुरुआत पर सहमति जताई। बैठक में लामिछाने ने मोदी को बताया कि उनकी पार्टी के कंधों पर कोई पुराना राजनीतिक बोझ नहीं है और वे भारत के साथ संबंधों को नए सिरे से विकसित करना चाहते हैं। लामिछाने की यात्रा यह संकेत देती है कि सत्तारूढ़ RSP भारत के साथ खुले टकराव की राह पर नहीं चलना चाहती और वह संपर्क के औपचारिक व अनौपचारिक दोनों चैनल स्थापित करने की इच्छुक है। मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा “राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रबी लामिछाने से मिलकर प्रसन्नता हुई। मैं उनकी उस चाहत का स्वागत करता हूँ और उससे पूरी तरह सहमत हूँ कि हम साझा और समृद्ध भविष्य के लिए मिलकर काम करें।” उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के तहत एक प्राथमिकता साझेदार है।

असली सवाल: बालेन शाह कब आएंगे दिल्ली?

चूँकि प्रधानमंत्री बालेन शाह इस समय देश के भीतरी मसलों में व्यस्त हैं और उनकी कोई विदेश यात्रा की योजना नहीं है, ऐसे में इस मोड़ पर दल-से-दल की यह यात्रा काफी अहम हो जाती है। बालेन शाह ने संसद में यह भी कहा कि नेपाली सांसदों ने कालापानी क्षेत्र के सीमा विवाद को लेकर चीन और ब्रिटेन से भी संपर्क किया है — ब्रिटेन से इसलिए क्योंकि यह विवाद 1816 की सुगौली संधि तक जाता है, जो ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुई थी। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर प्रेम राज खनाल ने मीडिया को बताया कि लामिछाने की नई दिल्ली यात्रा नेता-से-नेता व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण थी, जो द्विपक्षीय संबंधों में लंबित मुद्दों को सुलझाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा — “इस यात्रा के बाद अब दोनों पक्षों को सीमा विवाद सहित लंबित मामलों पर बातचीत की पहल करनी चाहिए।”

विश्लेषण: नई दिल्ली का असली इरादा

कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत ने लामिछाने को जो असाधारण सम्मान दिया प्रधानमंत्री से लेकर NSA तक से मुलाकात वह सिर्फ पार्टी-स्तरीय संबंधों की बात नहीं है। इसके पीछे नई दिल्ली का स्पष्ट संदेश है: नेपाल की नई सरकार के साथ भारत काम करने को तैयार है, लेकिन शर्तें भारत की होंगी। भारत-नेपाल संबंध प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व में तनाव झेल रहे हैं। क्षेत्रीय विवादों की पृष्ठभूमि में लामिछाने का भाजपा मुख्यालय में स्वागत इस यात्रा को दिए गए महत्व को दर्शाता है।सूत्रों के मुताबिक भारत यह भी देखना चाहता है कि क्या RSP जो अभी सरकार में है भविष्य में बालेन शाह की राष्ट्रवादी नीतियों पर एक संतुलनकारी शक्ति बन सकती है।

निष्कर्ष

सतह पर यह यात्रा एक साधारण पार्टी-से-पार्टी संपर्क लग सकती है। लेकिन गहरे कूटनीतिक अर्थों में देखें तो नई दिल्ली में लामिछाने के लिए बजाए गए ढोल-नगाड़े की गूँज काठमांडू तक पहुँचने के लिए थी — खासतौर पर बालेन शाह के कानों तक। भारत का संदेश साफ है: बातचीत का दरवाज़ा खुला है, लेकिन टकराव की नीति महंगी पड़ेगी। जब तक बालेन शाह खुद नई दिल्ली नहीं आते, तब तक रबी लामिछाने ही भारत-नेपाल संबंधों की कड़ी बने रहेंगे।

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