फुटपाथ पर मजबूर, सरकारी वादे अधूरे, एम्स के बाहर गरीब मरीजों की दर्दनाक दास्तान

खटमल भरे बिस्तर, 14 दिन की हद और 44°C की धूप; हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद ज़मीन पर नहीं बदले हालात

देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के बाहर हर रोज़ एक अलग तरह का संघर्ष होता है। बिहार के गया और दरभंगा से लेकर उत्तर प्रदेश के सुदूर गाँवों तक से आए हज़ारों गरीब मरीज़ और उनके परिजन, जो पहले से ही गंभीर बीमारी की मार झेल रहे हैं, अब 44-45 डिग्री सेल्सियस की भीषण गर्मी में भी खुले आसमान के नीचे फुटपाथ पर रात बिताने को मजबूर हैं। ‘द रेड माइक’ की ज़मीनी पड़ताल और उपलब्ध ताज़े आँकड़े यह साफ़ करते हैं कि सरकारी दावे और ज़मीनी हकीकत में अभी भी गहरी खाई है।

हर रात फुटपाथ पर जंग: ओपीडी पर्ची के लिए जागती रहती हैं रातें

जाँच-पड़ताल में सामने आया कि इलाज की उम्मीद लेकर दिल्ली पहुँचे मरीज़ों के तीमारदार केवल इसलिए रातभर सड़क पर जाग कर बिताते हैं, ताकि सुबह 5:30 बजे ओपीडी पर्ची की लाइन में पहले नंबर पर खड़े हो सकें। अगर वे दो किलोमीटर दूर किसी शेल्टर होम या कमरे में चले गए, तो उनका नंबर आने से पहले ही काउंटर बंद होने का ख़तरा रहता है। देश के कई राज्यों से आए मरीज़ और उनके तीमारदार एम्स के मेट्रो स्टेशन के अंडरपास और अस्पताल के गेट के बाहर फुटपाथ पर रात गुज़ारने को मजबूर हैं और अपनी बारी के लिए ओपीडी की लाइन में नंबर बचाने के लिए पास ही डटे रहते हैं। उत्तर प्रदेश से आईं शशि देवी ने बताया, “यहाँ ठंड (गर्मी) है, लेकिन क्या करें? रैन बसेरे में जगह भरी हुई है, हम कहीं और जाने का खर्च नहीं उठा सकते, मजबूरी में यहीं ज़मीन पर सोते हैं।”

विश्राम सदन की हकीकत: खटमल, 14 दिन की सीमा और अतिरिक्त शुल्क

एम्स परिसर के भीतर और आसपास बने विश्राम सदनों की कहानी भी बेहद तकलीफ़देह है। मरीज़ों ने बताया कि इन सदनों के कमरों और बिस्तरों में खटमलों (Bedbugs) का इतना आतंक है कि रात भर नींद नहीं आती। इसके अलावा, नियमानुसार यहाँ केवल 14 दिन ही रुकने की इजाज़त है। उसके बाद 4 से 7 दिनों के लिए कमरा खाली करना ज़रूरी है, जिसके बाद छोटे बच्चों और सामान सहित परिवार को दोबारा फुटपाथ का सहारा लेना पड़ता है।

दिल्ली हाईकोर्ट का हस्तक्षेप: सुओ मोटो संज्ञान, फिर भी सीटें भरी

इस मानवीय संकट को जब मीडिया ने उजागर किया, तो दिल्ली हाईकोर्ट ने 14 जनवरी 2026 को स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लेते हुए अधिकारियों को राहत उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। इसके जवाब में एम्स ने हाईकोर्ट को बताया कि उसने मरीज़ों के परिजनों के लिए लगभग 80 पगोडा शैली के रैन बसेरे बनाने के उद्देश्य से दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) को ज़मीन उपलब्ध कराई है, और एक दीर्घकालिक समाधान के रूप में 2 एकड़ ज़मीन पर 3,000 बेड का विश्राम सदन भी बनाया जाएगा। DUSIB के वकील ने कोर्ट को बताया कि एम्स और सफदरजंग के पास 20 नए पगोडा लगाए गए हैं और आरएमएल व लेडी हार्डिंग अस्पतालों के पास भी 20-20 तंबू लगाए गए हैं। लेकिन ज़मीन पर हालत यह है कि इन 750 बिस्तरों वाले सभी आश्रय स्थल पूरी क्षमता से भरे हुए हैं और अभी भी मरीज़ बाहर फुटपाथ पर सोने को विवश हैं।

