A ‘coffin’ on the road: जैसलमेर-अहमदाबाद स्लीपर बस में भीषण आग, एक की मौत, 8 ज़िंदगी की जंग लड़ रहे

A ‘coffin’ on the road: राजस्थान के जैसलमेर से गुजरात के अहमदाबाद जा रही एक निजी स्लीपर बस में भीषण आग लगने से हड़कंप मच गया। इस दर्दनाक हादसे में 9 यात्री बुरी तरह झुलस गए, जिनमें से एक घायल ने पालनपुर (गुजरात) के अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। अन्य घायलों की स्थिति भी नाजुक बनी हुई है, जिनका उपचार जारी है।

कैसे हुआ हादसा?

जानकारी के अनुसार, बस देर रात जैसलमेर से रवाना हुई थी। गुजरात सीमा में प्रवेश करने के बाद अचानक बस के पिछले हिस्से से धुआं निकलने लगा। जब तक चालक बस रोकता और यात्री कुछ समझ पाते, आग ने पूरी बस को अपनी चपेट में ले लिया। स्लीपर कोच होने के कारण संकरे रास्ते और भारी पर्दों ने आग को तेजी से फैलाया, जिससे यात्रियों को बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिला।

स्लीपर बसें: सफर या मौत का जाल?

पिछले कुछ वर्षों में स्लीपर बसों में आग लगने की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। ये बसें यात्रियों के लिए सुविधाजनक तो हैं, लेकिन सुरक्षा के लिहाज से ‘सड़क पर दौड़ते ताबूत’ साबित हो रही हैं। इसके पीछे कई गंभीर कारण हैं:

  • अवैध मॉडिफिकेशन: अधिकांश प्राइवेट बस संचालक क्षमता से अधिक सीटें और केबिन बनाने के लिए बस की मूल बनावट (Structure) से छेड़छाड़ करते हैं। इससे बस का संतुलन बिगड़ता है और बिजली के तारों पर दबाव बढ़ता है।
  • शॉर्ट सर्किट और ओवरलोडिंग: मोबाइल चार्जिंग पॉइंट, एसी और अतिरिक्त लाइटों के लिए की गई अवैध वायरिंग अक्सर शॉर्ट सर्किट का कारण बनती है। स्लीपर केबिनों में इस्तेमाल होने वाला फोम और कपड़े आग को चंद सेकंड में भड़का देते हैं।
  • निकासी के रास्तों का अभाव: स्लीपर बसों में गलियारे (Passage) बेहद संकरे होते हैं। आग लगने की स्थिति में भगदड़ मचती है और लोग फंस जाते हैं। अक्सर ‘इमरजेंसी एग्जिट’ (आपातकालीन द्वार) के पास भी सामान या सीटें फिट कर दी जाती हैं, जिससे वह रास्ता बंद हो जाता है।
  • अग्निशमन यंत्रों की कमी: अधिकांश निजी बसों में या तो अग्निशमन यंत्र (Fire Extinguishers) होते ही नहीं, और अगर होते भी हैं तो वे एक्सपायर्ड होते हैं या स्टाफ उन्हें चलाना नहीं जानता।

प्रशासनिक अनदेखी

यह हादसा एक बार फिर परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। क्या इन बसों की फिटनेस जांच नियमित रूप से की जाती है? निजी बस ऑपरेटर मुनाफे के चक्कर में यात्रियों की सुरक्षा को ताक पर रख रहे हैं और प्रशासन महज हादसों के बाद जांच की रस्म अदायगी करता है।

नोट: इस घटना ने एक बार फिर यात्रियों को चेतावनी दी है कि वे निजी स्लीपर बसों में सफर करते समय सुरक्षा मानकों की जांच अवश्य करें और प्रशासन से इन ‘मौत की बसों’ पर लगाम लगाने की मांग करें।

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