नॉर्वे दौरा: नॉर्वे में विश्व गुरु की फ़जीहत, ‘सपेरे वाला कर्टून’ बना विवाद की जड़

43 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का नॉर्वे दौरा, लेकिन पश्चिमी मीडिया ने भारत को फिर से ‘सपेरों का देश’ बताया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना

नॉर्वे दौरा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे यात्रा राजनयिक दष्टि से जितनी ऐतिहासिक रही, उतनी ही विवादों से भरी भी। 43 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने नॉर्वे का पहला स्वतंत्र द्विपक्षीय दौर किया और नॉर्वे के प्रधानमंत्री Jonas Gahr Støre ने इसे वैश्विक अस्थरता के दौर में भारत-नॉर्वे सहयोग को रेखांकित करने वाला ऐतिहासिक अवसर बताया। लेकिन इस यात्रा के दौरान नॉर्वे के सबसे बड़े अखबार Aftenposten ने मोदी का एक कार्टून छापा जिसमें उन्हें सपेरे के रूप में दिखाया गया और इसने पूरी दुनिया में विवाद की आग भड़का दी।

ऐतिहासिक यात्रा: क्या हासिल किया भारत ने?

इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि रही भारत-नॉर्वे संबधों को ‘ग्रीन स्टेजिक पार्टनरशिप’ के सर तक उठाना, जिसमें स्वच्छ ऊर्जा, टिकाऊ विकास, ब्लू इकोनॉमी और ग्रीन शिपिंग जैसे क्षेत्रों में गहरे सहयोग का खाका तैयार किया गया।  भारत और नॉर्वे के बीच व्यापार पछले दस वर्षों में दोगुने से अधिक हो चुका है। नॉर्वे का सरकारी पेंशन फंड दुनिया का सबसे बड़ा सॉवरेन वल्थ फंड, जिसकी संपत्ति करीब 2 ट्रिलियन डॉलर है भारतीय पूंजी बाज़ारों में लगभग 30 अरब डॉलर का निवेश कर चुका है। प्रधानमंत्री मोदी ने ओस्लो में यह भी खुलासा किया कि पहलगाम आतंकी हमले के कारण यह यात्रा टालनी पड़ी थी, और उन्होंने नॉर्वे को उसकी एकजुटता के लिए धन्यवाद दिया।

विवाद का केंद्र: ‘सपेरे वाला कार्टून’

यात्रा की राजनयिक सफलताओं पर भारी पड़ गया एक कार्टून। नॉर्वे के सबसे बड़े अखबार Aftenposten ने एक कार्टून प्रकाशित किया जिसमें प्रधानमंत्री मोदी को सपेरे के रूप में  पालथी मारकर बैठे, बीन बजाते हुए दर्शाया गया था। टोकरी से सांप की जगह एक ईंधन-पंप की नली निकल रही थी। यह कार्टून ‘A Clever and Slightly Annoying Man’ शीर्षक वाले लेख के साथ छपा। सोशल मीडिया पर व्यापक आक्रोश फल गया। कई लोगों ने इस विडबना की ओर इशारा किया कि खुद मोदी ने कई बार कहा है कि भारत ‘सपेरों के देश’ की छवि से उठकर ‘माउस चार्मर’ यानी तकनीकी महशक्ति बन चुका है और अब एक यूरोपीय अखबार ने उन्हें उसी पुरान रूढ़ि में चित्रित कर दिया। विवाद जारी रहने के बावजूद Aftenposten की ओर से अब तक कोई सार्वजानिक माफी नहीं आई है।

पत्रकार का सवाल और भारतीय विदश मंत्रालय का जवाब

18 मई को नॉर्वे की पत्रकार Helle Lyng Svendsen और भारतीय विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जर्ज के बीच तीखी नोकझोंक हुई। पत्रकार ने सवाल किया कि भारत पर क्यों भरसा किया जाए और प्रेस सतंत्रता पर सवाल उठाए। पत्रकार ने मोदी की नॉर्वे की प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त उपस्थिति के दौरान यह भी पूछा कि उन्होंने मीडिया के सवाल क्यों नहीं लिए।

एरिक सोलहाइम की आवाज़: ‘पश्चिम को भारत को समझना होगा’

इसी पृष्ठभमि में नॉर्वे के वरिष्ठ पर्यावरण राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के पूर्व प्रमुख @Eriksolheim ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक विस्तृत पोस्ट लिखकर नॉर्वेजियन मीडिया की आलोचना की। उन्होंने लिखा कि जब दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का नेता नॉर्वे आता है, तो मीडिया की जिज्ञासा और गहराई कहा थी? उन्होंने भारत को ‘लोकतंत्र का चमत्कार’ बताते हुए कहा कि यूरोप को एशियाई सदी में पिछड़ने से बचना है, तो वैश्विक दक्षिण की सभ्यताओं और राजनीति को गंभीरता से समझना होगा। इसके जवाब में पत्रकार @Helle Lyng Svendsen ने कहा कि वे भारत की अधिक कवरेज की ज़रूरत से सहमत हैं, लकिन उन्होंने भारत में प्रेस स्वतंत्रता पर सवाल उठाने से पीछे हटने से इनकार किया।

विशषज्ञों की राय: औपनिवेशिक मानसिकता अभी गई नहीं

अंतरराष्ट्रीय मडिया विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद दो गहरे सवाल उठाता है। पहला क्या पश्चिम मीडिया भारत को उसकी वास्तविक ताकत और जटिलता के साथ समझने को तैयार है? और दूसरा क्या राजनीतिक आलोचना और नस्य कैरिकेचर के बीच की रखा पश्चिम में अभी भी धुंधली है? पर्यवेक्षकों ने इस कार्टून की तुलना 2022 में एक स्पेनिश अखबार में छपे भारत-विरोधी चित्र से की यह दर्शाते हुए कि यह कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि औपनिवेशिक रूढ़ियों का बार-बार लौटना है।

मोदी की नॉर्वे यात्रा ने एक आईना दिखाया, भारत की आर्थिक और सामरक ताकत तो बढ़ रही है, लेकिन पश्चिम की वैचरिक तैयारी उसके साथ कदम नहीं मिला पा रही। जहाँ एक ओर भारत-नॉर्वे के बीच हरित साझेदारी और व्यापार के नए अध्याय खुले, वहीं दूसरी ओर एक कार्टून ने यह याद दिला दिया कि वैश्विक सम्मान सिर्फ GDP से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समझ और पारसरिक सम्मान से भी नापा जाता है।

यह भी पढ़ें: Rising heat and water crisis in the country: सरकार पर विपक्ष के हमले, अर्थव्यवस्था पर दबाव

यहां से शेयर करें