गर्मी के लिए आपात योजना: कोर्ट के आदेश, अमल अधूरा

दिल्ली हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ के ज़रिए DUSIB को निर्देश दिया है कि गर्मी और सर्दी — दोनों मौसमों के लिए अलग-अलग वार्षिक आपातकालीन कार्ययोजनाएं तैयार की जाएं और हर साल लागू की जाएं। गर्मी की योजना जनवरी-फरवरी में तैयार होकर मई में लागू होनी चाहिए और जुलाई-अगस्त तक चलनी चाहिए। लेकिन मौजूदा दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) की हीटवेव एक्शन प्लान की लंबे समय से आलोचना होती रही है कि यह केवल कागज़ी सलाह और विभागों के बीच समन्वय तक सीमित रहती है, जबकि ज़रूरतमंद लोगों तक ठंडे आश्रय, पानी और स्वच्छता की वास्तविक पहुँच सुनिश्चित नहीं हो पाती।

सरकारी शेल्टर खाली, मरीज़ फुटपाथ पर: दूरी और जागरूकता की बड़ी खाई

पड़ताल में एक और विरोधाभास सामने आया। DUSIB ने एम्स से लगभग 2 किलोमीटर दूर ग्रीन पार्क जैसे इलाकों में आधुनिक शेल्टर होम बनाए हैं जहाँ कूलर, ठंडा पानी, मुफ्त खाना और साफ बिस्तर उपलब्ध हैं। DUSIB द्वारा संचालित इन आश्रयों तक पहुँच बना सकने वाले उत्तरदाताओं का प्रतिशत केवल 20% ही रहा। जो लोग पहुँचे भी, उन्होंने पीने के पानी और बिस्तरों की कमी की शिकायत की। इसके मुख्य कारण हैं एम्स से इन शेल्टरों तक हर बार ₹60-70 ऑटो किराया चुकाना, जो बेहद गरीब परिवारों के लिए असंभव है, और एम्स के डॉक्टरों या स्टाफ द्वारा मरीज़ों को इन 13 कम्युनिटी सेंटरों की जानकारी न दिया जाना।

एम्स प्रशासन का पक्ष और नई सुविधाएं

एम्स प्रशासन ने कुछ महत्वपूर्ण कदमों की जानकारी दी है। एम्स ने सीआरपीएफ के सहयोग से ‘आश्रय’ सुविधा शुरू की है, जिसमें ओपीडी के लिए रात भर प्रतीक्षा करने वाले मरीज़ों को यहाँ लाया जाता है और उन्हें टोकन नंबर दिया जाता है, ताकि अगले दिन ओपीडी पंजीकरण में वही क्रम बना रहे। इस सुविधा में लगभग 250 लोगों के रहने की क्षमता है। एम्स निदेशक डॉ. एम. श्रीनिवास के अनुसार मरीज़ों को मुफ्त भोजन, कंबल और स्वच्छ शौचालय उपलब्ध कराए जा रहे हैं। एम्स कैंपस के भीतर आंतरिक आवाजाही के लिए मुफ्त ई-शटल सेवा भी चलाई जा रही है। इसके अलावा, लगभग 70 पगोडा शैली के अस्थायी आश्रय अस्पताल परिसर के रणनीतिक स्थानों पर लगाए गए हैं और प्रत्येक पगोडे में लगभग 10 लोगों के रहने की क्षमता है।

विशेषज्ञों की राय: समस्या प्रशासनिक इच्छाशक्ति की है

स्वास्थ्य अधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि मूल समस्या धन या संसाधनों की नहीं, बल्कि समन्वय और इच्छाशक्ति की है। एम्स जैसे संस्थान में रोज़ाना 15 से 20 हज़ार मरीज़ आते हैं देश के किसी भी अस्पताल के लिए यह असाधारण बोझ है। लेकिन सवाल यह है कि जब शेल्टर होम बने हैं, जब अदालत के आदेश हैं, जब ई-व्हीकल चल रही हैं तो भी गरीब मरीज़ फुटपाथ पर क्यों सो रहे हैं? जवाब एक ही है: जानकारी का अभाव, आपसी तालमेल की कमी और संवेदनशीलता का घाटा।

निष्कर्ष: कागज़ पर इंतज़ाम, ज़मीन पर दर्द

दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश हों, DUSIB के पगोडे हों या एम्स प्रशासन के आश्वासन ये सब तब तक अर्थहीन हैं जब तक एम्स के गेट नंबर एक के बाहर एक माँ अपने बीमार बच्चे को गोद में लिए 44 डिग्री की गर्मी में फुटपाथ पर रात काट रही है। ज़रूरत है कि एम्स के हर ओपीडी काउंटर, हर गार्ड और हर सोशल वर्कर को यह निर्देश दिया जाए कि वे हर आने वाले गरीब मरीज़ को उपलब्ध सुविधाओं की लिखित जानकारी दें। साथ ही, एम्स से इन शेल्टर होमों तक मुफ्त परिवहन सुनिश्चित किया जाए। बीमारी से लड़ने आए इन लोगों को व्यवस्था से भी नहीं लड़ना पड़े — यही एक कल्याणकारी राज्य का असली धर्म है।

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