नोएडा/ग्रेटर नोएडा: एक तरफ वे किसान हैं जिनकी पुश्तैनी जमीनें विकास की भेंट चढ़ गईं और वे आज भी मुआवजे या 5% के प्लॉट के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। दूसरी तरफ, ‘किसान नेता’ का मुखौटा पहने वे रसूखदार लोग हैं, जो इन्हीं किसानों के दर्द को अपनी तिजोरी भरने का जरिया बना चुके हैं। नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की करोड़ों की सरकारी जमीन पर कब्जे का एक ऐसा ‘बिजनेस मॉडल’ तैयार किया गया है, जिसमें इमोशनल ब्लैकमेलिंग और अफसरों पर दबाव का कॉकटेल शामिल है। ऐसा नही की सभी किसान नेता एक जैसे है। कुछ नेता वाकई किसानों के हक की लड़ाई लड़ रहे है। लेकिन कुछ ऐसे है जो 10-20 नेता एकत्र होते है और प्राधिकरण दफ्तर जा कर अफसरों पर दबाव बनाते है।
कैसे बुना जाता है कब्जे का जाल?
इन तथाकथित नेताओं के काम करने का तरीका बेहद शातिर और चरणबद्ध है:
- भावनाओं का दोहन: सबसे पहले गांवों में उन किसानों को इकट्ठा किया जाता है जिनकी समस्याएं प्राधिकरण में लंबित हैं। किसानों को भरोसा दिलाया जाता है कि यह ‘नेता’ उनके हक की अंतिम लड़ाई लड़ रहा है।
- दबाव की रणनीति: जब भीड़ जमा हो जाती है, तो विकास कार्यों को रोकने या प्राधिकरण के गेट पर तालाबंदी करने की धमकी दी जाती है। अफसरों को ‘किसान विरोधी’ बताकर उन पर इतना मानसिक दबाव बनाया जाता है कि वे बैकफुट पर आ जाएं।
- सरकारी जमीन पर ‘सेंधमारी’: इसी हंगामे और दबाव के बीच, मास्टर प्लान की ग्रीन बेल्ट या अधिसूचित सरकारी जमीन पर रातों-रात बाउंड्री वॉल खड़ी कर दी जाती है। अगर अफसर कार्रवाई की कोशिश करते हैं, तो इसे ‘किसानों पर अत्याचार’ का नाम देकर आंदोलन की चेतावनी दी जाती है।
- ब्लैकमेलिंग और सौदेबाजी: सूत्रों के मुताबिक, कई मामलों में पर्दे के पीछे अफसरों के साथ ‘सेटलमेंट’ का खेल चलता है। अफसरों को भ्रष्टाचार की शिकायतों में फंसाने या ऊपर तक शिकायत करने की धमकी देकर चुप करा दिया जाता है।
करोड़ों का ‘एग्जिट प्लान’
कब्जा करने के बाद ये नेता खुद वहां खेती नहीं करते। खेल का असली हिस्सा इसके बाद शुरू होता है:
- अवैध प्लॉटिंग: कब्जा की गई जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े कर भोले-भाले लोगों को कम दाम में बेच दिए जाते हैं।
- फर्जी कागजात: कई बार स्थानीय स्तर पर सांठगांठ कर इन जमीनों के फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते हैं।
- बिक्री और पलायन: एक बार जब जमीन बिक जाती है और मोटी रकम जेब में आ जाती है, तो ये ‘नेता’ उस मुद्दे को छोड़कर किसी नए गांव की तलाश में निकल जाते हैं।
पिस्ता है असली किसान
इस पूरे खेल में सबसे बड़ा नुकसान उस ईमानदार किसान का होता है जिसकी समस्या वाकई जायज है। जब प्रशासन इन ‘नकली’ नेताओं के रवैये से तंग आकर कड़ा रुख अपनाता है, तो उसकी मार उन आम किसानों पर पड़ती है जो केवल अपना हक मांग रहे थे।
जानकारों का कहना है: “यह केवल जमीन का कब्जा नहीं है, बल्कि उस भरोसे का कत्ल है जो किसान अपने नेतृत्व पर करता है। जब तक प्रशासन और शासन ऐसे ‘ब्लैकमेलर’ नेताओं को चिन्हित कर उन पर गैंगस्टर एक्ट जैसी कार्रवाई नहीं करेगा, तब तक नोएडा की कीमती जमीनों पर यह लूट मची रहेगी।”
प्रशासनिक सुस्ती या मिलीभगत? नोएडा के विभिन्न गांवों (जैसे कि बहलोलपुर, गढ़ी चौखंडी, बरौला और ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी आदि) में ऐसे कई उदाहरण देखे गए हैं जहाँ करोड़ों की जमीन आज इन नेताओं के चंगुल में है। सवाल यह है कि क्या प्राधिकरण के जिम्मेदार अफसर अपनी आंखें मूंदकर इस ‘लैंड जिहाद’ और ‘अवैध साम्राज्य’ को फलने-फूलने दे रहे हैं?

