पश्चिम बंगाल रेप केस: 11 साल की बच्ची से गैंगरेप और नृशंस हत्या, पूरे भारत में यौन हिंसा की भयावह तस्वीर फिर उजागर

पश्चिम बंगाल रेप केस: कोलकाता/बारुईपुर, पश्चिम बंगाल के बारुईपुर शहर से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जिसने एक बार फिर देश में महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस महीने की शुरुआत में एक शनिवार शाम, कोलकाता से करीब 30 किलोमीटर दूर बारुईपुर में रहने वाली 11 वर्षीय एक बच्ची अपनी सहेली के जन्मदिन की पार्टी में शामिल होने के लिए घर से निकली थी। वह कभी वापस नहीं लौटी। पुलिस जांच में शामिल एक स्थानीय अधिकारी के मुताबिक बच्ची का अपहरण किया गया, उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया और फिर जीवित अवस्था में ही उसे बोरे में बंदकर एक तालाब में फेंक दिया गया। रविवार को उसका शव तालाब से बरामद हुआ, एक दिन पहले ही परिवार ने उसकी गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई थी। भारतीय कानून के तहत पीड़िता और उसके परिवार की पहचान उजागर करने पर रोक है, इसलिए नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

पुलिस की सुस्ती पर सवाल, परिवार का आरोप

पीड़ित परिवार के करीबी सूत्रों ने बताया कि शुरुआत में पुलिस ने महज कुछ स्थानीय लोगों से पूछताछ करने के अलावा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। नाराज ग्रामीणों ने खुद ही आसपास लगे दो सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालनी शुरू की, तब जाकर मामले में सुराग मिले। बारुईपुर पुलिस अधिकारी अरविंद कुमार आनंद के अनुसार विभाग अब यह जांच कर रहा है कि शुरुआती जांच में किस स्तर पर चूक हुई। पीड़िता के परिवार का कहना है कि यदि पुलिस ने गुमशुदगी की शिकायत पर समय रहते तेजी दिखाई होती, तो शायद बच्ची की जान बचाई जा सकती थी।

 आक्रोशित भीड़ की हिंसा, एक निर्दोष की मॉब लिंचिंग

बच्ची का शव मिलते ही इलाके में भारी आक्रोश फैल गया। गुस्साई भीड़ सड़कों पर उतर आई, दुकानों में तोड़फोड़ की गई और रेलवे लाइनों को भी निशाना बनाया गया। इसी हिंसा के दौरान भीड़ ने एक व्यक्ति को हत्या का संदिग्ध मानकर पीट-पीटकर मार डाला। बाद में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने स्पष्ट किया कि मारा गया व्यक्ति निर्दोष था। पुलिस ने हिंसा और तोड़फोड़ के आरोप में अब तक 35 लोगों को गिरफ्तार किया है, जबकि वायरल हुए वीडियो के आधार पर अन्य आरोपियों की पहचान की जा रही है।

चार गिरफ्तार, एक आरोपी पुलिस मुठभेड़ में ढेर

पुलिस के मुताबिक इस मामले में सुनियोजित तरीके से वारदात को अंजाम दिया गया। चार लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें कथित मुख्य साजिशकर्ता आनंद सरदार भी शामिल है। इसी बीच आरोपियों में से एक, प्रभास मंडल, को पुलिस टीम से हथियार छीनकर भागने की कोशिश के दौरान गोली मारकर ढेर कर दिया गया। पश्चिम बंगाल की बीजेपी मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि सरकार का संदेश साफ है कि किसी भी तरह की “नाइंसाफी बर्दाश्त नहीं” की जाएगी। दिलचस्प यह भी रहा कि मारे गए आरोपी की मां ने बेटे का शव लेने से इनकार करते हुए कहा कि उसने “कुछ भी अच्छा नहीं किया”, इसलिए उसे घर नहीं लाना चाहतीं।

