भारतीय रुपया आज अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 96.81 रुपये तक पहुंच गया है। मध्य पूर्व में इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जिससे आयात-निर्भर भारत पर दबाव बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अभी रुपया बाजार की ताकतों पर छोड़ दिया जाए, क्योंकि विदेशी मुद्रा भंडार को जलाना उचित नहीं। लेकिन यह गिरावट सिर्फ मुद्रा की कमजोरी नहीं, बल्कि निवेश वातावरण की गहरी समस्या को उजागर कर रही है।
रुपया पतलून नहीं है जिसे खींचकर ऊपर करना पड़े। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, मुद्रा का कोई ‘आदर्श स्तर’ नहीं होता। वर्तमान में रुपया एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल है। पिछले कुछ दिनों में यह 5% से अधिक गिर चुका है। भारत प्रतिदिन लगभग 5.5 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें 85% से अधिक हिस्सा विदेश से आता है। तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी देश पर रोजाना 5 करोड़ डॉलर का अतिरिक्त बोझ डालती है।
RBI की रणनीति: हस्तक्षेप सीमित
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के पास करीब 697 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। अर्थशास्त्री मदन सबनवीस (बैंक ऑफ बड़ौदा) के अनुसार, फिलहाल RBI रुपया अपने स्तर पर छोड़ने की रणनीति पर है, क्योंकि इससे निर्यात को बढ़ावा मिलता है और आयात पर स्वाभाविक रोक लगती है। पूर्व IMF डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर गीता गोपीनाथ ने भी ‘Let The Rupee Do Its Work’ शीर्षक से लिखा कि भंडार जलाकर रुपया सहारा नहीं देना चाहिए। हालांकि, विपक्षी दलों (कांग्रेस समेत) ने सरकार पर हमला बोला है। राजनीति में यह मुद्दा भावनात्मक बन गया है, लेकिन नीति विशेषज्ञों का जोर बाजार की स्वाभाविक गति पर है।
मुद्रा गिरावट के कारण
तेल की आग: फरवरी 2026 से पहले ब्रेंट क्रूड 70-80 डॉलर पर था, अब 100+ डॉलर। ईरान संकट ने सप्लाई प्रभावित की। 
FPI बहिर्वाह: 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 22.4 अरब डॉलर की भारतीय शेयर और बॉन्ड बिकवाली की। लगातार तीसरे साल BoP (भुगतान संतुलन) घाटे में रह सकता है।
भारतीय कंपनियां भी विदेश में निवेश: भारतीय फर्मों ने विदेश में 30-35 अरब डॉलर निवेश किए, जिससे RBI ने ओवरसीज निवेश की जांच कड़ी कर दी है।
मजबूत डॉलर: अमेरिकी ब्याज दरें और वैश्विक अनिश्चितता ने डॉलर को मजबूत किया।
सुजीत भल्ला जैसे अर्थशास्त्रियों का कहना है कि 2017 के FDI नियम (Bilateral Investment Treaties समाप्ति और विवादों का भारतीय अदालतों में निपटारा) विदेशी निवेशकों को डरा रहे हैं। इससे FDI में गिरावट आई है।
प्रभाव: महंगाई बढ़ेगी, लेकिन निर्यात को फायदा
कमजोर रुपया आयातित वस्तुओं (तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोना) को महंगा करेगा, जिससे खुदरा महंगाई बढ़ सकती है। पेट्रोल-डीजल कीमतों में हालिया 3.90 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी का फायदा भी OMCs को कम हो सकता है, क्योंकि रुपया गिरावट लागत बढ़ा रही है।
सकारात्मक पक्ष: निर्यात सस्ते और प्रतिस्पर्धी होंगे। विदेश यात्रा और आयातित सामान पर खर्च कम होगा, जो एक तरह का ‘ऑटोमैटिक ऑस्टरिटी’ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ईंधन बचत, अनावश्यक विदेश यात्रा और सोना खरीद न करने की अपील की है।
क्या आगे और गिरावट?
सबनवीस कहते हैं, “ईमानदारी से कहूं तो नहीं पता कितना और गिरेगा।” युद्ध लंबा खिंचा तो तेल की कीमतें और बढ़ेंगी। मनोवैज्ञानिक बाधा 100 रुपये प्रति डॉलर का है, लेकिन बाजार इसे पार कर सकता है।
समाधान की जरूरत
रुपया गिरावट केवल लक्षण है। असली समस्या पूंजीगत खाता घाटा, FPI बहिर्वाह, घरेलू खपत में मंदी और निवेश वातावरण है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि संरचनात्मक सुधारों की जरूरत है FDI नीति में आसानी, खपत बढ़ाना, घरेलू उत्पादन मजबूत करना और राजनीति से ऊपर नीति रखना। रुपया बाजार को अपना काम करने दें, लेकिन सरकार और RBI को निवेशकों का विश्वास बहाल करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। अन्यथा, यह गिरावट आम आदमी की जेब, महंगाई और आर्थिक विकास को लंबे समय तक प्रभावित करेगी। स्थिति पर नजर रखना होगा, क्योंकि वैश्विक अनिश्चितता बनी हुई है।
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