Why can’t West Bengal become ‘Bangla’ or ‘Bango’?: यूनियन कैबिनेट ने मंगलवार 24 फरवरी 2026 को केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “राज्य की जनता की इच्छा का प्रतिबिंब” बताया। यह फैसला केरल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आया है। वहीं, पश्चिम बंगाल 1999 से चार बार नाम बदलने (पश्चिम बंगला → पश्चिम बंग → बंगाल/बंगला/बंगाल → बंगला) का प्रस्ताव भेज चुका है, लेकिन केंद्र ने हर बार मंजूरी नहीं दी।
केरल का प्रस्ताव क्यों पास?
केरल विधानसभा ने अगस्त 2023 और 24 जून 2024 को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास किया था। मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन ने कहा था कि राज्य का नाम मलयालम में हमेशा से ‘केरलम’ रहा है। यह नाम 3rd शताब्दी ईसा पूर्व के अशोक अभिलेखों में ‘केरलपुत्र’ के रूप में और प्राचीन तमिल साहित्य में मिलता है। 1956 में भाषाई आधार पर राज्य पुनर्गठन के बावजूद संविधान की पहली अनुसूची में ‘केरल’ अंग्रेजी नाम दर्ज रहा। केंद्र ने इसे स्वीकार करते हुए ‘केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026’ को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पास भेज दिया। अब राष्ट्रपति इसे केरल विधानसभा को राय के लिए भेजेंगे। राय आने के बाद संसद में संविधान संशोधन (साधारण बहुमत से) होगा। सूत्रों के मुताबिक केरल भाजपा इकाई ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया था।
पश्चिम बंगाल का प्रस्ताव क्यों अटका?
पश्चिम बंगाल ने कई बार कोशिश की, लेकिन हर बार अड़चन आई:
• 1999 (ज्योति बसु, वाम मोर्चा): ‘पश्चिम बंगला’ या ‘बंगला’ प्रस्ताव।
• 2011 (ममता बनर्जी): ‘पश्चिम बंग’ (अंग्रेजी और बांग्ला दोनों में) — केंद्र ने ‘नाम में सिर्फ छोटा बदलाव’ कहकर ठुकराया।
• 2016: तीन नाम — ‘Bengal’ (अंग्रेजी), ‘Bangla’ (बांग्ला), ‘Bangal’ (हिंदी) — केंद्र ने साफ कहा, “एक राज्य के तीन नाम नहीं हो सकते।”
• 2018: विधानसभा ने ‘बंगला’ का एकल प्रस्ताव पास किया — फिर भी लंबित।
मुख्य कारण (सरकारी और MEA के अनुसार):
1. अंतरराष्ट्रीय भ्रम: विदेश मंत्रालय ने आपत्ति जताई कि ‘बंगला’ और ‘बांग्लादेश’ में नाम की समानता से विदेशी मंचों, दूतावासों और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों में confusion होगा।
2. एक नाम की शर्त: केंद्र ने स्पष्ट किया कि सभी भाषाओं (अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला) में एक ही uniform नाम होना चाहिए।
3. अन्य कारक: गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय के अनुसार नाम बदलने में “सभी प्रासंगिक पहलुओं” पर विचार होता है।
ममता बनर्जी ने 24-25 फरवरी को तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, “केरल को मंजूरी इसलिए मिली क्योंकि भाजपा और सीपीएम में समझौता है… हम ‘बंगला-विरोधी’ नहीं हैं, लेकिन केंद्र है। भाजपा सत्ता में हमेशा नहीं रहेगी, हम नाम जरूर बदलवा लेंगे।” टीएमसी ने केंद्र को “बंगला-बिरोधी” करार दिया।
व्यावहारिक दिक्कत भी
ममता बार-बार कहती रही हैं कि ‘वेस्ट बंगाल’ (W से शुरू) होने से आधिकारिक बैठकों और परीक्षाओं में राज्य का नाम सबसे आखिर में आता है। ‘बंगला’ से यह समस्या दूर हो जाएगी।
अब क्या?
केरल का नाम बदलने की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है। पश्चिम बंगाल का 2018 वाला प्रस्ताव अभी भी लंबित है। TMC सांसद रितब्रत बनर्जी ने फरवरी 2025 में राज्यसभा में भी मांग उठाई थी। ओमर अब्दुल्ला ने भी ममता का समर्थन करते हुए कहा, “केरल हो सकता है तो बंगाल क्यों नहीं?” यह मामला केंद्र-राज्य संबंधों और राजनीतिक समीकरणों को भी दर्शाता है। केरल का बदलाव सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा माना जा रहा है, जबकि बंगाल का प्रस्ताव प्रशासनिक, सांस्कृतिक और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों में उलझा हुआ है।