बीजेपी सरकार के लिए चुनौती

गौरतलब है कि यह घटना ऐसे समय हुई है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी बीजेपी ने कुछ महीने पहले ही पहली बार पश्चिम बंगाल में सत्ता संभाली है, और महिला सुरक्षा उसके प्रमुख चुनावी वादों में शामिल था। ऐसे में यह मामला नई सरकार के लिए बड़ी परीक्षा बनकर सामने आया है। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि केवल सरकार बदलने से गहरी जड़ें जमा चुकी पितृसत्तात्मक सोच, पुलिस-न्यायपालिका में लैंगिक संवेदनशीलता की कमी और जातिगत ढांचे से जुड़ी यौन हिंसा जैसी समस्याएं दूर नहीं हो सकतीं।

आंकड़े जो चिंता बढ़ाते हैं

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार भारत में हर दिन औसतन 80 से अधिक दुष्कर्म के मामले पुलिस में दर्ज होते हैं। वर्ष 2024 में देशभर में कुल 29,536 दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए, जो पिछले कुछ वर्षों से लगभग स्थिर बने हुए हैं। वहीं बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों में पिछले एक दशक में तेज़ी से बढ़ोतरी दर्ज की गई है — पॉक्सो एक्ट (POCSO) के तहत दर्ज मामलों की संख्या रिकॉर्ड 69,191 तक पहुंच गई है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि पीड़िता को दोषी ठहराए जाने और सामाजिक कलंक के डर से बड़ी संख्या में मामले पुलिस तक पहुंचते ही नहीं।

फास्ट-ट्रैक कोर्ट का वादा अधूरा

सरकार ने वर्ष 2026 तक यौन अपराधों की सुनवाई के लिए 2,600 फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतें बनाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन ताजा सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक देशभर में सिर्फ 755 ऐसी अदालतें ही स्थापित हो पाई हैं, जिनमें से 410 विशेष रूप से पॉक्सो मामलों के लिए हैं। इस देरी को भी न्याय मिलने में हो रही अनावश्यक देरी और अपराधियों के बचकर निकल जाने की धारणा का एक बड़ा कारण माना जा रहा है।

राष्ट्रीय महिला आयोग की टिप्पणी

सरकार द्वारा गठित निगरानी संस्था राष्ट्रीय महिला आयोग ने इसी तरह के एक अन्य मामले (राजस्थान) पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह घटना “गंभीर प्रशासनिक खामियों, पुलिसिंग में कमियों और निगरानी तंत्र की नाकामी” को उजागर करती है, जिसने ऐसी आपराधिक गतिविधियों को पनपने का मौका दिया।

2012 के निर्भया कांड की याद ताज़ा

इस घटना ने वर्ष 2012 में दिल्ली में हुए बहुचर्चित निर्भया गैंगरेप कांड की याद फिर से ताजा कर दी है, जिसके बाद देशभर में भारी विरोध प्रदर्शन हुए थे और कानून में सख्त बदलाव किए गए थे। बलात्कार की परिभाषा को व्यापक बनाया गया था और यौन उत्पीड़न, पीछा करने तथा ताक-झांक जैसे अपराधों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान लाया गया था। बावजूद इसके, विशेषज्ञों का कहना है कि जमीनी हकीकत में बहुत कम बदलाव आया है और महिलाओं व बच्चियों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं।

एनकाउंटर को मिलता जनसमर्थन: चिंता की बात

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि अदालती सुनवाई में हो रही देरी से जनता में गुस्सा इस कदर बढ़ गया है कि अब लोग पुलिस द्वारा किए जाने वाले तथाकथित “एनकाउंटर” यानी विवादास्पद परिस्थितियों में संदिग्धों को गोली मार दिए जाने का भी समर्थन करने लगे हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यह प्रवृत्ति कानून-व्यवस्था और न्याय प्रणाली, दोनों के लिए खतरनाक संकेत है।भारतीय कानून के अनुसार पीड़िता की पहचान उजागर करना प्रतिबंधित है, इसलिए इस रिपोर्ट में पीड़िता या उसके परिवार का नाम प्रकाशित नहीं किया गया है।

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