नाले में मिला पूरा घर का सामान, ऑटो और पुलिस बैरिकेड
बीएमसी: मानसून से पहले हर साल की तरह इस बार भी बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने शहर के नालों की सफ़ाई अभियान छेड़ा, लेकिन इस बार जो कुछ नालों से निकला वह हैरान करने वाला था। पूर्वी उपनगरों के नालों से सफ़ाई दल को एक पूरे घर का सामान पलंग, अलमारी, सोफ़ा, टेबल-कुर्सी मिला। इतना ही नहीं, एक ऑटोरिक्शा और पुलिस का बैरिकेड भी नाले की गहराई से बरामद किया गया। पिछले वर्षों में भी ऐसी घटनाएँ सामने आई थीं जून 2023 में मोगरा नाले से मानसून के दौरान अलमारियाँ, पलंग और एक 165-लीटर का रेफ्रिजरेटर निकाला गया था। लेकिन इस बार ऑटोरिक्शा और पुलिस बैरिकेड जैसी भारी-भरकम वस्तुओं का मिलना यह साफ़ दर्शाता है कि मुंबईकर नालों को खुला कचरा-स्थल मान चुके हैं। इस मुद्दे पर पर्यावरण समूहों का कहना है कि यदि घर-घर कचरा संग्रह की व्यवस्था कमज़ोर रही तो नालों के किनारे बाड़ लगाना भी कारगर नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि नालों के भीतर जाल, कचरे का अलगाव और दीर्घकालिक नागरिक जागरूकता अभियान ही असली समाधान है। यह समस्या केवल इंजीनियरिंग की नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती भी है।
बीएमसी पिछड़ी, मानसून सिर पर
बीएमसी के आंकड़ों के अनुसार 12 मई 2026 तक शहर में बड़े नालों की 63% और छोटे नालों की 73% सफ़ाई पूरी हुई थी, जबकि मिठी नदी की केवल 42% सफ़ाई ही हो पाई थी। सबसे बुरी स्थिति ज़ोन-V की है जिसमें चेंबूर, घाटकोपर, मानखुर्द, गोवंडी और कुर्ला जैसे इलाक़े आते हैं — जहाँ केवल 20% काम ही पूरा हो पाया है, जबकि समय-सीमा 31 मई है।
बांद्रा: गरीब नगर ध्वस्त, हज़ारों परिवार मानसून से ठीक पहले बेघर
एक अलग लेकिन उतनी ही गंभीर खबर बांद्रा से है। 19 मई 2026 को पश्चिम रेलवे ने बांद्रा ईस्ट के गरीब नगर झुग्गी बस्ती के खिलाफ़ बड़ा तोड़फोड़ अभियान शुरू किया। यह कार्रवाई बांद्रा स्टेशन के पास रेलवे की ज़मीन पर बने “अनधिकृत अतिक्रमण” हटाने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के तहत की गई। इस ज़मीन पर सांताक्रूज़-मुंबई सेंट्रल कॉरिडोर पर पाँचवीं और छठी लाइन बिछाई जानी है, जिससे 50 नई ट्रेनें चलाई जा सकेंगी। इसके अलावा बांद्रा सबर्बन स्टेशन और बांद्रा टर्मिनस के बीच करीब 1.5 से 2 किलोमीटर की दूरी को भी बेहतर कनेक्टिविटी देने की योजना है।
ईद से पहले टूटे घर, मानसून का डर
मंगलवार को गरीब नगर में सैकड़ों परिवार टूटे हुए फ़र्नीचर, बर्तनों और फटी टिन की चादरों के बीच बैठे नज़र आए। कई निवासियों ने दावा किया कि वे दशकों से यहाँ रह रहे थे और उन्हें पुनर्वास सर्वेक्षण से बाहर रखा गया या उसकी जानकारी ही नहीं दी गई। शाम तक स्टेशन रोड के पास के बड़े हिस्से समतल हो चुके थे ,परिवार खुले आसमान के नीचे थैलों, गद्दों और पालतू जानवरों के साथ बैठे थे, और यह सब ईद से कुछ दिन पहले और मानसून से कुछ हफ्ते पहले हुआ। 2021 के बेसलाइन सर्वेक्षण के अनुसार केवल लगभग 100 लोगों को पुनर्वास के लिए पात्र माना गया और उन्हें वैकल्पिक आवास की पेशकश की गई या की जाएगी। लेकिन कई अन्य निवासी, जो पीढ़ियों से यहाँ रह रहे थे, बिना किसी सहारे के बेदखल किए जा रहे हैं।
ज़रूरी, पर समय सही नहीं?
रेलवे की यह कार्रवाई दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों को सामने ला रही है। एक वर्ग का मानना है कि रेलवे भूमि पर दशकों से चला आ रहा यह अतिक्रमण हटना ही चाहिए था सुरक्षा और बुनियादी ढाँचे की ज़रूरत सर्वोपरि है। दूसरा वर्ग सवाल उठा रहा है कि क्या यह समय सही था? मानसून महज़ कुछ हफ्ते दूर है और अब ये परिवार न छत के साथ बारिश झेलेंगे।
दो खबरें, एक शहर, एक सवाल
मुंबई की ये दोनों खबरें एक ही बड़े सवाल की ओर इशारा करती हैं, क्या इस महानगर का विकास उसके सबसे कमज़ोर नागरिकों की कीमत पर हो रहा है? नाले में ऑटोरिक्शा और बैरिकेड मिलना नागरिक लापरवाही की पराकाष्ठा है, तो मानसून से पहले हज़ारों का बेघर होना प्रशासनिक संवेदनहीनता का। दोनों ही मामलों में आम मुंबईकर सबसे बड़ा भुक्तभोगी है।
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